भारतीय दर्शन में 'तप' को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। परंतु तप को
सात्त्विक, राजसिक और तामसिक इन तीन श्रेणियों में विभाजित
किया गया है। भगवद्गीता और दासबोध, इन दोनों ग्रंथों ने
तामसिक तप के स्वरूप को स्पष्ट किया है। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी इन
विचारों का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।
समर्थ रामदास स्वामी दासबोध में कहते हैं,
“दुसऱ्याचा प्राण घ्यावा। आपला आपण स्वयें
द्यावा।
विसरवी जीवभावा। तो तमोगुण॥”
इस ओवी (छंद) में उन्होंने जीवन-मूल्यों को भुला देने वाली
प्रवृत्ति को 'तमोगुण' कहा है। हिंसा चाहे किसी भी रूप में हो, आत्महत्या
के रूप में हो या दूसरे की जान लेने के रूप में, वह जीवन की
पवित्रता को नकारने वाली ही सिद्ध होती है।
भगवद्गीता के 17वें अध्याय में तामसिक तप का वर्णन इस प्रकार है,
“मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥”
अर्थात्, जो
तप मूर्खतापूर्ण हठ से, स्वयं को पीड़ा देकर या दूसरों को
नष्ट करने के उद्देश्य से किया जाता है, वह तामसिक कहलाता
है। आगे के श्लोकों में ऐसे तप को "आसुरी संकल्प" कहा गया है। अहंकार,
पाखंड और काम-राग (वासना) से प्रेरित होकर किया गया घोर तप
आध्यात्मिक प्रगति का नहीं, बल्कि अधोगति (पतन) का लक्षण है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियां बदलने का मार्ग संगठन, चुनाव और संसदीय प्रक्रिया है। अनशन,
आत्म-पीड़ा या जान जोखिम में डालकर सरकार को झुकाने का प्रयास करना
एक तामसिक मार्ग सिद्ध होता है। यदि इस मार्ग से सफलता मिलने लगी, तो हर असंतुष्ट समूह संवैधानिक मार्ग छोड़ देगा और अराजकता का खतरा
उत्पन्न हो जाएगा।
संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्पष्ट किया
था कि जब संवैधानिक मार्ग उपलब्ध हों, तब सत्याग्रह और
असहयोग जैसे मार्ग "अराजकता का व्याकरण" (Grammar of Anarchy) सिद्ध होंगे। अर्थात्, लोकतंत्र में असंतोष व्यक्त
करने के लिए हिंसक या आत्म-पीड़ा के मार्ग अपनाना अराजकता की ओर पहला कदम है।
स्वतंत्रता के बाद कुछ आंदोलनकारियों ने अनशन करके सरकार पर
दबाव बनाया। कुछ स्थानों पर सरकार झुकी भी, परंतु बाद में ऐसी पद्धतियों का दुरुपयोग बढ़ गया और समाज में अस्थिरता
पैदा हुई। इससे कोई दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव नहीं हुए; इसके
विपरीत समाज में नकारात्मकता और हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला।
लोकतंत्र एक नदी की तरह है, जिसका प्रवाह संगठन, चुनाव और संसदीय
प्रक्रिया रूपी किनारों से नियंत्रित होता है। यदि ये किनारे टूट जाएं और
आत्म-पीड़ा का प्रवाह बहने लगे, तो वह समाज को अराजकता के
महासागर में ले जाएगा।
गीता और दासबोध दोनों यही सिखाते हैं कि खुद को पीड़ा देना
या दूसरों को कष्ट देना तप नहीं, बल्कि
तमोगुण है। तप तो प्रकाश का मार्ग है; जबकि आत्म-पीड़ा
अंधकार का जाल है।
लोकतंत्र में ऐसे मार्गों का अवलंबन करना अराजकता को
निमंत्रण देना है। इतिहास गवाह है कि ऐसे तामसिक तप से तात्कालिक आक्रोश तो पैदा
होता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम समाज के लिए
घातक होते हैं। इसीलिए संवैधानिक, संगठनात्मक और विवेकपूर्ण
मार्ग ही वास्तविक 'सात्त्विक तप' है।
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