शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

स्वच्छ दीपावली का संकल्प: कॉकरोच और कीटों से मुक्ति:


(यह लेख अराजनीतिक है।)


कॉकरोच पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे पुराने जीवों में से एक है। डायनासोर जैसे विशाल प्राणी समय के साथ समाप्त हो गए
, लेकिन कॉकरोच आज भी जीवित है और हमारे घरों में खुलेआम घूमता दिखाई देता है। कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की उसकी क्षमता अद्भुत है। खाने‑पीने के मामले में भी वह बिल्कुल चुनिंदा नहीं होता; जो कुछ भी सामने आता है, उसी पर जी लेता है। "जिस घर में उसे आश्रय मिलता है, उस घर के प्रति उसका कोई लगाव या निष्ठा नहीं होती; उल्टे वह घर का भोजन, अनाज, कपड़े, कागज़ जैसी चीज़ें कुतरकर नष्ट करता है और गंदगी व बीमारी फैलाता है। इसलिए उसका नियंत्रण करना ज़रूरी हो जाता है।

बरसात के मौसम की नमी से कॉकरोच सहित कई कीटों की संख्या बढ़ जाती है। दीपावली के आगमन से पहले हम अपने घर की पूरी सफाई करते हैं। "हम घर में बीमारी और रोग फैलाने वाले कॉकरोच तथा अन्य कीटों को  हीट स्प्रे से नष्ट  करते हैं।" बरसात में जमा हुआ कचरा और उसमें छिपे हुए ये उपद्रवी कीटों को नष्ट करके हम अपना घर चमकदार बनाते हैं। रसोईघर के कोने, अलमारियों के पीछे का हिस्सा, नलों के पास की जगह और नालियों के मुहाने पर विशेष ध्यान देने से ये कीट दोबारा सिर नहीं उठाते।

इस तरह घर की सफाई करके हम घर में स्वस्थ और प्रसन्न वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं। उसके बाद घर की सजावट, रंगाई‑पुताई और दिये जलाकर हम दीपावली का उत्साहपूर्वक स्वागत करते हैं। दीपावली का असली आनंद केवल घर को रोशन करने में नहीं, बल्कि उसे स्वच्छ, सुरक्षित और स्वास्थ्यप्रद बनाने में भी है।

स्वच्छ घर
, स्वस्थ परिवार और प्रकाशमय वातावरण- यही है सच्ची दीपावली।

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

दशहरा से दीपावली : “अंतर्मन के रावणदहन से ज्ञानदीप प्रज्वलन”



दशहरा केवल रावण के पुतले को जलाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के दोषों और बुराइयों पर विजय पाने की प्रेरणा देने वाला महान उत्सव है। रामायण में श्रीराम ने रावण का वध करके अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित की, यह कथा सबको मालूम है। इसी से प्रेरणा लेकर हमें भी अपने मन की बुरी प्रवृत्तियों, अनियंत्रित इच्छाओं और इंद्रियों के दोषों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। बाहर रावण का दहन करना प्रतीकात्मक है; असली अर्थ है भीतर के अहंकार, लोभ, मोह, असत्य और क्रोध का दहन करना।

मनुष्य के पास पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ होती हैं। आँखें, कान, नाक, जीभ और त्वचा ज्ञानेंद्रियाँ हैं; हाथ, पैर, वाणी, गुदा और जननेंद्रिय कर्मेंद्रियाँ मानी जाती हैं। इनका सही उपयोग हुआ तो वे ज्ञान और सदाचार की साधनाएँ बनती हैं; लेकिन विवेक का नियंत्रण न हो तो यही इंद्रियाँ मनुष्य को विकारों के अधीन कर देती हैं। आँखें लोभ और आसक्ति पैदा कर सकती हैं, कान निंदा और असत्य सुनने की आदत डाल सकते हैं, नाक और त्वचा सुखभोग की आसक्ति बढ़ा सकते हैं, जीभ की चंचलता स्वास्थ्य बिगाड़ सकती है और कटु वाणी संबंध तोड़ सकती है। हाथ चोरी या हिंसा कर सकते हैं, पैर गलत मार्ग पर ले जा सकते हैं। इसलिए इंद्रियों को दोष देने के बजाय उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना आवश्यक है।

