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सोमवार, 3 अगस्त 2026

गीता-दासबोध में तामसिक तप, लोकतंत्र और डॉ. आंबेडकर की चेतावनी


भारतीय दर्शन में 'तप' को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। परंतु तप को सात्त्विक, राजसिक और तामसिक इन तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। भगवद्गीता और दासबोध, इन दोनों ग्रंथों ने तामसिक तप के स्वरूप को स्पष्ट किया है। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी इन विचारों का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।
 
समर्थ रामदास स्वामी दासबोध में कहते हैं,
 
दुसऱ्याचा प्राण घ्यावा। आपला आपण स्वयें द्यावा।
विसरवी जीवभावा। तो तमोगुण॥”
 
इस ओवी (छंद) में उन्होंने जीवन-मूल्यों को भुला देने वाली प्रवृत्ति को 'तमोगुण' कहा है। हिंसा चाहे किसी भी रूप में हो, आत्महत्या के रूप में हो या दूसरे की जान लेने के रूप में, वह जीवन की पवित्रता को नकारने वाली ही सिद्ध होती है।
 
भगवद्गीता के 17वें अध्याय में तामसिक तप का वर्णन इस प्रकार है,
 
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥
 
अर्थात्, जो तप मूर्खतापूर्ण हठ से, स्वयं को पीड़ा देकर या दूसरों को नष्ट करने के उद्देश्य से किया जाता है, वह तामसिक कहलाता है। आगे के श्लोकों में ऐसे तप को "आसुरी संकल्प" कहा गया है। अहंकार, पाखंड और काम-राग (वासना) से प्रेरित होकर किया गया घोर तप आध्यात्मिक प्रगति का नहीं, बल्कि अधोगति (पतन) का लक्षण है।
 
लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियां बदलने का मार्ग संगठन, चुनाव और संसदीय प्रक्रिया है। अनशन, आत्म-पीड़ा या जान जोखिम में डालकर सरकार को झुकाने का प्रयास करना एक तामसिक मार्ग सिद्ध होता है। यदि इस मार्ग से सफलता मिलने लगी, तो हर असंतुष्ट समूह संवैधानिक मार्ग छोड़ देगा और अराजकता का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि जब संवैधानिक मार्ग उपलब्ध हों, तब सत्याग्रह और असहयोग जैसे मार्ग "अराजकता का व्याकरण" (Grammar of Anarchy) सिद्ध होंगे। अर्थात्, लोकतंत्र में असंतोष व्यक्त करने के लिए हिंसक या आत्म-पीड़ा के मार्ग अपनाना अराजकता की ओर पहला कदम है।
 
स्वतंत्रता के बाद कुछ आंदोलनकारियों ने अनशन करके सरकार पर दबाव बनाया। कुछ स्थानों पर सरकार झुकी भी, परंतु बाद में ऐसी पद्धतियों का दुरुपयोग बढ़ गया और समाज में अस्थिरता पैदा हुई। इससे कोई दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव नहीं हुए; इसके विपरीत समाज में नकारात्मकता और हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला।
 
लोकतंत्र एक नदी की तरह है, जिसका प्रवाह संगठन, चुनाव और संसदीय प्रक्रिया रूपी किनारों से नियंत्रित होता है। यदि ये किनारे टूट जाएं और आत्म-पीड़ा का प्रवाह बहने लगे, तो वह समाज को अराजकता के महासागर में ले जाएगा।
 
गीता और दासबोध दोनों यही सिखाते हैं कि खुद को पीड़ा देना या दूसरों को कष्ट देना तप नहीं, बल्कि तमोगुण है। तप तो प्रकाश का मार्ग है; जबकि आत्म-पीड़ा अंधकार का जाल है।
 
लोकतंत्र में ऐसे मार्गों का अवलंबन करना अराजकता को निमंत्रण देना है। इतिहास गवाह है कि ऐसे तामसिक तप से तात्कालिक आक्रोश तो पैदा होता है
, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम समाज के लिए घातक होते हैं। इसीलिए संवैधानिक, संगठनात्मक और विवेकपूर्ण मार्ग ही वास्तविक 'सात्त्विक तप' है।

बुधवार, 1 जुलाई 2026

समर्थ रामदास का कृषि-दर्शन (जल प्रबंधन, बहुफसली खेती और किसान समृद्धि का कालजयी संदेश)

 



समर्थ रामदास कहते हैं :  

दी का जल यदि यूँ ही बह जाए तो वह व्यर्थ चला जाता है; किंतु उसी जल को बाँधों में रोककर, नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाए और उसका विवेकपूर्ण प्रबंधन किया जाए, तो वही जल धरती को स्वर्ण के समान मूल्यवान उपज प्रदान करता है।

