भारत के पास 40 करोड़ से अधिक गोवंश व भैंसों का विशाल पशुधन है। आज भी देश में प्रतिदिन निकलने वाला अधिकांश गोबर और गोमूत्र बिना किसी आर्थिक उपयोग के व्यर्थ चला जाता है। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक से Compressed Bio Gas (CBG) और उससे जुड़े उप-उत्पादों में बदल दिया जाए, तो भारत ऊर्जा, कृषि और पर्यावरण — तीनों क्षेत्रों में एक नई क्रांति ला सकता है।
CBG क्या है?
गोबर व कृषि अवशेषों को बंद टैंक (Anaerobic Digester) में सड़ाकर बायोगैस बनाई जाती है, फिर उसे शुद्ध कर CNG-जैसी गुणवत्ता वाली CBG प्राप्त की जाती है, जिसका उपयोग रसोई गैस, वाहन व उद्योगों में होता है।
सरकारी योजनाएँ — SATAT और GOBAR-DHAN
2018 में शुरू हुई SATAT योजना के तहत उद्यमी CBG संयंत्र लगाकर तेल कंपनियों (IOC, BPCL, HPCL) को गैस बेच सकते हैं — वर्तमान दर लगभग ₹46 प्रति किलोग्राम है। इसके समांतर GOBAR-DHAN योजना के तहत 2024-25 तक देशभर में 589 संयंत्र चालू हो चुके हैं (168 जिलों में), और सरकार का लक्ष्य 5,000 संयंत्रों से 1.5 करोड़ टन वार्षिक CBG उत्पादन तक पहुँचना है। घरेलू बायोगैस संयंत्र पर ₹10,000–40,000 तक सब्सिडी भी मिलती है।
ताज़ा उदाहरण: महाराष्ट्र के कोपरगाँव में भारत का पहला सहकारी मल्टी-फीड CBG संयंत्र प्रतिदिन 12 टन CBG व 75 टन पोटाश-खाद बना रहा है। छत्तीसगढ़ ने जून 2026 में CG-CBG नीति स्वीकृत की है, जिससे राज्य में सालाना लगभग 1.65 लाख टन CBG उत्पादन की संभावना है।
गोमूत्र — दूसरा अनदेखा खज़ाना
चर्चा अक्सर केवल गोबर तक सीमित रहती है, जबकि गोमूत्र भी उतना ही मूल्यवान है:
- गोनायल — फिनाइल का प्राकृतिक विकल्प
- गो-अर्क / गोधन अर्क — आयुर्वेदिक डिटॉक्स उत्पाद
- धूप, अगरबत्ती, हवन सामग्री, तरल जैव-कीटनाशक
पतंजलि और खादी ग्रामोद्योग जैसी संस्थाएँ इस मॉडल पर वर्षों से काम कर रही हैं। उत्तराखंड की आंचल डेयरी ने पशुपालकों से ₹6/लीटर पर गोमूत्र खरीदा और शोधन के बाद ₹25/लीटर पर पतंजलि आयुर्वेद को बेचा — यानी गोमूत्र भी दूध-गोबर जितना ही वास्तविक नकद-संसाधन बन सकता है।
गोबर-पेंट भी अब हकीकत है: खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) का "खादी प्राकृतिक पेंट" — जो एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और BIS-प्रमाणित है — जनवरी 2021 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा लॉन्च हुआ और PMEGP योजना के तहत किसानों को गोबर देकर सीधी आमदनी देता है। इस पेंट में सीसा, पारा, क्रोमियम जैसे विषैले भारी धातु नहीं होते और यह मात्र 4 घंटे में सूख जाता है। आंचल डेयरी भी अब बायोगैस के साथ गोबर-पेंट उत्पादन की योजना पर काम कर रही है, यानी एक ही डेयरी-सहकारी ढाँचे के भीतर दूध, गैस और पेंट — तीनों आय-स्रोत जुड़ सकते हैं।
1000 गायों पर आधारित मॉडल
1000 गायों से प्रतिदिन लगभग 10 टन गोबर व 5,000–8,000 लीटर गोमूत्र मिलता है, जिससे:
- 180–220 किग्रा CBG प्रतिदिन (₹46/किग्रा पर लगभग ₹8,300–10,000 प्रतिदिन)
- उच्च गुणवत्ता जैविक खाद व तरल उर्वरक
- गोमूत्र-उत्पादों (गोनायल, गो-अर्क) से अतिरिक्त आय
ऐसे संयंत्र की लागत लगभग ₹2–4 करोड़ है, जिसमें सरकारी सब्सिडी व बैंक ऋण का सहारा लिया जा सकता है।
तीन व्यावहारिक मॉडल
1. निजी कंपनी मॉडल: गाँवों से गोबर-गोमूत्र खरीदकर CBG व गोमूत्र-उत्पाद दोनों बनाना और तेल कंपनियों व उपभोक्ताओं को बेचना।
2. सहकारी मॉडल: मौजूदा डेयरी नेटवर्क का उपयोग कर एक ही केंद्र पर दूध, गोबर, गोमूत्र तीनों की खरीद। NDDB का गुजरात का ज़करियापुर मॉडल (घरेलू स्तर पर 2 घन मीटर के छोटे बायोगैस संयंत्र, स्लरी से "सुधन" ब्रांड खाद — 79,000+ प्लांट) और उत्तर प्रदेश का वाराणसी मॉडल (रोज़ाना 100 टन गोबर से 4,000 घन मीटर बायोगैस, डेयरी प्लांट को ऊर्जा) इसके सफल उदाहरण हैं।
3. गोशाला मॉडल: बूढ़ी व अनुपयोगी गायों वाली गोशालाएँ CBG व गोमूत्र-प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर दान-निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकती हैं।
एक छोटे किसान को कितना लाभ?