धर्म के दस लक्षण मनुस्मृति में बताए गए हैं: “धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इंद्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध।” इनका अर्थ है, धैर्य, क्षमाशीलता, मन पर नियंत्रण, चोरी न करना, शुद्धता, इंद्रियों पर संयम, विवेकपूर्ण बुद्धि, ज्ञान, सत्य का आचरण और क्रोध पर नियंत्रण। ये केवल धार्मिक विधियों तक सीमित नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन में अपनाने योग्य नैतिक मूल्य हैं। इनका पालन करने से मन शुद्ध होता है और इंद्रियों को सही दिशा मिलती है। यही असली रावणदहन है।

‘राम’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ आनंद और परमात्मा से जुड़ाव है। श्रीराम धर्म, कर्तव्य और आदर्श आचरण के प्रतीक हैं। जब हमारे भीतर विवेक, सत्य और सद्बुद्धि जागृत होती है, तब हम भी अहंकार पर नम्रता से, लोभ पर संतोष से, असत्य पर सत्य से और क्रोध पर क्षमा से विजय पा सकते हैं। यही जीवन का असली रावणवध है।

जब मनुष्य केवल अपने सुख का नहीं, बल्कि दूसरों और प्रकृति के कल्याण का विचार करता है, तब समाज में प्रेम और शांति का वातावरण बनता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश–  इन पंचमहाभूतों का संतुलन बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। "यही सच्चा रामराज्य है, जो न्याय, नैतिकता, परस्पर सम्मान और प्रकृति की रक्षा पर टिका है।" दशहरे के बाद आने वाली दीपावली इस विचारयात्रा का अगला चरण है। दशहरा हमें विकारों पर विजय की प्रेरणा देता है, तो दीपावली अंधकार दूर कर प्रकाश का स्वागत करने का संदेश देती है। घर में दीप जलाने के साथ‑साथ हमें अपने अंतःकरण में भी ज्ञान, विवेक, प्रेम और सद्भावना के दीप प्रज्वलित करने चाहिए।

आइए, इस दशहरे पर हम संकल्प लें कि अपने भीतर के दोषों का दहन करेंगे और दीपावली पर ज्ञान व सदाचार का दीप जलाएँगे। असली विजय दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि स्वयं के दोषों पर मात करने में है; और असली प्रकाश केवल घर में नहीं, बल्कि हमारे विचारों, व्यवहार और पूरे जीवन में फैलना चाहिए।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

आत्महत्या और मीडिया की जिम्मेदारी


मनुष्य का मन उसके आसपास के वातावरण से निरंतर प्रभावित होता है। हम जो देखते, सुनते और बार-बार पढ़ते हैं, वह धीरे-धीरे हमारे अवचेतन मन का हिस्सा बन जाता है। विशेष रूप से नकारात्मक घटनाओं का प्रभाव हमारे मानस पर बहुत गहरा होता है। यही कारण है कि हत्या, लूट, अपहरण, दुर्घटना और आत्महत्या जैसी खबरें लोगों का ध्यान तुरंत आकर्षित करती हैं। हम उन्हें रुचि और उत्सुकता से देखते हैं, दूसरों को बताते हैं और कई बार उन पर लंबे समय तक चर्चा भी करते हैं। लेकिन इस दौरान हम यह भूल जाते हैं कि ऐसी घटनाओं का बार-बार हमारे सामने आना हमारी मानसिक सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
 
हाल ही में हुई कुछ आत्महत्या की घटनाओं के दौरान मैंने देखा कि एक ही खबर को दिनभर में कई बार और उसके वीडियो को कई दिनों तक दिखाया गया। एक सामान्य दर्शक के लिए यह केवल एक समाचार हो सकता है, परंतु मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक या आर्थिक कारणों से निराश और अकेलेपन से जूझ रहे किसी व्यक्ति पर इसका अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। आत्महत्या के वीडियो या तरीके देखकर, अपनी समस्याओं का सामना करने के बजाय वह व्यक्ति भी मौत को ही एकमात्र विकल्प मान बैठने की भूल कर बैठता है।
 
