शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि — एक वैदिक चिंतन

 
 


 
 
इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे।
पोषं रयीणामरिष्टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम्॥
(ऋग्वेद 2/21/6)
 
स्वामी दयानन्द सरस्वती का भावार्थ
 
हे (इन्द्र) सभों के अधिपति के समान वर्तमान प्रभो! (अस्मे) हम लोगों के लिये (दक्षस्य) बल की (चित्तिम्) उस प्रकृति को, जिससे विद्या को इकट्ठा करते हैं, और (सुभगत्वम्) अत्युत्तम ऐश्वर्य, (पोषम्) पुष्टि तथा (रयीणाम्) धन और (तनूनाम्) शरीरों की (अरिष्टिम्) रक्षा, (वाचः) वाणी का बोध, (स्वाद्मानम्) स्वादिष्ट भोग, (अह्नाम्) दिनों का (सुदिनत्वम्) सुदिनपन, और (श्रेष्ठानि) धर्मयुक्त (द्रविणानि) धनों को (धेहि) धारण कीजिये॥६॥
 
 
. इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि- श्रेष्ठ धन की प्रार्थना
 
ऋषि इन्द्र (परमैश्वर्यवान प्रभु) से प्रार्थना करते हैं,  हे प्रभो! हमें श्रेष्ठ धन प्रदान कीजिये। श्रेष्ठ धन का अर्थ है, पवित्र और धर्मपूर्वक अर्जित किया हुआ धन, कि छल-कपट या शोषण से कमाया गया धन।

आधुनिक उदाहरण: आज के समय में भी वही व्यवसाय या आय दीर्घकाल में टिकती है, जो ईमानदारी और पारदर्शिता पर आधारित हो। जो कम्पनियाँ मिलावट, कर-चोरी या धोखाधड़ी से धन कमाती हैं, वे कुछ समय बाद कानून, बाज़ार या समाज के हाथों दण्डित होकर डूब जाती हैं।  जबकि ईमानदार व्यवसाय पीढ़ियों तक फलते-फूलते हैं। जैसे टाटा इत्यादि।
 
. चित्तिं दक्षस्य-  बल के साथ विवेक

ऋषि प्रार्थना करते हैं,  हे प्रभो! हमें धन के साथ दक्षता, बल और उसका सदुपयोग करने का ज्ञान भी दीजिये। धन की रक्षा के लिए बल आवश्यक है, परन्तु बल का उपयोग कैसे करना है, यह विवेक भी उतना ही आवश्यक है।
 
आधुनिक उदाहरण: जिन देशों को तेल जैसे प्राकृतिक संसाधनों से अपार धन प्राप्त हुआ है, यदि वे इस धन का उपयोग केवल शस्त्रों की होड़ और युद्ध में करते हैं, तो यह विनाश का कारण बनता है। परन्तु वही धन जब शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसंरचना के निर्माण में लगाया जाता है, तो राष्ट्र और समाज दोनों समृद्ध होते हैं। शक्ति के साथ विवेक हो, तो शक्ति विनाशकारी बन जाती है।

. सुभगत्वम् अस्मे: सौभाग्यकारी धन
 
ऋषि प्रार्थना करते हैं,  हे प्रभो! हमें प्राप्त धन सौभाग्य प्रदान करने वाला और सबके लिए मंगलकारी हो, केवल हमारे स्वार्थ तक सीमित रहे।
 
आधुनिक उदाहरण: आज कई उद्योगपति और संस्थाएँ अपने लाभ का एक भाग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा में लगाते हैं। ऐसा धन ही वास्तव में सौभाग्यकारी कहलाता है, क्योंकि वह देने वाले और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। इसके विपरीत जो धन केवल संचय और दिखावे के लिए रखा जाता है, वह व्यक्ति को सुख देता है, समाज को।
 
. पोषं रयीणाम्: धन की स्थायी वृद्धि

ऋषि प्रार्थना करते हैं,  हे प्रभो! हमारे जीवन में समृद्धि, स्थिरता और धन की निरंतर, क्रमिक वृद्धि हो।
 
आधुनिक उदाहरण: जो व्यक्ति अनुशासन के साथ नियमित बचत और निवेश करता है (जैसे मासिक SIP या दीर्घकालिक निवेश), उसकी सम्पत्ति धीरे-धीरे किन्तु स्थायी रूप से बढ़ती है। इसके विपरीत सट्टेबाज़ी या क्षणिक लाभ की होड़ में (जैसे अनियंत्रित शेयर या क्रिप्टो सट्टा) कमाया गया धन उतनी ही तेज़ी से नष्ट भी हो जाता है। वेद यहाँ स्थायी और क्रमिक पुष्टि की कामना करता है, आकस्मिक और अस्थिर लाभ की नहीं।
 
