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शनिवार, 20 सितंबर 2025

मोगरे की वेणी

 

करीब ३५ साल बाद वे दोनों फिर मिले। बाल सफेद हो चुके थे, चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लेकिन आंखों में पहचान अब भी ताज़ा थी। उसे आखिरी मुलाकात याद आई—नेहरू पार्क। उसके बालों में मोगरे के फूलों की वेणी थी, वह उसके करीब बैठी थी। उसने वेणी को सूंघने का बहाना करते हुए उसके गाल पर हल्का सा चुंबन लिया।

“दूर हटो! क्या समझा तुमने? अभी तो हमारी शादी भी नहीं हुई,” वह नाराज़ होकर बोली।

“तो फिर कब पूछोगे अपने पिताजी से? मुझे नौकरी लगे एक साल हो गया है।”

“मेरे पापा एक किराए के मकान में रहने वाले लड़के से अपनी बेटी की शादी नहीं करेंगे।”

“तो क्या हम ऐसे ही रहेंगे?”

“मैं सरकारी नौकरी के लिए कोशिश कर रही हूं। एक बार नौकरी लग गई तो पापा से कहूंगी—एक स्मार्ट, थोड़े बेअक्ल, लेकिन कंजूस लड़के से शादी करनी है। हमारी दोनों की तनख्वाह में घर चल जाएगा। पापा मना नहीं करेंगे, मुझे यकीन है।”

“मैं कंजूस?”

“तो क्या! अपनी प्रेमिका को चाणक्य सिनेमा में ६५ पैसे की पहली पंक्ति की टिकट दिलाने वाला, एक रुपए का पॉपकॉर्न और एक कप कॉफी दोनों के लिए। क्या मजनू है मेरा! वैसे, तुम्हारे माता-पिता से पूछा क्या?”

“दूध देने वाली गाय को कौन मना करता है।”

उसने उसकी पीठ पर ज़ोर से थप्पड़ मारा।

“अरे! कितना ज़ोर से मारती हो!”

“अरे नहीं, अब ‘पत्नी जी’ कहना सीखो।”

“मतलब शादी के बाद भी मारोगी?”

“हां, लेकिन बेलन से।”

उसके बाद वह कभी नहीं मिली। बाद में पता चला कि उसने मुंबई में एक सरकारी दफ्तर में नौकरी जॉइन की थी। उसकी शादी भी हो गई थी। वह कोई देवदास नहीं था। उसने अपनी मां की पसंद की लड़की से शादी कर ली।

“कैसी हो?” उसने पूछा।

वह बोली, “नाराज़ तो नहीं हो मुझसे? मेरे पापा को हमारे रिश्ते के बारे में पता चल गया था। मुझे तुमसे दूर करने के लिए उन्होंने चाल चली। मां ने कसम दिलाई। तुम भी वहां नहीं थे। मजबूरी में पापा की इच्छा माननी पड़ी।”

“तुम्हारे पति क्या करते हैं?”

“अब वे जीवित नहीं हैं। एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर थे, लेकिन शराब और जुए की लत में डूब गए। नशे में वे शैतान बन जाते थे। सारा गुस्सा मुझ पर निकालते थे। कुछ ही सालों में वे चले गए। बेटा भी पिता की राह पर चला। शराब ने उसकी भी जान ले ली। अब शायद रिटायरमेंट के बाद वृद्धाश्रम जाना पड़े। किस्मत है सबकी अपनी। तुम्हारा क्या?”

“तुम्हारी शादी की खबर सुनकर मुझे गुस्सा आया था। लेकिन मां ने समझाया—जिंदगी ऐसी ही होती है। मैंने मां की पसंद से शादी की। शादी के बाद एक बार पत्नी के साथ ओडियन में बालकनी की टिकट लेकर ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म देखी।" बोलते समय एक उदास मुस्कान उसके चेहरे पर तैर गयी। 

“वाह! किस्मत वाली है वो—प्रेमिका के लिए ६५ पैसे की टिकट और पत्नी के लिए बालकनी!” कहते हुए उसने जीभ काट ली।

उसकी नजर सड़क पर मोगरे की वेणी बेचने वाले दुकानदार पर गई। मन में ख्याल आया—उसके सफेद बालों पर भी मोगरे की वेणी खूब जचेगी। वह रुका, पूछा, “वेणी लोगी?”