जल और परिश्रम के समुचित संगम से खेतों में आम, अंजीर, गन्ना, अंगूर, केले तथा अनेक प्रकार की फसलें लहलहाती हैं। प्रकृति का सम्मान, जल का संरक्षण और खेती में विविधता-यही किसान की समृद्धि का आधार है। 

एक टीवी चैनल पर एक छोटे किसान की कहानी दिखाई गई थी। अपने छोटे-से खेत में उसने अनेक प्रकार की फसलें, सब्जियाँ और फल उगाकर अच्छी आय का स्रोत बनाया था। वह कार्यक्रम देखते समय मुझे समर्थ रामदास जी की उपर्युक्त पंक्तियाँ याद आ गईं।

पुराणों में एक प्रसिद्ध उक्ति है- "जो कृषि करता है, वही ऋषि है।" हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं करते थे, बल्कि खेती भी करते थे। वैदिक काल में उनके आश्रम कृषि अनुसंधान के भी केंद्र थे। संभवतः इसी कारण भारत की कृषि परंपरा में इतनी विविधता विकसित हुई। समर्थ रामदास भी एक महान ऋषि थे।

समर्थ रामदास ने बारह वर्षों तक पूरे देश का भ्रमण किया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने किसानों के जीवन और उनकी समस्याओं को निकट से देखा-समझा। उन्होंने अनुभव किया कि जल का उचित प्रबंधन और फसलों की सही योजना बनाए बिना किसान समृद्ध नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने किसानों की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी बताए।

समर्थ कहते हैं कि नदियों का जो पानी व्यर्थ बह जाता है, उसे बाँधों के माध्यम से रोकना चाहिए। नहरें बनाकर पानी खेतों तक पहुँचाना चाहिए और उपलब्ध जल का योजनाबद्ध उपयोग करना चाहिए। जितना पानी उपलब्ध हो, उसी के अनुसार फसलों का चयन करना चाहिए तथा प्रत्येक फसल को उसकी आवश्यकता के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।

वे यह भी कहते हैं कि खेत में एक ही प्रकार की फसल लेने के बजाय अनेक प्रकार की फसलें उगानी चाहिए। अक्सर किसान अधिक लाभ की आशा में पूरे खेत में केवल एक ही फसल बो देते हैं। लेकिन यदि तूफान, तेज हवा, कम या अधिक वर्षा अथवा कीटों का प्रकोप हो जाए, तो पूरी फसल नष्ट हो जाती है और किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

कई बार किसी नकदी फसल के अधिक लाभ के लालच में किसी क्षेत्र के अधिकांश किसान वही एक फसल उगाने लगते हैं। परिणामस्वरूप जब वह फसल एक साथ बाजार में आती है, तो उसकी कीमतें गिर जाती हैं और किसानों को भारी आर्थिक हानि होती है। टमाटर, प्याज जैसी फसलों के दामों में अचानक आने वाली गिरावट का यह भी एक प्रमुख कारण है।

लगातार नुकसान होने से किसान कर्ज के बोझ तले दब जाता है। प्रायः आत्महत्या करने वाले अधिकांश किसान वे होते हैं, जिन्होंने केवल एक ही फसल पर निर्भरता रखी होती है। यदि खेत में अनेक प्रकार की फसलें उगाई जाएँ, तो किसी एक फसल के नष्ट होने पर भी अन्य फसलें किसान को सहारा दे सकती हैं और उसकी आर्थिक स्थिति इतनी विकट नहीं बनती।

समर्थ आगे कहते हैं कि खेत की उपयुक्त जगहों पर विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष भी अवश्य लगाने चाहिए। ये वृक्ष एक ओर तेज हवाओं से फसलों की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर अपने फलों से किसान की आय का अतिरिक्त स्रोत भी बनते हैं।

यदि आज भी किसान समर्थ रामदास द्वारा बताए गए इन सिद्धांतों—जल संरक्षण, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, फसलों की विविधता तथा फलदार वृक्षों के रोपण—को अपनाएँ, तो वे अपनी खेती को सचमुच "सुवर्ण फसल" देने वाली बना सकते हैं।

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

समर्थ विचार: (स्वामी बनो, कुत्ते मत बनो)

 
समर्थ रामदास कहते हैंसृष्टि में अनगिनत जीव हैं, परन्तु वे चार वर्गों में बाँटे जा सकते हैं: बद्ध, मुमुक्षु, साधक और सिद्ध। पहला प्रश्न है: बद्ध कौन है? बद्ध अर्थात् बाँधा हुआ जीव।
 