इस दिशा में मीडिया को अत्यधिक संयम बरतने की आवश्यकता है। किसी भी दुर्घटना या आत्महत्या की आवश्यक और तथ्यात्मक जानकारी को संयमित भाषा में केवल एक बार प्रसारित किया जाना चाहिए; सनसनीखेज प्रस्तुति से पूरी तरह बचना चाहिए। किसी ने किस प्रकार आत्महत्या की, इसके विस्तृत विवरण और दृश्यों को बार-बार दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है। टीआरपी की अंधी दौड़ के लिए इस तरह की खबरों का दोहन बंद होना चाहिए। यदि इस विषय पर चर्चा अनिवार्य हो भी, तो उसका केंद्र-बिन्दु घटना का रोमांचक विवरण नहीं, बल्कि आत्महत्या की रोकथाम, मानसिक स्वास्थ्य और मदद के उपाय होने चाहिए।
 
ऐसी हर खबर के साथ यह स्पष्ट संदेश अवश्य दिया जाना चाहिए कि कठिन परिस्थितियाँ स्थायी नहीं होतीं तथा निराश व्यक्ति अपने परिवार, मित्रों, चिकित्सकों या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बेझिझक सहायता ले सकता है। अर्थात्, खबर के साथ केवल निराशा का अंधकार नहीं, बल्कि जीवन की संभावना और सहायता की किरण दिखाई जानी चाहिए।
मीडिया केवल समाज का दर्पण ही नहीं
, बल्कि समाज के मन को गढ़ने और प्रभावित करने वाली एक बड़ी शक्ति है। इसलिए उसे गंभीरता से यह विचार करना होगा कि किसी संवेदनशील खबर को कितनी बार और किस रूप में दिखाया जाना चाहिए। समाचार का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं होना चाहिए कि किसी ने अपना जीवन क्यों खोया; बल्कि यह भी होना चाहिए कि कोई दूसरा व्यक्ति अपना जीवन न खोए। यही सच्ची और जिम्मेदार पत्रकारिता है।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

बाबा रामदेव के योग आंदोलन का आर्थिक प्रभाव: सामाजिक और आर्थिक लेखा-जोखा योग आंदोलन का ज़मीनी और सामाजिक प्रभाव

 
स्वामी रामदेव पिछले लगभग 26 वर्षों से प्रतिदिन सुबह 5 बजे से निरंतर योग कक्षाओं का लाइव प्रसारण कर रहे हैं, जिससे करोड़ों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुए हैं। उनके संगठन और प्रेरणा से देश भर के पार्कों में प्रतिदिन लाखों योग कक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा कई छोटे-छोटे पारिवारिक समूह भी खुद योग अभ्यास करते हैं। देश के लगभग हर छोटे-बड़े शहर के पार्कों में सुबह का यह नज़ारा देखा जा सकता है।
 
भारत सरकार की समिति और योग पाठ्यक्रम
 
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) ने योग के मानकीकरण (Standardization) और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए कई कदम उठाए हैं:
 
योग प्रमाणन बोर्ड (Yoga Certification Board - YCB): योग प्रमाणन बोर्ड (YCB) की स्थापना भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने वर्ष 2018 में की। इसके संचालन हेतु गठित स्टीयरिंग समिति के अध्यक्ष के रूप में स्वामी रामदेव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस समिति ने योग शिक्षकों, योग प्रशिक्षण संस्थानों तथा योग पाठ्यक्रमों के मानकीकरण एवं प्रमाणन के लिए नीतियाँ और मानदंड तैयार किए।
 
एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम बनाया गया, जिसके तहत प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा और पेशेवर डिप्लोमा स्तर तक योग के मानक पाठ्यक्रम तैयार किए गए। इससे योग को केवल एक 'अभ्यास' न रखकर एक प्रमाणित योग्यता (Certified Qualification) का दर्जा मिला। योग प्रमाणन बोर्ड (YCB) द्वारा जारी सरकार-मान्य प्रमाणपत्रों ने योग शिक्षकों के लिए देश-विदेश में रोजगार के अवसरों को अधिक व्यापक और सुलभ बना दिया है।
 