“हां, ले लो! अपनी पत्नी के लिए। मुझे भी मोगरे की वेणी पसंद है।”

उसने दो वेणियां लीं। एक उसके हाथ में दी।

उसने कहा, “तुम्हें भूलने की बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं भूल पाई। उनके जाने के बाद तो बस तुम्हारी ही याद आती थी। कभी लगता था शायद तुम अब भी मेरा इंतज़ार कर रहे हो, कभी लगता था तुम्हारा भी परिवार होगा। खुद को समझाने की बहुत कोशिश की। जब तुम्हारी याद बेकाबू हो जाती, तो बाजार जाकर मोगरे की वेणी खरीदती, कमरे का दरवाज़ा बंद करके बालों में वेणी सजाकर आईने के सामने खड़ी होकर रोती... आज भी रोऊंगी।” कुछ पल दोनों चुप रहे। तभी उसकी बस आई और वह चली गई।

कुछ देर बाद उसकी नजर हाथ में पकड़ी मोगरे की वेणी पर गई। उसने  पत्नी के कहने के बावजूद भी कभी भी अपनी पत्नी के लिए वेणी नहीं खरीदी थी। और आज... उसके मन में विचारों का तूफान उठा। शादी से पहले उसकी पत्नी ने भी सप्तरंगी संसार के सपने देख होंगे। लेकिन हकीकत में ज़िंदगी भर वह पति की कम तनख्वाह में घर चलाने की जद्दोजहद करती रही। उसने अपनी सारी इच्छाएं मार दीं। कभी कुछ मांगा नहीं, कभी ज़िद नहीं की। उसे याद आया—कई बार उसके और बच्चों के टिफिन भरने के बाद सब्ज़ी बचती ही नहीं थी। जब पूछता, “अरे! तुम्हारे लिए सब्ज़ी नहीं बची?” तो वह कहती, “मैं अपना देख लूंगी।” अक्सर अचार या तेल-नमक-मिर्च के साथ रोटी खाकर भूख मिटा लेती। उसने भी उसे तन और मन से प्यार किया था। बदले में उसने क्या दिया? क्या मैंने कभी दिल से उसे प्यार किया?

उसने ठान लिया—अब सब भूलकर फिर से जीवन की शुरुआत करनी है।घर जाकर उसने अपने हाथों से पत्नी के सफेद बालों में मोगरे की वेणी सजाई..

 

सोमवार, 30 मई 2022

पुरानी दिल्ली की यादें (5): गोटू और क्रिकेट की गेंद


उस समय मेरी उम्र 12-13 साल की थी। थोडा बडा हो गया था। अपने दोस्तों के साथ छूटियों में क्रिकेट खेलने जाने लगा था। गर्मी की छूटियों में  जहां हम सुबह घूमने जाते थे। वहीं दशहरे और क्रिसमस की छूटियों  क्रिकेट खेलने। पुरानी दिल्ली में मोरीगेट के बाहर क्रिकेट खेलने के लिए एक बड़ा मैदान था। मैदान का एक हिस्सा स्टीफन कॉलेज का था।  इसलिए लोग उस मैदान को स्टीफन ग्राउंड के रूप में जानते थे। छुट्टियों के दौरान, 25-30 क्रिकेट टीमें मैदान पर खेलती थीं। खेलते समय सावधानी बरतनी पड़ती थी। कहीं से भी गेंद आके सर  पर लग सकती थी।  हमारी टीम में 5-6 मराठी लड़के, आस पास के गली मोहल्ले के हिन्दू और मुस्लिम लड़के हमारी टीम में आते-जाते खेलते थे।आखिर 11 लड़कों की टीम जो पूरी करनी होती थी। हम सभी सभी गरीब या निम्न मध्यम वर्ग के थे। उस समय एक कॉर्क बॉल 2-3 रुपये में आता था। हम सब दस पैसे से चवन्नी मिलाकर बॉल खरीदते थे।  मैदान में अमीर लड़के सफेद कपड़े, अच्छी क्वालिटी के बल्ले हाथ में लिए, क्रिकेट की गेंद से क्रिकेट खेलते थे। उस समय भी क्रिकेट बॉल की कीमत 10-15 रुपये हुआ करती थी। हमारा उनसे ईर्ष्या होना स्वाभाविक था। हमने कभी सोचा नहीं था की कभी हम भी क्रिकेट की गेंद से क्रिकेट खेल सकेंगे। 

