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शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

1 रावण

 

हर वर्ष दशहरा आता है

रावण फिर जलाया जाता है। 

रावण फिर भी मरता नहीं, 

मन में ही वह बस जाता है। 

 

काम, क्रोध, मोह की छाया, 

मत्सर, मद की गहरी माया। 

इनसे सज्जित रावण भीतर, 

जगता रहता हर पल, हर क्षण। 

 

बाहरी रावण जल भी जाए, 

भीतर का रावण जीवित पाए। 

जब तक दोष न मिटेंगे सारे, 

रावण रहेगा हमारे दिल में। 

 

राम बने जो अंतर्मन में, 

सत्य, धर्म के संग जीवन में। 

तभी होगा रावण का अंत, 

तभी मिलेगा विजय का मंत्र। 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

चुनावी टिकट चाहिए

 

जय
श्री राम का नारा देकर,
मोदीजी नेता बन गए।

संविधान की किताब उठाकर,
राहुलजी भी नेता बन गए।
 
जय भीम का जयघोष कर,
मायावती जी नेता बन गईं।

गांधी की तस्वीर दिखाकर,
आप भी नेता बन सकते
हैं।
 

गुरुवार, 24 जुलाई 2025

मतदान का अधिकार, हमारा हक


बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों की जांच पड़ताल की। फलस्वरूप लाखों नाम मतदाता सूची से कट गए। लाखों लोगों का मताधिकार छिन लिया गया। उसी पर चार लाइन:

मरे हुओं की आत्माएँ 
भटकती है जहाँ।  
उन्हे भी हक है 
मतदान करने का वहाँ। 

घुसपैठीयों का पसीना 
बहता है जहाँ।
उन्हे भी हक है
मतदान करने का वहाँ। 

डुप्लीकेट मतदाता भी 
बढ़ाते हैं मतदान जहाँ। 
उन्हे भी हक है
मतदान करने का वहाँ।

मत बदलो मतदाता सूची
चुनाव आयोग वालों। 
लोकतंत्र की रक्षा के लिए 
नकली मतदान जरूरी है।



बुधवार, 18 सितंबर 2024

चंचल मन


मन में द्वंद है
खुद से ही युद्ध है
फिर शांति कहाँ.

सपने दिखाता है
खुद को ही ठगता है
चंचल मन.

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

पापोंकी गाथा

सफेद कपड़ोसे

ढक दिया शरीर। 

छिपा दिये पाप 

सारे ज़िंदगी भरके।


अग्निमे स्वाहा 

हुआ शरीर 

खत्म हुआ

 हिसाब सारा । 


फिर भी 

मगरमच्छी आसूओंमे

भीगी  जी रही थी 

मेरे पापोंकी गाथा। 




 

बुधवार, 6 मार्च 2019

क्षणिकाएँ: वसंत


एक कली
खिल गयी
दर्पण देख 
शरमा गयी.

बसंती बयार में 
भटक गया जी 
भौरें के प्यार में 
डूब गई कली.
 
 बसंती बयार में 
दिल मेरा बौराया 
 क्षणिक प्रेम के लिए
विरह चिरंतन जिया.

वासंतिक फूल 
मुरझा गया
माटी को अपनी
 खुशबू दे गया.










गुरुवार, 17 जनवरी 2019

द्रोपदी का वस्त्र हरण



डर मत, घबरा मत 
कर विवस्त्र द्रोपदी को 
नचा उसको छमाछम 
भरे दरबार में आज . 

नाचेगी राजपथ पर 
कुलवधू आज 
वासनामयी नजरे 
बरसाएंगी सुवर्ण, 
द्रोपदी के नग्न तनु पर.

अनायस ही भर जायेगा
राजकोष भी आज. 

डर मत, घबरा मत .......धृ
 
जम गया है खून 
भीम  का आज
बाण अर्जुन के भी 
कुंद हो गए हैं आज
जुए को ही धर्म
मानता धर्मराज है आज.

