मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कविता : दक्खनी हवाएँ




दक्खनी हवाएँ
सुगंधी हवाएँ
प्राण जगे 
*चंद्रापीड के.

दक्खनी हवाएँ
विषैली हवाएँ
प्राण हरे
हिमालय के. 


टिप:  वसंत ऋतु में मलयगिरी की सुगन्धित वायु हिमालय स्थित मानसरोवर तक पहुँची  तब जन्म-जन्मान्तर  से सोये चंद्रापीड देह में चेतना का संचार होता है - कादंबरी.  

आज जहरीली और स्मागी हवाएँ हिमालय  के ही प्राण ले रही है.

सोमवार, 16 जुलाई 2018

महानगर में सावन की पहली बरसात


महानगर का एक मोहल्ला. सीमेंट के पक्के घर, सीमेंट की गलियाँ, न कोई पेड़ न कोई पौधा. कल शाम हुई सावन की पहली बरसात. छाई रही बदरी रात भर, टपकती रही बूँद बूँद. भर गई नालियाँ और गलियाँ, फ़ैल गयी गंदगी चहुँ ओर. गली में बिजली के खम्बे के ऊपर लगी लेड लाईट की रोशनी करती रही रात भर इन्तजार. कोई तो पतंगा आये, रोशनी में नहाकर शहीद होने के लिए. पर हाय री  किस्मत, बीत गई सगरी रैना, पतंगा न आया. बुझ गई सुबह सवेरे, बिन ब्याही विधवा होकर. पतंगोंकी लाशे  खाने वाली वाली मुर्दाखोर चींटियाँ भी भूखी रह गई.  रात को सुनाई नहीं दिया झिंगुरों के संगीत की ताल पर चिर परिचित मेंढकों का प्रेम गीत. शायद बेदखल हो गये शहर से, या गुम हो गए, काल की अंधियारी कोठडी में.

मच्छरों की सेना विजय घोष करती हुई घर चढ आई. रोक न सकी उसको जालीदार खिड़की-दरवाजों की दीवारें. काम नहीं आये मनुष्योंके रासायनिक आल आउट हथियार. नहीं मिली छिपने की जगह मछरदानी में भी. पीकर मनुष्य का खून, डंके की चोट पर तब विजय गीत गया मच्छरों ने. 

डॉक्टर ने आज सुबह-सुबह जल्दी दवाखाना खोला. लगी हुई थी लम्बी लाइन डेंगू और मलेरिया ग्रस्त पराजित इन्सानोंकी.  आखिर अच्छे दिन आ ही  गए.  ऐसे ही सावन बरसता रहा तो एक मर्सडीज पक्की.  




गुरुवार, 5 जुलाई 2018

प्रदूषण (५) - संजीवनी बूटी और स्मागी चुड़ैल




हवा में  तैरकर 
संजीवनी बूटी आई 
प्राण बचे 
लक्ष्मण के.


हवा में तैरकर 
स्मागी चुड़ैल आई 
प्राण हरे 
निष्पाप जनों के.



सोमवार, 2 जुलाई 2018

दो हायकू- आदमी और गाँव




शहर में आया 
भीड़ में खो गया 
एक आदमी.


घरों पे ताले 
खेत है उजड़े 
पहाड़ी गाँव.