सामाजिक प्रभाव पर आधारित आर्थिक मूल्यांकन
 
स्वामी रामदेव के योग आंदोलन से उत्पन्न हुई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अर्थव्यवस्था का आकार बहुत विशाल है। इसे हम निम्नलिखित आर्थिक घटकों (Economic Components) में बांट सकते हैं:
1. योग शिक्षक एवं रोजगार (Human Capital)
 
लाखों योग ट्रेनर: YCB, पतंजलि योगपीठ और अन्य संस्थानों से प्रशिक्षित होकर आज देश में 5 लाख से अधिक योग शिक्षक (Personal Trainers, School Instructors, Corporate Trainers) आजीविका कमा रहे हैं। एक लाख से ज्यादा योग शिक्षक पिछले दो दशकों में विदेशों में जाकर योग का प्रसार कर रहे हैं। वे विदेश से भारत में धन भेजकर भारत की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
 
अस्पताल और वेलनेस सेंटर: प्रमुख कॉर्पोरेट अस्पताल, फिजियोथेरेपी क्लीनिक और आयुष केंद्र अब अनिवार्य रूप से योग विशेषज्ञों को नियुक्त करते हैं। देश में हजारों योग शिक्षक ऑनलाइन कक्षाएं लेकर स्वरोजगार कर रहे हैं।
 
2. प्रातःकालीन पार्क इकॉनमी (The Morning Park Economy)
 
यदि आप भारत के किसी भी छोटे या बड़े शहर के पार्क में सुबह 5 से 8 बजे के बीच जाएं, तो आपको एक जीवंत आर्थिक गतिविधि देखने को मिलेगी:
 
योग कक्षाएं: पतंजलि की एक लाख से ज्यादा निशुल्क कक्षाएं देश भर के पार्कों इत्यादि में लगती हैं, जहां करोड़ से ज्यादा लोग योग सीखने और करने आते हैं। इसके अलावा पार्क में ही कई योग शिक्षक शुल्क लेकर या निशुल्क योग कक्षाएं लेते हैं।
 
ताज़ा जूस और हर्बल वेंडर्स: पार्कों के बाहर स्वरोजगार (Self-employment) का एक नया ढांचा खड़ा हो गया है। ठेले और छोटी दुकानें लगाने वाले वेंडर्स सुबह-सुबह लौकी, करेला, गाजर, बीटरूट, एलोवेरा, गिलोय और नारियल पानी जैसे स्वास्थ्यवर्धक पेय बेचते हैं। देश भर में ऐसे 1 से 2 लाख छोटे व्यापारी प्रतिदिन अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
 
3. सहायक उद्योग और एफएमसीजी बाज़ार (Supporting Industries)
 
योग आंदोलन ने कई अन्य विनिर्माण (Manufacturing) और सेवा क्षेत्रों को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया है:
 
योग एक्सेसरीज़ बाज़ार: भारत में हर साल 2 से 3 करोड़ योग मैट बिकते हैं। इसके साथ ही योग के लिए उपयुक्त सूती वस्त्रों और फिटनेस वियर का बाज़ार तेजी से बढ़ा है।
बोतलबंद हर्बल पेय उद्योग: पार्कों के बाहर ताजे जूस की मांग को देखते हुए आज देश की सैकड़ों छोटी-बड़ी FMCG कंपनियां हाईवे, मॉल और सुपरमार्केट में बोतलबंद एलोवेरा, आंवला और विभिन्न हर्बल जूस बेच रही हैं।
 
4. प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और सार्वजनिक बचत (Preventive Health Savings)
 
आर्थिक मूल्यांकन में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है "बीमारी पर होने वाले खर्च की बचत" (Out-of-Pocket Expenditure)। योग के नियमित अभ्यास से करोड़ों लोगों की जीवनशैली संबंधी बीमारियों (जैसे बीपी, शुगर, थाइरॉइड और तनाव) पर निर्भरता और मेडिकल खर्च कम हुआ है। यदि 10 करोड़ लोग नियमित योग से दवाओं और पैथोलॉजी टेस्ट्स में औसतन ₹500 प्रति माह भी बचाते हैं, तो यह देश के नागरिकों की ₹60,000 करोड़ प्रति वर्ष की प्रत्यक्ष बचत है। यह पैसा बाज़ार में अन्य आवश्यक वस्तुओं की खपत (Consumption) में जाता है, जिससे अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
 