एक गाय से प्रतिदिन 10 किलो गोबर (₹2/किग्रा पर ₹20/दिन) और 5-6 लीटर गोमूत्र (₹5-6/लीटर पर ₹25-30/दिन) से किसान को कुल मिलाकर प्रतिदिन ₹45-50, यानी सालभर में लगभग ₹16,000-18,000 की अतिरिक्त आय हो सकती है — जो अकेले गोबर बेचने से लगभग दोगुनी है। स्लरी-खाद के उपयोग से दूध उत्पादन भी 1-2 लीटर बढ़ने की संभावना है, जिससे कुल दैनिक आय ₹80-100 तक पहुँच सकती है — यानी वार्षिक आय में 15-20% या अधिक की वृद्धि।
राष्ट्रीय स्तर पर संभावना
यदि 20 करोड़ पशुओं का गोबर CBG संयंत्रों तक पहुँचे, तो प्रतिदिन 35,000-45,000 टन CBG बन सकती है। भारत की कुल संभावित CBG क्षमता लगभग 62 मिलियन टन प्रतिवर्ष आँकी गई है — जो घरेलू रसोई गैस के साथ-साथ उद्योगों व परिवहन की माँग भी पूरी कर सकती है, जिससे आयातित LPG-LNG पर निर्भरता व विदेशी मुद्रा का खर्च दोनों घटेंगे। इसके साथ ही गोबर-गोमूत्र संग्रह, परिवहन, संयंत्र संचालन, गोनायल-अगरबत्ती निर्माण, खाद पैकेजिंग व विपणन जैसे क्षेत्रों में लाखों नए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार बन सकते हैं, और किसान दूध के साथ-साथ गोबर, गोमूत्र व खाद बेचकर बहु-आयामी आय अर्जित कर सकेगा।
सरकार को क्या करना चाहिए?
- हर 8-10 गाँवों के समूह में एकीकृत CBG + गोमूत्र-प्रोसेसिंग संयंत्र
- गोबर के साथ गोमूत्र का भी न्यूनतम खरीद मूल्य घोषित हो
- सहकारी CBG मॉडल (कोपरगाँव) व राज्य-स्तरीय नीतियों (छत्तीसगढ़ की तरह) को बढ़ावा
- डेयरी सहकारी समितियों को दूध-गोबर-गोमूत्र तीनों की खरीद से जोड़ा जाए
निष्कर्ष
जिस गोबर-गोमूत्र को आज अधिकांश लोग अपशिष्ट समझते हैं, वही आने वाले भारत की ऊर्जा, जैविक खेती और ग्रामीण समृद्धि का सबसे बड़ा आधार बन सकता है। श्वेत क्रांति ने भारत को दुग्ध उत्पादन में विश्व अग्रणी बनाया था — अब समय है कि गोबर-गोमूत्र आधारित CBG क्रांति भारत को स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी विश्व-नेतृत्व दे। तब किसान केवल "अन्नदाता" नहीं, "ऊर्जादाता" भी कहलाएगा।
स्रोत: SATAT योजना, GOBAR-DHAN योजना, छत्तीसगढ़ CG-CBG नीति 2026, कोपरगाँव CBG संयंत्र, आंचल डेयरी, पतंजलि/खादी ग्रामोद्योग, KVIC खादी प्राकृतिक पेंट, NDDB ज़करियापुर/वाराणसी मॉडल।