वह शायद दशहरे की छुट्टी का पहला ही दिन था। हमें मैदान में गोटू मिला। उसके पास क्रिकेट की 2-3 गेंदें थीं। वह नई गेंद चार से पाँच और कुछ ओवर पुरानी दो से तीन रुपए में बेच रहा था। हमने भी उससे एक गेंद खरीद ली। परंतु मेरे एक दोस्त को शक हुआ, उसने गोटू से पूछा, इतनी सस्ती गेंदें कहां से लाते हो। गोटू ने रौब से कहा, उसकी जान पहचान डीडीसीए (दिल्ली जिला क्रिकेट संघ) में है। मैच खत्म होने पर डीडीसीए वाले पुरानी गेंदों को अपने जान पहचान वोलों को  सस्ते में बेच देते हैं। कुछ गेंदें एक-दो ओवर भी पुरानी भी होती है। वह ऐसी गेंदों को एक दर्जन के भाव पर खरीदता है। 2-4 रुपए में पुरानी, ​​नई गेंद 3 से 5 रुपये में। हमने उससे क्रिकेट गेंदें खरीदना शुरू किया। कभी 2 रुपए में तो, कभी 3 रुपए में।  गोटू भी क्रिकेट अच्छा खेलता था। कभी-कभी सुबह हमारे साथ खेलने आ जाता था। हमने कभी भी उससे उसका असली नाम नहीं पूछा।  