5. कुल आर्थिक मूल्यांकन (GDP में योगदान)

आर्थिक घटक

अनुमानित वार्षिक आकार (रुपये में)

योग शिक्षा एवं निजी ट्रेनिंग बाज़ार

₹15,000 - ₹20,000 करोड़

योग मैट, एपेरल एवं उपकरण बाज़ार

₹3,000 - ₹5,000 करोड़

पार्क वेंडर्स एवं कच्चा हर्बल जूस बाज़ार

₹8,000 - ₹10,000 करोड़

पैक्ड हर्बल/वेलनेस जूस एवं सप्लीमेंट उद्योग (FMCG non-Patanjali)

₹12,000 - ₹15,000 करोड़

योग/प्राकृतिक चिकित्सा रिसॉर्ट्स एवं वेलनेस टूरिज्म

₹10,000 - ₹12,000 करोड़

कुल प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष वेलनेस इकॉनमी

लगभग ₹50,000 से ₹65,000 करोड़

(यह आंकड़ा बिना किसी निजी कंपनी के टर्नओवर को जोड़े, केवल इस आंदोलन से पैदा हुए माइक्रो-इकोसिस्टम का है। यदि इसमें प्रिवेंटिव हेल्थकेयर से होने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य बचत को जोड़ दें, तो इसका आर्थिक मूल्य 1 लाख करोड़ रुपये (लगभग 12-14 बिलियन डॉलर) के पार चला जाता है।)
 
बाबा रामदेव ने योग को केवल एक धार्मिक या आध्यात्मिक अभ्यास से निकालकर एक "जन-स्वास्थ्य आंदोलन" और "रोजगार पैदा करने वाले वेलनेस इकोसिस्टम" में बदल दिया है। इस आंदोलन ने भारत में असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में लाखों स्वरोजगार (Self-employment) के अवसर पैदा किए हैं।
 

शनिवार, 5 सितंबर 2026

वेद वाणी: विश्वेभिः सखिभिः सह”:- परस्पर सहयोग का यज्ञ



वेद और गीता का संदेश अत्यंत व्यापक और उदात्त है, सम्पूर्ण विश्व हमारा मित्र और हमारा परिवार है। अथर्ववेद के ऋषि कहते हैं, “विश्वेभिः सखिभिः सह”, अर्थात् सबके साथ मैत्रीभाव और सहयोग की भावना से जीवन जीना चाहिए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह केवल अपने लिए नहीं जीता; बल्कि दूसरों की सहायता करता है, आवश्यकता पड़ने पर दूसरों से सहायता लेता है और परस्पर सहयोग की भावना से अपने जीवन को अधिक समृद्ध, सार्थक और सुखमय बनाता है। यही भाव भगवद्गीता में भी व्यक्त हुआ है:

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥   

 

अर्थात्  यज्ञ द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो, और वे देवता भी तुम्हें सुख-समृद्धि प्रदान करेंगे। इस प्रकार परस्पर सहयोग करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।

 

यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल हवन-कुण्ड में आहुति देना नहीं है, बल्कि मनुष्य द्वारा जीवन-यापन के लिए किया गया प्रत्येक कर्म है। यह सहयोग केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश जैसे पंच तत्त्वों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए कर्म करना ही सच्चा धर्म है। जब मनुष्य प्रकृति से लेता है, तो उसे उतना ही लौटाना भी चाहिए। यही संतुलन यज्ञ की मूल भावना है।

 

जल इसका उत्तम उदाहरण है। हम पीने और खेती के लिए भूजल का उपयोग करते हैं। ट्यूबवेल से जब हम धरती से जल खींचते हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि उतना ही जल पुनः धरती को लौटाएँ। इसके लिए गाँवों में तालाब, बावड़ी या आधुनिक भाषा में ‘रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम’ बनाना आवश्यक है। यही नियम शहरों पर भी लागू होता है, हर घर और सोसाइटी में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था होनी चाहिए। तभी प्रकृति का संतुलन बना रहेगा और हमें पीने व खेती के लिए पर्याप्त जल मिलता रहेगा। यही मनुष्य का प्रकृति के साथ सच्चा यज्ञ है।

