दशहरा केवल रावण के पुतले को जलाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के दोषों और बुराइयों पर विजय पाने की प्रेरणा देने वाला महान उत्सव है। रामायण में श्रीराम ने रावण का वध करके अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित की, यह कथा सबको मालूम है। इसी से प्रेरणा लेकर हमें भी अपने मन की बुरी प्रवृत्तियों, अनियंत्रित इच्छाओं और इंद्रियों के दोषों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। बाहर रावण का दहन करना प्रतीकात्मक है; असली अर्थ है भीतर के अहंकार, लोभ, मोह, असत्य और क्रोध का दहन करना।
मनुष्य के पास पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ होती हैं। आँखें, कान, नाक, जीभ और त्वचा ज्ञानेंद्रियाँ हैं; हाथ, पैर, वाणी, गुदा और जननेंद्रिय कर्मेंद्रियाँ मानी जाती हैं। इनका सही उपयोग हुआ तो वे ज्ञान और सदाचार की साधनाएँ बनती हैं; लेकिन विवेक का नियंत्रण न हो तो यही इंद्रियाँ मनुष्य को विकारों के अधीन कर देती हैं। आँखें लोभ और आसक्ति पैदा कर सकती हैं, कान निंदा और असत्य सुनने की आदत डाल सकते हैं, नाक और त्वचा सुखभोग की आसक्ति बढ़ा सकते हैं, जीभ की चंचलता स्वास्थ्य बिगाड़ सकती है और कटु वाणी संबंध तोड़ सकती है। हाथ चोरी या हिंसा कर सकते हैं, पैर गलत मार्ग पर ले जा सकते हैं। इसलिए इंद्रियों को दोष देने के बजाय उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना आवश्यक है।
धर्म के दस लक्षण मनुस्मृति में बताए गए हैं: “धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध।” इनका अर्थ है, धैर्य, क्षमाशीलता, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, शुद्धता, इंद्रियों पर संयम, विवेकपूर्ण बुद्धि, ज्ञान, सत्य का आचरण और क्रोध पर नियंत्रण। ये केवल धार्मिक विधियों तक सीमित नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन में अपनाने योग्य नैतिक मूल्य हैं। इनका पालन करने से मन शुद्ध होता है और इंद्रियों को सही दिशा मिलती है। यही असली रावणदहन है।
‘राम’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ आनंद और परमात्मा से जुड़ाव है। श्रीराम धर्म, कर्तव्य और आदर्श आचरण के प्रतीक हैं। जब हमारे भीतर विवेक, सत्य और सद्बुद्धि जागृत होती है, तब हम भी अहंकार पर नम्रता से, लोभ पर संतोष से, असत्य पर सत्य से और क्रोध पर क्षमा से विजय पा सकते हैं। यही जीवन का असली रावणवध है।
जब मनुष्य केवल अपने सुख का नहीं, बल्कि दूसरों और प्रकृति के कल्याण का विचार करता है, तब समाज में प्रेम और शांति का वातावरण बनता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश– इन पंचमहाभूतों का संतुलन बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। "यही सच्चा रामराज्य है, जो न्याय, नैतिकता, परस्पर सम्मान और प्रकृति की रक्षा पर टिका है।" दशहरे के बाद आने वाली दीपावली इस विचारयात्रा का अगला चरण है। दशहरा हमें विकारों पर विजय की प्रेरणा देता है, तो दीपावली अंधकार दूर कर प्रकाश का स्वागत करने का संदेश देती है। घर में दीप जलाने के साथ‑साथ हमें अपने अंतःकरण में भी ज्ञान, विवेक, प्रेम और सद्भावना के दीप प्रज्वलित करने चाहिए।
आइए, इस दशहरे पर हम संकल्प लें कि अपने भीतर के दोषों का दहन करेंगे और दीपावली पर
ज्ञान व सदाचार का दीप जलाएँगे। असली विजय दूसरों को हराने में नहीं,
बल्कि स्वयं के दोषों पर मात करने में है;
और असली प्रकाश केवल घर में नहीं,
बल्कि हमारे विचारों, व्यवहार और पूरे जीवन में फैलना चाहिए।


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