डर मत, घबरा मत .......धृ

नहीं है आज कोई 
कृष्ण सुदर्शनधारी
डाल-डाल पर है बसेरा 
मांस नोचते गिद्धोंका
 धर्म न्याय के ज्ञाता 
भीष्म भी है सहमत
नाचेगी कुलवधू 
भरे दरबार में आज.

डर मत, घबरा मत .......धृ

चारण भाट गायेंगे 
नग्न तनु के गीत आज 
देह की गंध में डूबेगा 
अंधा धृतराष्ट्र आज.

डर मत, घबरा मत .......धृ
 

बुधवार, 14 नवंबर 2018

हायकू: दिल्ली की हवा


हवा दिल्ली की
हलाहल से विषैली 
धीमे-धीमे लेती प्राण. 

स्माग में देखा 
यम का चेहरा 
कंठ में आया प्राण.

मंगलवार, 6 नवंबर 2018

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

हायकू : सीता


(सीता किसान के खेत में उत्पन्न होती है.  उपज का एक हिस्सा राजा को कर के रूप में दिया जाता था.  जिसका प्रयोग राजा जनहित के लिए करता था, कृषकों की सुरक्षा करता था. परन्तु रावण ने भारतीय किसानों से  भरी कर इकठ्ठा कर लंका को सोने की बनाया. श्रीराम ने वह सीता  किसानों को लौटाई- हायकू में यही भाव प्रगट करने का प्रयास किया है)


खेत में मिली
सुवर्ण लक्ष्मी
किसान के.

कैद हुई 
दरबार में 
राजा के.

त्याग किया 
सीता का
वास्ते जनहित के.

लक्ष्मी के पैरोंसे 
उजियारा आया
घर किसान के. 


गुरुवार, 27 सितंबर 2018

कविता : कहाँ हुई गलती हमसे



(अल्पवयीन लड़कियों पर बलात्कार और उनकी घृणित हत्या. ऐसी घटनाएँ रोज हमारे  देश में क्यों हो रही है. आज का नौजवान  वासना के भंवर में क्यों डूब रहा है. कहाँ गलती हुई. अनेक प्रश्न मन में उठ रहे है.)

 
भरी दुपहरी में फैला क्यों
अमावस का अँधेरा आज.

किसने पैरों तले कुचल दी 
एक कमसिन कली आज.


माँ- बहनों के रिश्ते क्यों 
निरर्थक हो गए हैं आज.

ममता के कोख में क्यों 
पल रहे रक्त पिशाच आज.


वासना के भंवर में क्यों 
डूब रही जवानी आज.

कहाँ हुई गलती हमसे 
जो सजा भुगत रहे हैं आज. 


  

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

मौत का इंतजार


जनकपुरी के 
 डिस्ट्रीक्ट पार्क में



चार 'बूढ़े'
   
पथराई आँखोंसे 
 कर रहे थे
इन्तजार मौत का.

लेकिन दिखावा 
"रमी" खेलने का.
 

बुधवार, 19 सितंबर 2018

हायकू: छह ऋतु (अर्थ के साथ)


हायकू जापानी काव्यविधा है. अधिकतम १७ शब्द और तीन पंक्तियों में भाव को समेटने की कला. हेमंत, वसंत, ग्रीष्म, श्रावण, शरद और शिशिर इन्ही छह ऋतुओं को   हायकू के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया है.

हेमंत ऋतु-  बर्फ पिघलने लगती है. रातें ठंडी है परन्तु संकट के बाहर निकलने की राह भी दिख रही है. ऐसे में भविष्य के नए सपने दिल में जगेंगे ही.  

सर्द रातो में 
हृदय में जगे 
सपने बसंतके.

वसंत ऋतु- जंगल में फूल महकने लगते हैं. भौंरे फूलोंपर मंडराने लगते है. नर कोयल भी मीठी आवाज में मादा को लुभाने लगता है. काम पीड़ित शरीर गंध बैचैन कर देती है.  