 

जिस प्रकार जल के साथ संतुलन आवश्यक है, उसी प्रकार वायु, अग्नि और भूमि के साथ भी संतुलन बनाए रखना मनुष्य का कर्तव्य है। वृक्षारोपण द्वारा वायु शुद्ध रखना, ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना, तथा भूमि की उर्वरता बनाए रखना,  सभी प्रप्राणियों की रक्षा करना, ये सभी यज्ञ के ही रूप हैं। मनुष्य जितना प्रकृति से लेता है, उतना ही उसे लौटाना चाहिए। यही परस्पर सहयोग का व्यावहारिक स्वरूप है।

 

सार: वेद और गीता दोनों सिखाते हैं कि मनुष्य अकेला नहीं जी सकता, न समाज में, न प्रकृति के साथ। यज्ञ अर्थात कर्म का सच्चा अर्थ है हम जो कुछ प्रकृति और समाज से लेते हैं, उसे उतनी ही निष्ठा से लौटाना। इसी संतुलित कर्म-यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं, प्रकृति सुरक्षित रहती है, और मनुष्य स्वस्थ दीर्घ जीवन जीते हुए अंततः मोक्ष   को प्राप्त करता है। इसलिए वेद जड़ चेतन और प्रकृति समस्त विश्व को सखा बनाने का उपदेश देते हैं। 

बुधवार, 2 सितंबर 2026

"गीता का सर्वधर्म समभाव: एक ही ईश्वर, अनेक मार्ग"



महाभारत के कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही स्वजनों के विरुद्ध युद्ध करने से विमुख हो गया
, तब उसका द्वंद्व केवल पारिवारिक मोह का नहीं था, बल्कि उस गहरे मानवीय प्रश्न का था, सत्य क्या है, और सही मार्ग कौन-सा है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दुविधा को शांत करने के लिए अपना विराट स्वरूप दिखाया। गीता के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित यह विश्वरूप दर्शन कोई साधारण चमत्कार नहीं था, अपितु यह दर्शाने का माध्यम था कि समस्त सृष्टि, समस्त जीव, समस्त लोक एक ही परमात्मा के भीतर समाहित हैं। इसी अध्याय में कृष्ण कहते हैं कि जो योद्धा युद्धभूमि में खड़े हैं, वे सब पहले से ही उस विराट रूप में विद्यमान हैं।  निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्- यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, अपितु समस्त मनुष्यता के लिए था कि प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक रूप उसी एक अविनाशी सत्ता की अभिव्यक्ति है।

प्राचीन सभ्यताओं में यह भाव भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता रहा है। वैदिक काल में सूर्य, अग्नि, वरुण, इंद्र, पृथ्वी और नदियों को देवत्व माना गया। वृक्ष, नाग, गौ, पर्वत इत्यादि सभी में दिव्यता देखी गई। यह कोई अंधविश्वास नहीं था, बल्कि यह भाव था कि प्रकृति का प्रत्येक अंश उसी परम चेतना का विस्तार है। भारत से परे भी अन्य प्राचीन सभ्यताओं में यही प्रवृत्ति देखी जाती है। प्राचीन मिस्र (इजिप्त) की सभ्यता में सूर्य देवता रा, सृष्टि और पुनर्जन्म के देवता ओसाइरिस, मातृत्व और जादू की देवी आइसिस, तथा आकाश देवता होरस जैसे अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी, और वहाँ भी पशुओं, जैसे बिल्ली, सांड और श्येन पक्षी को पवित्र माना जाता था। मध्य अमेरिका की माया सभ्यता में वर्षा के देवता चाक, सृष्टिकर्ता कुकुल्कान (पंख वाला सर्प) की उपासना प्रचलित थी, तथा मक्का के देवता की उपासना प्रचलित थी,। दक्षिण अमेरिका की इंका सभ्यता में सूर्य देवता इंति सर्वोच्च देवता माने जाते थे, साथ ही गर्जन के देवता इल्यापा और पृथ्वी माता पचामामा की भी पूजा होती थी। इन सभी सभ्यताओं में एक समान भाव दिखाई देता है, प्रकृति की शक्तियों और जीवनदायी तत्वों में परमात्मा को देखने की प्रवृत्ति, चाहे वह भारत हो, मिस्र हो या अमेरिका महाद्वीप। ऋग्वेद का यह कथन इसी भावना का सार है, एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति, अर्थात सत्य एक ही है, विद्वान उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। ईशावास्य उपनिषद भी कहता है कि ईशावास्यमिदं सर्वम्- इस संसार का कण-कण ईश्वर से व्याप्त है। यही विचार आगे चलकर गीता में और अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ।
 