स्कूल को क्रिसमस की छुट्टियाँ लगी थी। हमने गोटू को क्रिकेट की गेंद के लिए कहा था। लेकिन हमारे मैदान में पहुँचने से पहले ही उसने दूसरी टीम को गेंद बेच दी थी। हमारा उससे काफी झगड़ा हुआ। काफी कहा सुनी हुई। आखिर हार कर गोटू ने  कहा कि वह आज सुबह 11 बजे फिरोजशाह कोटला  जाएगा। यदि गेंद मिलती है तो कल सुबह हमें लाकर देगा। जाहीर था, हमें उस पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने और मेरे दोस्त ने उसके पीछे जाने फैसला किया।  हमारा मकसद था, यह जानना की वह किससे गेंद खरीदता है। एक बार जब यह पता लग जाएगा तो हम भी उस आदमी से थोक में  गेंद खरीद सकते हैं। हम भी उसकी तरह  गेंद को बेचकर पैसा कमा सकते है। बड़ा नायाब आइडिया था। सुबह करीब 11 बजे मैं और मेरा दोस्त पैदल चलते हुए दिल्ली गेट पहुंचे। पहले फिरोजशाह कोटला स्टेडियम उतना बड़ा नहीं था, जितना आज है। एक सड़क दिल्ली गेट से राजघाट की ओर जाती है। एक तरफ पुरानी दिल्ली की दीवार। दीवार के पीछे दरियागंज और सामने बगीचा। सड़क के दूसरी ओर फुटबॉल स्टेडियम, बस स्टैंड और एक गली है जो सीधे फिरोजशाह कोटला स्टेडियम की ओर जाती है। स्टेडियम  की दीवार और गली के बीच  एक छोटा सा मैदान था। मैदान के एक हिस्से में प्रक्टिस के लिए नेट बने हुए थे। और  बीचोबीच क्रिकेट की पिच थी। डीडीसीए के ज्यादातर लीग मैच वहीं होते थे। हम वहां पहुंचे, तो हमने देखा कि गोटू मैदान के बाहर सड़क के किनारे बैठा हुआ था। मैदान में क्रिकेट मैच चल रहा था। हमें देखकर वह चौंक गया। उसने हमसे कहा, " धंधे का राज को जानने आए हो? मुझ पर विश्वास नहीं है, क्या?"  मैंने कहा, विश्वास होता तो यहां क्यों आते। बाकी हम तेरे काम में दखल नहीं देंगे।  हमें सिर्फ क्रिकेट की गेंद चाहिए। (बचपन से ही हम स्वार्थी हो  जातें है,  12 साल की उम्र में भी सफ़ेद झूठ बोलना सीख लिया था।) उसने कहा कि अभी मैच चल रहा है, हमें यहां कुछ देर धूप में बैठना होगा। मैंने उससे कहा, इतनी दूर से बैठकर खेल देखने से अच्छा थोड़ा आगे पेड़ के नीचे छांव में बैठते है। वहाँ से खेल देखने का मजा भी ज्यादा आयेगा। वो बस मुस्कुराया और कहा, अब तुम आ ही गए हो तो चुपचाप यहीं बैठो और तमाशा देखो। झकमार कर हम दोनों उसके साथ तेज धूप में चुपचाप बैठे रहे। कुछ ही देर बाद बल्लेबाज ने गेंद को जोर से मारा और गेंद हमारी दिशा में उछलकर आई। ऐसा लग रहा था कि गोटू इसी पल का इंतजार कर रहा था। उसने गेंद को उठाया और चिल्लाया, भागो भागो। एक पल के लिए हमें कुछ समझ नहीं आया, लेकिन हमने उसे दौड़ते हुए तेजी से सड़क पार करते हुए देखा, डर के मारे  बिना कुछ विचार किए हम दोनों उसके पीछे भाग लिए।  तेज भागतेट्राफिक को नजरंदाज करके हमने रोड क्रॉस किया। भगवान का शुक्र है, हमारा आक्सीडेंट नहीं हुआ। दरियागंज दीवार में बने एक छेद से अंदर घुसने के बाद ही चैन की सांस ली। गोटू ने हमारी तरफ देखकर  हँसते  हुए कहा, क्यों आया न मजा। अबे बेवकूफों की तरह क्यों बैठे रहे। थोड़ी और देर हो जाती तो, पकडे जाते। बहुत मार पड़ती है। कभी कभी तो पुलिस को भी सौंप देते हैं। जान हथेली पर रख कर गेंद जुटता हूँ तुम्हारे लिए, फिर भी भरोसा नहीं करते हो।

मेरे मन में ख्याल आया कि अगर मैं पकड़ा गया होता तो....  शायद बहुत पिटाई होती। घर वालों को पता लगता तो, कल्पना करना भी असंभव था। क्रिकेट खेलना तो बंद हो ही जाता। और तो और,गली-मोहल्ले में लोग चोट्टा कहकर पुकारते। मैंने हिम्मत करके उससे पूछ ही लिया की वह यह सब क्यों करता है। एक पल के लिए  उसकी आँखों में पानी आ गया, उसने कहा कि उसके दो छोटे भाई और एक बहन है। उसकी मां का दो साल पहले निधन हो गया था, उसके पिता ने दूसरी शादी की। उसके पिता साप्ताहिक बाजारों में शाम को सब्जी की रेडी लगाते हैं। वह इस काम में अपने पिता की मदद करता है। लेकिन पिताजी उसे जेब खर्ची के लिए छदाम भी नहीं देते। सौतेली मां उनके लिए कुछ नहीं लाती। अगर वह अपने पिता से उसकी शिकायत करता है, तो वे उल्टे उसे ही पीट देते हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर कमाए पैसों से  वह छोटे भाई-बहनों के लिए  मिठाई, कपड़े आदि खरीदता है। उस उम्र में मुझे नहीं पता था कि आगे क्या कहूं। मैं चुप ही रहा। कुछ लोगों के लिए जिंदगी की डगर बहुत ही  मुश्किल होती है। यही सच है। उसने हमसे वादा किया कि वह आज की घटना के बारे में हमारे टीम में किसी को नहीं बताएगा। उसने अपना वादा निभाया। मैं और मेरे दोस्त ने भी इस घटना का जिक्र किसी से न करने की कसमें खाई। कई सालों तक इस राज को हमने किसी पर जाहीर नहीं किया। सच जानने के बावजूद भी अगले दो-तीन साल हम उससे गेंद खरीदते रहे। बाद में वह मुझे दिखाई नहीं दिया। आज सोचता हूँ सारे चोर बाजार हमारे जैसे स्वार्थी, मतलबी लोगों की वजह से ही चलते है।  परंतु जब खुद के घर में चोरी होती है, तब हम पुलिस और सरकार को गालियां देते हैं। जब की इसके दोषी हम खुद होते हैं। 

