सोमवार, 25 जुलाई 2022

कूट कथा: साँप को दूध पिलाने का नतीजा


प्राचीनकाल में इंद्रप्रस्थ शहर में एक न्यायप्रिय राजा राज्य करता था। एक दिन दरबार में सेनापति ने राजा से निवेदन किया महाराज, जिस जहरीले साँप ने शहर के नागरिकों की जान ली थी, उसे सैनिकों ने उसे पकड़ लिया है। महाराज, यदि आज्ञा हो, तो इस साँप को मार देते हैं। 

राजा ने निर्णय लेने से पहले मंत्रियों से सलाह मांगी। 

पहला मंत्री: महाराज, बिना ज्यादा सोचे समझे, इस जहरीले साँप को तत्काल मार दिया जाना चाहिए। यदि इसे जिंदा छोड़ दिया जाता है तो यह  लोगोंकों डँसेगा, उनकी जान लेगा।  

दूसरा मंत्री: महाराज, हम सभ्य इंसान हैं। 'खून का बदला खून' हमारी नीति नहीं है। अपने लोग हों या सांप, दोनों को समान न्याय मिलना चाहिए। बिना सोचे समझे उसकी जान लेना ठीक नहीं है। साँप को दंड देने से पहले, हमें सांप के पक्ष को भी जानना चाहिए। राजा दूसरे मंत्री के विचारों से सहमत हो गया। साँप का पक्ष जानने के लिए राजा ने राज्य  के प्रमुख नागरिकों की एक समिति, जिसमे बुद्धिमान, प्रतिभाशाली, प्रगतिशील विचारक और बुद्धिजीवी शामिल थे, से परामर्श लेने का  फैसला किया।  

समिति ने राजा को सलाह दी। राजा, सांप जहरीला होता है, यह लोगों को डँसता है। डँसना साँप का स्वभाव है। उसने अपने स्वभाव के अनुसार लोगों को डँसा  है। लोग साँप के डँसने से नहीं बल्कि साँप का जहर शरीर में जाने की वजह से मारे जाते हैं। साँप का इसमे कोई दोष नहीं है। इसे छोड़ देना चाहिए। जंगल से नगर में आने वाले साँपो को यदि हम दूध पिलाते रहेंगे तो शायद वह हमे काटेंगे नहीं।    

राजा ने साँप को छोड़ दिया और आदेश दिया नगर में जगह-जगह साँपों के लिए दूध का इंतजाम किया जाए। नतीजा यह हुआ जंगल से निकल सैंकड़ों साँप शहर में आ गए। अब वे बेकौफ़ हो कर लोगोंकों डँसने लगे। लोग जान बचाने के लिए शहर छोड़ भागने लगे। एक दिन राजा महल में घुसे एक साँप को दूध पिला रहा था की साँप ने मौका देख राजा को डंस लिया। साँप के डँसने से राजा की मौत हो गयी। बिना राजा के शहर में अराजकता फ़ैल गयी। आखिरकार शहर  वीरान हो गया। अब वहाँ सांपोंका राज है। 



मंगलवार, 5 जुलाई 2022

पुरानी दिल्ली की यादें (9) दंगा कथा: छोटे शैतान

मुझे याद है वह अगस्त का महिना था। उस दिन रविवार था। दिल्ली में अगस्त का महिना पतंगबाजी का महिना होता है। एक सड़क चांदनी चौक बाजार के पीछे से हौजकाजी की ओर जाती है। उस इलाके को लालकुआं कहते हैं।  लालकुआं  बाजार पूरी दिल्ली में पतंग और मांजे के लिए मशहूर  है। इसलिए  रविवार होते हुए भी लालकुआं की पतंगो की दुकानें खुली हुई थी। गोटू चार-पाँच दर्जन पतंगे और कुछ चरखे माँजा खरीदना चाहता था। वह 15 अगस्त को घर के सामने दुकान सजाकर छुट्टा माँजा और पतंगे बेचकर कुछ पैसा कमाना चाहता था। मैं भी साथ चल दिया। उसकी मदत करने के बदले में कुछ माँजा और दो-तीन पतंगे मुफ्त में मिलने की उम्मीद के साथ। 