भगवान कृष्ण के समय भी भारत में विभिन्न जनपदों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की उपासना प्रचलित थी। स्वाभाविक है कि जब मनुष्य अपनी आस्था को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगता है, तो वहीं से संघर्ष जन्म लेता है। अपनी ही उपासना पद्धति को श्रेष्ठ मानकर उसे दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति सदैव विवाद, वैमनस्य और अंततः युद्ध को जन्म देती रही है। इतिहास साक्षी है कि इसी प्रवृत्ति के कारण भूतकाल में लाखों निर्दोष लोग मारे गए।  कभी धर्म-युद्धों (क्रूसेड) के नाम पर, कभी धार्मिक अभियानों और साम्राज्यवादी विस्तार के नाम पर, तो कभी अपने मत को एकमात्र सत्य मानकर दूसरों के विश्वास को मिटाने के प्रयास में। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों का नरसंहार (होलोकॉस्ट) इसका एक अत्यंत दर्दनाक उदाहरण है, जहाँ नस्लीय और वैचारिक श्रेष्ठता के दुराग्रह ने लाखों निर्दोष लोगों के जीवन का अंत कर दिया। यह दर्शाता है कि जब कोई समुदाय अपनी पहचान, आस्था या विचारधारा को दूसरों से श्रेष्ठ मानकर उसे बलपूर्वक स्थापित करने का प्रयास करता है, तो उसका परिणाम विध्वंस और नरसंहार के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। अर्जुन का द्वंद्व दरअसल उसी मानवीय प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने विश्वास और कर्तव्य के बीच उलझा रहता है। इसी संदर्भ में गीता का यह श्लोक अत्यंत मार्मिक है,  ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मनुष्य जिस भी रूप में मेरी उपासना करता है, मैं उसी रूप में उसे स्वीकार करता हूँ, क्योंकि सभी मार्ग अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं। इससे भी सरल संदेश गीता के नौवें अध्याय में मिलता है,  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। भगवान को भव्य कर्मकांड नहीं, बल्कि निष्कपट भाव से अर्पित एक पत्ता, एक फूल भी स्वीकार्य है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि बाह्य आडंबर आवश्यक नहीं, आंतरिक भाव और सदाचरण ही सच्ची पूजा है। सनातन परंपरा में वर्णित धर्म,  सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्तव्य का पालन ही पर्याप्त है, चाहे उपासना पद्धति कोई भी हो।
 
आज जब धर्म के नाम पर विश्व के अनेक भागों में वैमनस्य, हिंसा और जेहाद जैसी प्रवृत्तियाँ देखी जा रही हैं, तब गीता का यह उपदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। मनुष्य आज भी उसी दुविधा में है जिसमें अर्जुन था।  अपनी आस्था को श्रेष्ठ और दूसरों की आस्था को हीन मानने की प्रवृत्ति आज भी संघर्ष का मूल कारण बनी हुई है। गीता हमें सिखाती है कि यदि प्रत्येक जीव में, प्रत्येक उपासना पद्धति के मूल में वही एक परमात्मा विराजमान है, तो फिर मतभेद और द्वेष का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यह दर्शन धर्मों के बीच सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और आपसी सम्मान की नींव रखता है। सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि की भावना यदि आज का मनुष्य आत्मसात कर ले, तो धार्मिक कट्टरता और हिंसा का बहुत बड़ा भाग स्वतः समाप्त हो सकता है। गीता का विश्वरूप दर्शन इसलिए केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि आज के खंडित और अशांत विश्व के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक सिद्धांत है।
 

