जग में कौन ऐसा है जो हमेशा हर प्रकार का सुख भोगता है? कोई नहीं!
हे मन, तू स्वयं विचार कर और खोज कर देख।
तूने ही पूर्वजन्मों के कर्मों का संचय किया है।
उसी के अनुसार जो सुख-दुःखप्राप्त हुआ है,
उसे तुझे भोगना ही पड़ेगा। (मन के श्लोक ११ )
समर्थ रामदास स्वामी समझाते हैं कि संसार में कोई भी "सर्वसुखी" नहीं है। सुख-दुःख का आना-जाना समय का चक्र है। जो कुछ घटित होता है, वह पूर्वकर्मों का फल है। इसलिए उसका स्वीकार करना चाहिए। व्यर्थ रोना या "मेरे साथ ही ऐसा क्यों?" पूछना छोड़ देना चाहिए। प्रारब्ध कर्म को स्वीकार करने से मन शांत होता है और आत्मचिंतन शुरू होता है।
पूर्वसंचित कर्म का अर्थ है, पहले किए गए कर्म। चाहे वे पिछले जन्म के हों या इस जन्म के, उनका फल भोगना ही पड़ता है।
महाभारत की द्यूतसभा में द्रौपदी ने न्याय माँगा, पर भीष्म, द्रोण, विदुर और कृपाचार्य मौन रहे। युधिष्ठिर ने जुआ खेलकर पापकर्म किया था, इसलिए वह भी शांत रहा। भीम और अर्जुन ने भी शस्त्र नहीं उठाए। प्रजा ने भी अन्याय के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई। परिणामस्वरूप कुरुक्षेत्र में पूरा कुरुवंश नष्ट हुआ। यह उदाहरण बताता है कि अन्याय के समय मौन रहना भी पाप है और उसका फल सबको भोगना पड़ता है।
आज भी हम देखते हैं कि यदि समाज अधर्म का समर्थन करता है तो उसका परिणाम भयंकर होता है। इसलिए धर्ममार्ग पर चलना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना और सत्यकर्म करना ही जीवन का सच्चा तत्त्व है।
समर्थ रामदास कहते हैं – "मना पापसंकल्प छोड़ देना चाहिए, मना सत्यसंकल्प जीवन में धारण करना चाहिए।"
सभी कर्म मन के संकल्प से उत्पन्न होते हैं। यदि मन पापविचार करता है तो दुःख मिलता है। यदि सत्यसंकल्प करता है तो मन शुद्ध होता है और पूर्वकर्म शिथिल हो जाते हैं।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं,
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"उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥" (अध्याय ६, श्लोक ५)
मन ही सबसे बड़ा मित्र है और सबसे बड़ा शत्रु भी। यदि मन को नियंत्रित किया जाए तो वह मित्र बनता है, अन्यथा शत्रु।
पाप संकल्प का त्याग कर सत्य संकल्प को स्वीकार करने से मन शुद्ध होता है। शुद्ध मन सत्कर्म की ओर अग्रसर होता है और पूर्व संचित कर्म शिथिल हो जाते हैं। पहले किए गए बुरे कर्मों के फल भी बदल सकते हैं। इसके अनेक ठोस उदाहरण हमें ग्रंथों और इतिहास में दिखाई देते हैं।
वाल्या कोळी (रत्नाकर डाकू) एक क्रूर व्यक्ति था; वह यात्रियों को मारकर और लूटकर अपना जीवनयापन करता था। लेकिन उसे महर्षि नारद का उपदेश मिला। उसने गलत मार्ग छोड़कर भक्ति मार्ग को अपनाया और आगे चलकर ‘ऋषि वाल्मीकि’ बना। साधना और भक्ति से उसने अपना जीवन पूरी तरह बदल दिया। इसी प्रकार अंगुलीमाल भी एक भयंकर डाकू था। उसने सैकड़ों लोगों की हत्या की थी और उनकी उँगलियों की माला गले में पहन रखी थी। लेकिन जब उसकी मुलाकात गौतम बुद्ध से हुई, तो बुद्ध के शांत और करुणामय व्यक्तित्व ने उसका हृदय परिवर्तन कर दिया। बुद्ध के मार्गदर्शन में उसने हिंसा छोड़कर धर्ममार्ग को अपनाया और आगे चलकर भिक्षु बनकर उसे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। यह उदाहरण दिखाता है कि उचित मार्गदर्शन और आत्मपरिवर्तन से अत्यंत अधर्म में डूबा हुआ व्यक्ति भी बदल सकता है।
इतिहास में सम्राट अशोक का उदाहरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सत्ता के लिए उसने अपने भाइयों की हत्या की और कलिंग युद्ध में अत्यधिक रक्तपात किया। लेकिन उस युद्ध के बाद उसे गहरा पश्चाताप हुआ और उसने शांति, अहिंसा और धर्म का मार्ग स्वीकार किया। इतिहास में वह “देवनामप्रिय” के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
- पाप संकल्प का त्याग कर सत्य संकल्प अपनाने से मन शुद्ध होता है।
- शुद्ध मन सत्कर्म की ओर अग्रसर होकर पूर्वकर्मों के बंधन को शिथिल करता है।
- उचित मार्गदर्शन और आत्मजागृति से वाल्मीकि, अंगुलीमाल और अशोक जैसे व्यक्तियों ने जीवन परिवर्तन किया।