पलाश जले 
कोयल कूके 
देह महके.

ग्रीष्म:-  कामदेव ने भस्म होना ही है. दिल टूट जाते है. प्रेमी बिछड़ जाते है.ग्रीष्म इसी विरह का प्रतिक है. बिरहन की व्यथा मीरा से बढ़कर कौन जान सकता है. 

 परदेसी पिया 
बिरहन राती
व्यथा मीरा की.

वर्षा ऋतु: धरती और आकाश के मिलन की ऋतु. बरसात में  दोनों एकाकार हो जाते है. तन और मन से भी. सौतिया डाह से जली-भुनी  राधा देखती है, यमुना तट पर सभी कृष्ण सभी गोपियोंके साथ नृत्य कर रहा है. कौन गोपी-कौन कृष्ण. राधा सत्य को जान लेती है. प्रेम में द्वैत समाप्त हो जाता है.  

कृष्ण कदम्ब
कालिंदी कुञ्ज
 वर्षा प्यार की.

शरद ऋतु:  प्रेम सृजनशील है. धरती से लक्ष्मी प्रगट होती है. सुख सम्पन्नता चहुं ओर छा जाती है. हर मनुष्य सुखी सम्पन्न व ऐश्वर्शाली बनना चाहता है. सन्तति के माध्यम से अमर भी होना चाहता है.

शरद चांदनी  
अमृत बरसे 
ऐश्वर्यका.

शिशिर ऋतु: पेड़ोंसे पत्ते गिरने के दिन. हम मृत्यु को जीवन की समाप्त नहीं अपितु सम्पूर्णता मानते है.  "ॐ त्र्यम्बकम यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम". यही भाव व्यक्त करने का प्रयास किया है. 
सुगंध फैला 
पक्व फलोंका 
पतझरी पत्तोंका.




सोमवार, 17 सितंबर 2018

क्षणिका : हिंदी पखवाडा




सितंबर का महिना 
श्राद्ध का पखवाडा 
ब्राह्मणों का जीमना 
और दक्षिणा पाना.

यही सब होता है हिंदी पखवाड़े में.

बुधवार, 22 अगस्त 2018

हायकू : ऋतु


(छहों ऋतुओंका वर्णन हायकू के माध्यम से करने का प्रयास किया है - हेमंत, वसंत, ग्रीष्म, श्रावण, शरद और शिशिर)

सर्द रातो में 
हृदय में जगे 
सपने बसंतके.

पलाश जले 
कोयल कूके 
देह महके. 

परदेसी पिया 
विरह व्यथा 
मीरा की.

कृष्ण कदम्ब
कालिंदी कुञ्ज
 वर्षा प्यार की.

शरद चांदनी  
अमृत बरसे 
ऐश्वर्यका .

सुगंध फैला 
पक्व फलोंका 
पतझरी पत्तोंका.



मंगलवार, 7 अगस्त 2018

कविता: जिंदगी क्या है.



जिंदगी क्या है? 

वसंत के सुहाने सपने
ग्रीष्म का कठोर संघर्ष 
बरसाती  वादे प्यार के
शरद की चांदनी सा संसार .
 या
बितता है समय केवल 
पतझड़ के इंतजार में!

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

कविता : दक्खनी हवाएँ




दक्खनी हवाएँ
सुगंधी हवाएँ
प्राण जगे 
*चंद्रापीड के.

दक्खनी हवाएँ
विषैली हवाएँ
प्राण हरे
हिमालय के. 


टिप:  वसंत ऋतु में मलयगिरी की सुगन्धित वायु हिमालय स्थित मानसरोवर तक पहुँची  तब जन्म-जन्मान्तर  से सोये चंद्रापीड देह में चेतना का संचार होता है - कादंबरी.  

आज जहरीली और स्मागी हवाएँ हिमालय  के ही प्राण ले रही है.