. अरिष्टिं तनूनाम्: शरीर की सुरक्षा
 
ऋषि प्रार्थना करते हैं,  हे प्रभो! हमारे शरीर रोगों से सुरक्षित रहें, हम दीर्घायु और स्वस्थ बने रहें। जब हम धर्मपूर्वक अर्जित धन का उपयोग स्वयं और समाज के कल्याण के लिए करते हैं, तो इसके लिए स्वस्थ, निरोगी शरीर होना भी आवश्यक है। वेदों में भी कहा गया है कि हमारा शरीर वज्र के समान दृढ़ हो। संस्कृत की प्रसिद्ध उक्ति भी है- "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" अर्थात् शरीर ही धर्म-साधन का पहला आधार है। बिना निरोगी शरीर के मनुष्य कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता।
 
आधुनिक उदाहरण: आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में तनाव, अनियमित दिनचर्या और शारीरिक श्रम की कमी से मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोग बढ़ रहे हैं। नियमित व्यायाम, योग और संतुलित आहार अपनाकर ही व्यक्ति उस स्वास्थ्य को बनाए रख सकता है, जो धन और सफलता का सच्चा उपभोग करने के लिए आवश्यक है  क्योंकि रुग्ण शरीर के साथ अपार धन भी निरर्थक है।
 
. स्वाद्मानं वाचः  मधुर वाणी
 
ऋषि कहते हैं,  हे प्रभो! हमारी वाणी शीतल और मधुर हो। शीतल वाणी के अभाव में धन और बल भी स्थायी नहीं रहते। शस्त्र से लगे घाव भर जाते हैं, परन्तु कठोर वाणी से लगा घाव कभी नहीं भरता। महाभारत में द्रौपदी के एक कटु वचन ने ही सम्पूर्ण कौरव वंश के विनाश की नींव रख दी थी।  यह इतिहास इस बात का प्रमाण है कि वाणी की एक चूक कितना बड़ा विध्वंस कर सकती है।

आधुनिक उदाहरण: आज सोशल मीडिया पर कटु और आवेशपूर्ण भाषा, ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियाँ परिवारों, मित्रताओं और यहाँ तक कि समाजों में भी गहरी दरार डाल देती हैं। एक असावधानीपूर्वक बोला गया या लिखा गया शब्द रिश्तों को हमेशा के लिए तोड़ सकता है, जबकि मधुर और संयत वाणी बड़े-बड़े विवादों को भी शांत कर देती है।
 
. सुदिनत्वमह्नाम्:  शुभ और सार्थक दिन
 
ऋषि अन्त में प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमारे सभी दिन शुभ, सार्थक और सुखमय हों। यह प्रार्थना पिछली सभी कामनाओं का सार है। धर्मयुक्त धन, विवेकपूर्ण बल, सौभाग्य, स्थायी समृद्धि, स्वस्थ शरीर और मधुर वाणी,  जब ये सब एक साथ प्राप्त होते हैं, तभी मनुष्य के दिन वास्तव में "सुदिन" (शुभ दिन) कहलाते हैं।
 
आधुनिक उदाहरण: आज व्यक्ति भौतिक सफलता तो पा लेता है, पर मानसिक शांति और सार्थकता के अभाव में उसके दिन खाली-खाली लगते हैं। जीवन में सन्तुलन- काम, स्वास्थ्य, परिवार और आत्मिक शांति का सामंजस्य  ही किसी दिन को वास्तव में शुभ बनाता है।
 
 
यह ऋचा वस्तुतः एक सन्तुलित, सार्थक जीवन का सम्पूर्ण खाका प्रस्तुत करती है। ऋषि केवल धन नहीं माँगता, वह माँगता है धर्मपूर्वक अर्जित धन, उसे सम्भालने और सदुपयोग करने का विवेक, ऐसा धन जो सबके लिए मंगलकारी हो, उसकी स्थायी और क्रमिक वृद्धि, उसे भोगने के लिए स्वस्थ शरीर, सम्बन्धों को सहेजने वाली मधुर वाणी, और अन्ततः इन सबके परिणामस्वरूप सार्थक, शुभ दिन।
 
आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ लोग तेज़ी से अमीर बनने, सत्ता पाने और सफलता दिखाने की होड़ में लगे हैं, यह मन्त्र एक सजग चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों है  कि केवल धन-संग्रह पर्याप्त नहीं है। धन के साथ विवेक हो तो वह विनाशकारी बनता है (जैसे संसाधन-सम्पन्न पर संघर्षग्रस्त देश), धन में सामाजिक भागीदारी हो तो वह सौभाग्य नहीं बनता, स्वास्थ्य हो तो धन निरर्थक है, और वाणी में मिठास हो तो बना-बनाया सम्बन्ध और साम्राज्य भी क्षण भर में बिखर सकता है। यही इस वैदिक ऋचा की शाश्वत और आज भी उतनी ही प्रासंगिक शिक्षा है।
 

सोमवार, 13 जुलाई 2026

गोबर और गोमूत्र से CBG: भारत की अगली श्वेत-हरित क्रांति

 


भारत के पास 40 करोड़ से अधिक गोवंश व भैंसों का विशाल पशुधन है। आज भी देश में प्रतिदिन निकलने वाला अधिकांश गोबर और गोमूत्र बिना किसी आर्थिक उपयोग के व्यर्थ चला जाता है। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक से Compressed Bio Gas (CBG) और उससे जुड़े उप-उत्पादों में बदल दिया जाए, तो भारत ऊर्जा, कृषि और पर्यावरण — तीनों क्षेत्रों में एक नई क्रांति ला सकता है।

CBG क्या है?