सुबह के11 बज रहे होंगे, हम दोनों लालकुआं के बाजार पहुंचे। काफी भीड़ थी। पता नहीं क्या हुआ, अचानक पत्थरबाजी शुरू हो गई। लोगोंकों पत्थर फेंकते देख  हम चौंक गए। वहां से भाग लिए। मेन रोड से निकल कर हम एक संकरी गली में दाखिल हुए। यह गली सीधे चांदनी चौक की ओर जाती है। गली के सभी मकान 50-60 फीट ऊंचे है। हम गली में कुछ कदम आगे बढ़े ही थे की अचानक दो-चार पत्थर हमारे दायें-बाएँ गिरे। गर्दन घुमाकर पीछे देखा की 10-11 साल के 2 बच्चे एक छत पर खड़े होकर नीचे गली में पत्थरों की बारिश कर रहे थे। उन्हे जैसे ही अहसास हुआ हम उन्हे देख रहे हैं, वे बच्चे छत के कठडे से दूर हो गए। गोटू ज़ोर से चिल्लाया, हरामखोर शैतानों तुम्हें अभी सबक सिखाता हूँ। मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा, पहले अपनी जान तो बचालें। पता नहीं कहाँ-कहाँ से पत्थर बरस सकते हैं। हिसाब तो बाद में निपटा सकते हैं। बिना-दायें बाएँ या ऊपर-नीचे देख हम दौड़ते हुए तीन या चार मिनिटोंमें चांदनी चौक पहुंच गए। यहां सब कुछ शांत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लाल कुएं के इलाके में क्या चल रहा है, यहाँ शायद  किसी को पता नहीं था। हालाँकि उस समय  मैं 12-13 साल का था, फिर भी मुझमें इतना सामान्य ज्ञान था की आज की घटना को किसीको न बताया जाए। अगर घर में बताता, तो पहले पिताजी पूछते इतनी दूर क्या करने गया था। सच्चाई बताने पर पिटाई अवश्य होती। लेकिन गोटू उन नन्हें शैतानोंको सबक सीखना चाहता था। कम से कम उनके माँ-बाप को उनके बच्चोंके कारनामे बताना चाहता था। 

2-3 हफ्ते बाद मैं गोटू फिर मिला। मैंने उससे पूछा, छोटे शैतानों का कुछ पता चला। गोटू ने कहा कि वह पिछले रविवार को उस गली में गया था। लेकिन किस घर की छत से पत्थरों की बौछार हुई थी, जान नहीं पाया।  आसपास के लोंगो से पता चला उसदिन, उस गली में किसी का सिर फट गया था। उस आदमी की किस्मत अच्छी थी की जान बच गयी। बाद में पुलिस गली के कुछ लड़कों को पकड़कर थाने ले गई थी। मैंने कहा यह तो गलत हुआ, हमे पुलिस को सच्चाई बतानी चाहिए। गोटू ने मुस्कराते हुए  कहा मूरख, पहले पुलिस पूछेगी कि तुम वहाँ क्या कर रहे थे। पुलिस की मार तो पड़ेगी ही और कोई बचाने नहीं आया तो चक्की भी पीसनी पड़ेगी, समझे? मैंने कहा लेकिन जो पकड़े गए उनका क्या हुआ। "क्या होना था, पूरा मोहल्ला थाने पहुंच गया था। पुलिस ने उन बदमाश लड़कों की अच्छी तरह धुलाई की और दक्सिना लेकर सबको छोड़ दिया।" 

सूखे के साथ अक्सर गीला जलता ही है। कोई कसूर न होते हुए भी उन लड़कों को पुलिस की मार खानी पड़ी थी। थाने उनके नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गए होंगे।  लेकिन उस वक्त ज्यादातर मामले थाने में सुलझाए जाते थे। मुकदमे कम ही दर्ज होते थे। उस समय आज की तरह बात का बतंगड़ करनेवाला मीडिया भी नहीं था। छोटे-मोटे दंगों से राजनीतिक फायदा उठाने की प्रवृत्ति भी नहीं थी।

बाकी छत से फेंका पत्थर नीचे गली में किसी की जान ले सकता है इसका इल्म उन छोटे शैतानोंको शायद ही हो। लोगोंकों पत्थर फेंक देख उन्होंने भी पत्थर फेंके होंगे। सालों के बाद जब भी  आसमान में उड़ती पतंगे देखता हूँ,  मुझे उस दिन की याद आ जाती है, जब मैं मरते मरते बाल-बाल बचा था।