  पुरानी दिल्ली की यादें (6): जमुना किनारा

बुधवार, 1 अगस्त 2018

मोगरा फुलोंकी सुगंध


बस स्टेन्ड पर खड़ा वह बस का इन्तजार कर रहा था. बालों में मोगरा फूलों का गजरा लगाये वह भी बस के इंतजार में  खड़ी थी. रिमझिम बारिश हो रही थी. अचानक धडाSSSम बिजली कड़की. उईsss माँ, घबराकर वह सीने लिपट गई. क्षणभर के लिए. सॉरी! कहते हुए वह दूर हुई. उसी समय उसकी बस भी आ गई. एक नजर उसे देखते हुए वह बस में चढ़ गई. वह अवाक! देखता रह गया.  वह अपने साथ ले गई उसका दिल, और दे गई  उसे, अपना स्पर्श, शरीर की गंध और मोगरा फूलों की सुगंध. उसके लिए समय की घडी वहीं रुक गयी. आज भी सावन में जब बादल गरजते हैं, बिजली कड़कती है. दिखाई देगा तुम्हे, हात में मोगरा फुलोंका गजरा लिए , प्रतीक्षारत  एक बूढा.....

शनिवार, 18 जुलाई 2015

अकल का कीड़ा



सत्यवान कार्यालय में वह ख़ास फाइल पढ़ रहा था.  अचानक हाल ही में निकली अकल दाढ़ में दर्द होने लगा. जैसे-जैसे वह फाइल के पन्ने पलटता गया, उसका दर्द बढ़ता गया. आखिरकार उसने उस फाइल को दुबारा अलमारी में रख दिया.  शाम को घर पहुँचने पर उसने नमक के पानी से गरारे करे, लौंग भी चबाकर देखी, परन्तु दाढ़ का दर्द कम होने की बजाय बढ़ता गया. सारी रात उसने दर्द में तड़पते हुए बितायी.  सुबह होते ही सत्यवान दांतों के डॉक्टर के यहाँ पहुंचा.  

डॉक्टर ने उसके दांतों का मुआयना किया और कहा, अकल दाढ़ में अकल का कीड़ा लगा है, इसे जड़ समेत उखाड़ना पड़ेगा.  सत्यवान ने डॉक्टर से कहा, बिना दाढ़ उखाड़े काम नहीं चल सकता क्या.  डॉक्टर ने हँसते हुए कहा, सत्यवान यह अकल का कीड़ा बड़ा खतरनाक है, इसे जड़ समेत ही उखाड़ना पड़ता है, अन्यथा यह दिमाग में घुस जयेगा और वहां पहुंचकर अकल के तारे तोड़ने लगेगा.  जानते हो इसका क्या नतीजा होगा, तुम्हारी सफ़ेद कमीज दागदार हो जायेगी. कुछ दिनों में   चेहरे पर भी कालिख पुत जाएगी. बिना पेंशन नौकरी से रिटायर हो जाओगे. दर दर की ठोकरे खानी पड़ेगी, भीक मांगने की नौबत आ जाएगी. डॉक्टर की बात सुन, सत्यवान की आंख के आगे तारे चमकने लगे, ‘अल्ला के नाम पर एक रुपया दे दे, भगवान् तुम्हारा भला करे’ जैसी आवाजे उसे सुनाई देने लगी’ वह चिल्लाया नहीं नहीं,  डॉक्टर साहब, मुझे भीक नहीं माँगनी है, निकाल दो उस अकल के कीड़े को जड़ समेत.  