समझाने के लिए मैं एक उदाहरण देता हूँ। एक व्यक्ति अपने कुत्ते को जंजीर से बाँधकर घूमने ले जाता है। यदि कुत्ता प्रशिक्षित है तो वह मालिक के पीछे-पीछे चलता है। परन्तु अक्सर कुत्ता आगे भागता है और मालिक जंजीर पकड़े हुए पीछे-पीछे दौड़ता है। कभी-कभी कुत्ता जंजीर तोड़कर किसी को काट लेता है, और फिर झगड़े, खर्च, अदालत तक की नौबत आती है। मालिक को सुख नहीं मिलता, केवल दुःख मिलता है। वास्तव में मालिक ही कुत्ते के मोह में बंध जाता है। इसी प्रकार हमारी इन्द्रियाँआँख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श, हाथ, पैरसब कुत्तों जैसी हैं। यदि हम इनके मोह में फँस गए तो हम इनके गुलाम बन जाते हैं। समर्थ कहते हैं:
 
अब बद्ध तो जानिए ऐसा
अंधों में अंध जैसा।
नेत्रविहीन दसों दिशा,
शून्याकार।
 
जिसके सामने केवल अंधकार है, उसे सही विचार समझ में नहीं आता। उसे धर्म, परोपकार, दान, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, ध्यान, मोक्ष का पता नहीं होता। वह काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ में डूबा रहता है।

जैसे कोई विद्यार्थी मोबाइल गेम में इतना डूब जाए कि पढ़ाई भूल जाए, वैसे ही बद्ध जीव इन्द्रियों के मोह में जीवन का असली उद्देश्य भूल जाता है।
 
समर्थ कहते हैं कि ऐसा जीव शरीर, वाणी और मन से धन के पीछे लगा रहता है। स्वार्थ के लिए छल करता है, भ्रष्टाचार करता है, हिंसा करता है। अन्त में उसे अदालत, जेल और बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इन्द्रिय सुखों का अधिक उपभोग शरीर और मन को रोगग्रस्त कर देता है।
 
समर्थ ने तीन सौ पचास वर्ष पहले जो बद्ध के लक्षण बताए थे, वे आज भी दिखते हैं। हम घर रहने के लिए नहीं, बल्कि एसी, टीवी, फ्रिज से सजाने के लिए बनाते हैं। स्नान स्वच्छता के लिए नहीं, सौन्दर्य के लिए करते हैं। भोजन पोषण के लिए नहीं, स्वाद के लिए करते हैंपिज़्ज़ा, बर्गर, चॉकलेट। कारें और वस्तुएँ केवल दिखावे के लिए लेते हैं। माता-पिता और बच्चे बोझ लगते हैं, पर कुत्ता पालकर शौक पूरा करते हैं।
 
आज बहुत लोग सोशल मीडिया परलाइक्सपाने के लिए भागते हैं। परन्तु अन्त में उन्हें शान्ति नहीं मिलती, बल्कि मानसिक तनाव बढ़ता है। यही बद्ध का लक्षण है।
 
यदि हम इन्द्रिय रूपी कुत्तों के गुलाम बन गए, तो परिणाम शरीर और मन दोनों पर पड़ते हैं। त्वचा रोग, अस्थमा, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, लिवर-किडनी की खराबी, आँखों का अंधापनजीवन टूट जाता है और कमाया हुआ धन दवाइयों में डूब जाता है। मन अवसाद, चिंता, अनिद्रा, नशे में फँस जाता है; कुछ लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं। वृद्धाश्रमों में भीड़ बढ़ती है, जो टूटे रिश्तों की गवाही देती है।
 
अत्यधिक उपभोग से पृथ्वी का पर्यावरण बिगड़ता हैहवा-पानी विषाक्त होते हैं, जंगल नष्ट होते हैं, ऋतुओं का ताल बिगड़ता है। इसी लोभ से शासन की साम्राज्यवादी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं, संसाधनों पर कब्ज़े के लिए युद्ध होते हैं, और मानवता को विनाशकारी परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
 
बद्ध जीव संसार में असफल रहता है और परमार्थ भी प्राप्त नहीं कर पाता। उसकी स्थिति धोबी का कुत्ता घर का, घाट का जैसी होती है। समर्थ ने लगभग सौ बद्ध लक्षण बताकर हमें सावधान किया है। हमें इन्द्रियों के मोह में फँसकर इंद्रिय रूपी कुत्तोंका स्वामी बनना चाहिएकुत्ता नहीं.