शनिवार, 22 अगस्त 2026

विक्रमादित्य आणि सिंहासन चार पुतली: सत्ता के लिए आत्मा गिरवी।

 




विक्रमादित्य सत्ता का उपयोग करके प्रजा का दुःख, दरिद्रता और अन्याय दूर करना चाहता था। उसे लगता था कि शासन जनता के लिए होना चाहिए। उसने सोचा कि राज्यलक्ष्मी की आराधना करके, उसे प्रसन्न करके, प्राप्त सत्ता का उपयोग वह प्रजा की भलाई के लिए करेगा। गरुड़ जैसी तीक्ष्ण दृष्टि रखकर, प्रजा को कष्ट देने वाले भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों को दंडित करके, वह गरीबों और किसानों के हितों की रक्षा करेगा। उसने राज्यलक्ष्मी की आराधना की। अंततः राज्यलक्ष्मी प्रसन्न हुई।

एक शुभ मुहूर्त पर विक्रमादित्य सिंहासन पर विराजमान होने के लिए सिंहासन की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। पहली सीढ़ी पर आँखों पर पट्टी बाँधी हुई एक पुतली थी। वह राजा से कहती है, "राजा को बुरा नहीं देखना चाहिए।" चारों ओर भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण करने वाले अधिकारी और मंत्री दिखाई दें, तो भी उन्हें अनदेखा करना होगा। इसके बिना अगली सीढ़ी नहीं चढ़ी जा सकती। राजा यह शर्त मान लेता है।

दूसरी सीढ़ी पर कान ढके हुए एक पुतली राजा से कहती है, राजा को बुरा नहीं सुनना चाहिए, जनता की वेदनाएँ, किसानों की आत्महत्याओं और गरीबी की चीत्कार भरी कहानियाँ नहीं सुननी चाहिए। विक्रम अपने कान ढक लेता है। राजा यह शर्त भी स्वीकार करता है।

तीसरी सीढ़ी पर होठों पर उँगली रखे एक पुतली कहती है, "राजा को बुरा नहीं बोलना चाहिए।" मंत्री, अधिकारी चाहे कितने भी भ्रष्ट क्यों न हों, उन पर आलोचना किए बिना मौन धारण करना होगा। विक्रम मौन भी स्वीकार कर लेता है।

अंत में चौथी पुतली प्रकट होती है। वह कहती है, "यह सब ढक लेने पर भी आत्मा अस्वस्थ हो जाती है। आत्मा अस्वस्थ हुई, तो राजा सत्ता खो देता है। अपनी आत्मा मुझे अर्पित कर दो।" विक्रम पुतली को अपनी आत्मा अर्पित कर देता है और सिंहासन पर बैठ जाता है।

सिंहासन पर बैठते ही विक्रमादित्य के मानस-नेत्रों के सामने एक दिव्य दृश्य उभरता है, हरियाली में नहाई-धुली खेती, मेहनती किसानों के चेहरों पर संतोष और गर्व की चमक, सड़कों पर खेलते खुशहाल बच्चे, बाज़ार में उत्साह से खरीदारी करती प्रजा, और चारों ओर एक शांत, समृद्ध, सुसंस्कृत समाज। राज्य में कहीं भी दुःख, दरिद्रता या अन्याय का लेशमात्र भी नहीं। हर घर में हँसी, हर मन में आशा, और हर कदम में आनंद भरा हुआ है। विक्रमादित्य को लगता है, यही तो राज्यलक्ष्मी की कृपा है, जिसके आशीर्वाद से उसका राज्य स्वर्ग समान बन गया है।

आज भी जो लोग सत्ता मिलने से पहले जनता के दुःख दूर करने और ईमानदारी की बातें करते हैं, सत्ता मिलते ही बदल जाते हैं। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें जनता का दुःख दिखना बंद हो जाता है। इसी विचार से सूझी यह कथा।