डॉक्टर ने अकल दाढ़ में इंजेक्शन लगाकर उसे सुन्न कर दिया और अकल के कीड़े समेत उसे जड़ से उखाड दिया.  सत्यवान का दर्द गायब हो गया. वह घर आया, ठन्डे पानी से स्नान किया. बाल संवारने के लिए दर्पण के सामने खड़ा हुआ. उसने दर्पण में अपना चेहरा देखा, वह चौंक गया, दर्पण में उसका चेहरा उसे स्याह नजर आ रहा था.       

गुरुवार, 9 जून 2011

काली लक्ष्मी

बचपन के दिन याद आते हैं. मां संध्या के समय भगवान के सामने दिया जलाती थी. साथ ही हम बच्चे जोर- जोर से शुभम करोति कल्याणं, आरोग्यं सुख-संपदा .. का पाठ करते थे. साथ ही अपनी मातृभाषा मराठी में मां लक्ष्मी को घर आने का न्योता देते थे. जिसका हिंदी अनुवाद निम्न है:

आजा लक्ष्मी मेरे घर, मेरा घर तेरे लिये.
घर से पीडा बाहर जाये, बाहर कि लक्ष्मी घर में आये.

संध्या के समय सचमुच लक्ष्मी घर आती है. गृह स्वामी दिनभर मेहनत-मजदूरी कर यह लक्ष्मी घर लाता है. यह सौभाग्य सूचक श्रीलक्ष्मी है जो अपने साथ घर में सुख, चैन एवं सुख-संपन्नता लाती है. इसी श्रीलक्ष्मी का स्वागत हम करते हैं. हम सभी जानते हैं रात्री के अंधकार में दैवीय शक्तियां क्षीण होती हैं. इसीलिये हम तिजोरी, अलमारी अथवा संदूक को ताला लगाकर इसे सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं.


शुक्रवार, 27 मई 2011

सिंहासन चार पुतली


जम्बुद्वीपे, भरतखंडे, क्षिप्रा तटे, सुन्दर एंव रम्य अवन्ती नगरी थी. क्षिप्रा तट
विक्रमादित्य नित नेम से  उज्जैन की राज्यलक्ष्मी की  दीप, धूप, नैवैद्य दिखाकर  पूजा करता था.  अपने विनम्र स्वभाव से वह सदैव  मंदिर के पुजारीयों एवं देवी के भक्तों को  प्रसन्न रखता था. आखिरकार राज्यलक्ष्मी उसपर प्रसन्न हुई. उसकी कृपा से आज विक्रमादित्य सिंहासन पर बैठ्ने वाला था.   उज्जयनी नगरी दुल्हन की तरह सजी हुई थी.  दरबार लोगों से ठसाठस भरा हुआ था. मंत्री, सेनापती, सभासद, विदेशी दूत, गणमान्य अतिथी सभी उपस्थित थे. विक्रमादित्य की नजर सुवर्णजडित सिंहासन की ओर गई. जिसे चार पुतलियां थामे थी. उसका सपना पूर्ण होने के बीच केवल चार सीढियां थी. विक्रमादित्य पहली सीढी पैर रखने वाला था की एक पुतली उसके सामने प्रगट  हुई. उसकी उसकी आंखों पर पट्टी बंधी हुई थी. उसने विक्रमादित्य की और देखते हुए कहा, विक्रम मेरे प्रश्न का उत्तर दो, "राजा की नजर कैसे होनी चाहिये?"  विक्रमादित्य ने कहा, पुतलीके राजा "गरुड के समान होता है जो अपनी  तीक्ष्ण नजर से   प्रजा को कष्ट देने वाले सर्पसमान मंत्री, सामंतो एवं सरकारी अधिकारीयों को  खोजकर  दंडित करता है." पुतली खिलखिलाकर हंसी और बोली, विक्रम तू भोला है, गठबंधन के जमाने मे राजा को कभी बुरा देखना नहीं चाहिये.  मंत्री कितने ही 'आदर्श स्पेक्ट्रम घोटाले करें' राजा की नजर वहां नहीं पडनी चाहिये.  इस सीढी पर पैर रखने से पूर्व तुझे अपनी आंखों पर पट्टी बांधनी पडेगी.   राजा बनने को उत्सुक विक्रमादित्य ने शीघ्रता से अपनी आंखों पर पट्टी बांधी और पहली सीढी पर पैर रखा

