हर वर्ष दशहरा आता है,
रावण फिर जलाया जाता है।
रावण फिर भी मरता नहीं,
मन में ही वह बस जाता है।
काम,
क्रोध, मोह की छाया,
मत्सर, मद की गहरी माया।
इनसे सज्जित रावण भीतर,
जगता रहता हर पल, हर क्षण।
बाहरी रावण जल भी जाए,
भीतर का रावण जीवित पाए।
जब तक दोष न मिटेंगे सारे,
रावण रहेगा हमारे दिल में।
राम बने जो अंतर्मन में,
सत्य, धर्म के संग जीवन में।
तभी होगा रावण का अंत,
तभी मिलेगा विजय का मंत्र।

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