अब वह दुसरी 
सीढी पर पैर रखने को था,  तभी  दुसरी पुतली प्रगट हुई. उसने अपने कानों  को दोनो हाथों  से ढका हुआ था. वह बोली विक्रमादित्य, "राजा ने कभी बुरा सुनना नाही चाहिये."  किसान भूख से आत्महत्या कर  रहें  हैं, राशन का माल काले बाजार मे बिकता है, सरकारी कर्मचारी बिना रिश्वत लिये कोई कार्य  नहीं करता है इत्यादी बुरी बातें सुनते समय राजा ने अपने कान ढकने चाहिये ताकी बुरी खबरें उसे सुनाई न दें.   उसे केवल, किसान खुश है, कर्मचारी ईमानदार है, खेल सफल हुए  हैं, इत्यादी खबरें ही सुननी चाहिये. पुतली कि बात मान, विक्रमादित्य ने अपने कान ढक लिये और उसने दुसरी सीढी पर पैर रखा.

अब वह तिसरी
सीढी पर पैर रखने को था,  तभी तिसरी  पुतली प्रगट हुई उसके मुख पर पट्टी बंधी हुई थी. वह बोली विक्रमादित्य, राजाने कभी बुरा नही बोलना चाहिये.
चाहे मंत्रीगण आपका आदेश ना माने, प्रजा का कल्याण भूल अपने ही कल्याण मे लगे हो तब भी राजा ने उन्हें कोई निर्देश नहीं चुप रहना चाहिये न ही क्रोध करना चाहिये बल्की  स्वयं शांत रहकर सब  'राज्यलक्ष्मी' पर छोड देना चाहिये.  विक्रमादित्य ने कहा, पुतलीके तुम्हारी यह शर्त भी मुझे मंजूर है. विक्रमादित्य ने अपने मुख पर पट्टी बांध ली और तिसरी सीढी पर पैर रखा.

अब विक्रमादित्य चौथी और अंतिम
सीढी पर पैर रखने को था,  तभी  चौथी  पुतली प्रगट हुई , वह बोली, विक्रमादित्य, चाहे आंखों पर पट्टी बंधी हो, कान ढके हों और मुख पर पट्टी बंधी हो. मनुष्य के पास आत्मा भी होती है. जिसकी आवाज उसे सदा बैचैन करती है.  आत्मा कि आवाज सुन तुम प्रजा का कल्याण करने के लिये न्याय मार्ग पर चलने का प्रयत्न कर सकते हो. और तुम्हें मालूम ही है न्याय मार्ग पर चलने वाले राजा हरिश्चंद्र को सत्ता गवानी पडी थी.  तुम अपनी आत्मा मुझे दे दो. सिंहासन पर बैठ्ने को अधीर विक्रमादित्य ने अपनी आत्मा उसके हवाले कर  दी और चौथी सीढी पर  पैर रख सिंहासन पर विराजमान हो गया.
राजा विक्रमादित्य कि जय हो से वातावरण गुंजायमान हो उठा. स्वर्गीय मधुर संगीत उसके कानों में गुंजने लगा. विक्रमादित्य ने अपनी आंखें मूंद ली. उसे दिखाई देने लगा -  हरी भरी धरती, खुशाल किसान, सुखी प्रजा ... स्वर्गीय संगीत कि धुन पर ताल देते हुए वह गुनगुनाने लगा -- दुखभरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे,,,,
इस तरह राज्यलक्ष्मी कि कृपा से राजा विक्रमादित्य ने अनंत काल तक अवंती नगरी पर राज्य किया.  जो भी नेता
कलयुग में इस कहानी को मनपूर्वक सुनेंगा  उसे  विक्रमादित्य कि तरह राज्य कि प्राप्ती होगी.