गोबर व कृषि अवशेषों को बंद टैंक (Anaerobic Digester) में सड़ाकर बायोगैस बनाई जाती है, फिर उसे शुद्ध कर CNG-जैसी गुणवत्ता वाली CBG प्राप्त की जाती है, जिसका उपयोग रसोई गैस, वाहन व उद्योगों में होता है।

सरकारी योजनाएँ — SATAT और GOBAR-DHAN

2018 में शुरू हुई SATAT योजना के तहत उद्यमी CBG संयंत्र लगाकर तेल कंपनियों (IOC, BPCL, HPCL) को गैस बेच सकते हैं — वर्तमान दर लगभग ₹46 प्रति किलोग्राम है। इसके समांतर GOBAR-DHAN योजना के तहत 2024-25 तक देशभर में 589 संयंत्र चालू हो चुके हैं (168 जिलों में), और सरकार का लक्ष्य 5,000 संयंत्रों से 1.5 करोड़ टन वार्षिक CBG उत्पादन तक पहुँचना है। घरेलू बायोगैस संयंत्र पर ₹10,000–40,000 तक सब्सिडी भी मिलती है।

ताज़ा उदाहरण: महाराष्ट्र के कोपरगाँव में भारत का पहला सहकारी मल्टी-फीड CBG संयंत्र प्रतिदिन 12 टन CBG व 75 टन पोटाश-खाद बना रहा है। छत्तीसगढ़ ने जून 2026 में CG-CBG नीति स्वीकृत की है, जिससे राज्य में सालाना लगभग 1.65 लाख टन CBG उत्पादन की संभावना है।

गोमूत्र — दूसरा अनदेखा खज़ाना

चर्चा अक्सर केवल गोबर तक सीमित रहती है, जबकि गोमूत्र भी उतना ही मूल्यवान है:

  • गोनायल — फिनाइल का प्राकृतिक विकल्प
  • गो-अर्क / गोधन अर्क — आयुर्वेदिक डिटॉक्स उत्पाद
  • धूप, अगरबत्ती, हवन सामग्री, तरल जैव-कीटनाशक

पतंजलि और खादी ग्रामोद्योग जैसी संस्थाएँ इस मॉडल पर वर्षों से काम कर रही हैं। उत्तराखंड की आंचल डेयरी ने पशुपालकों से ₹6/लीटर पर गोमूत्र खरीदा और शोधन के बाद ₹25/लीटर पर पतंजलि आयुर्वेद को बेचा — यानी गोमूत्र भी दूध-गोबर जितना ही वास्तविक नकद-संसाधन बन सकता है।

गोबर-पेंट भी अब हकीकत है: खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) का "खादी प्राकृतिक पेंट" — जो एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और BIS-प्रमाणित है — जनवरी 2021 में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा लॉन्च हुआ और PMEGP योजना के तहत किसानों को गोबर देकर सीधी आमदनी देता है। इस पेंट में सीसा, पारा, क्रोमियम जैसे विषैले भारी धातु नहीं होते और यह मात्र 4 घंटे में सूख जाता है। आंचल डेयरी भी अब बायोगैस के साथ गोबर-पेंट उत्पादन की योजना पर काम कर रही है, यानी एक ही डेयरी-सहकारी ढाँचे के भीतर दूध, गैस और पेंट — तीनों आय-स्रोत जुड़ सकते हैं।

1000 गायों पर आधारित मॉडल

1000 गायों से प्रतिदिन लगभग 10 टन गोबर व 5,000–8,000 लीटर गोमूत्र मिलता है, जिससे:

  • 180–220 किग्रा CBG प्रतिदिन (₹46/किग्रा पर लगभग ₹8,300–10,000 प्रतिदिन)
  • उच्च गुणवत्ता जैविक खाद व तरल उर्वरक
  • गोमूत्र-उत्पादों (गोनायल, गो-अर्क) से अतिरिक्त आय

ऐसे संयंत्र की लागत लगभग ₹2–4 करोड़ है, जिसमें सरकारी सब्सिडी व बैंक ऋण का सहारा लिया जा सकता है।

तीन व्यावहारिक मॉडल

1. निजी कंपनी मॉडल: गाँवों से गोबर-गोमूत्र खरीदकर CBG व गोमूत्र-उत्पाद दोनों बनाना और तेल कंपनियों व उपभोक्ताओं को बेचना।

2. सहकारी मॉडल: मौजूदा डेयरी नेटवर्क का उपयोग कर एक ही केंद्र पर दूध, गोबर, गोमूत्र तीनों की खरीद। NDDB का गुजरात का ज़करियापुर मॉडल (घरेलू स्तर पर 2 घन मीटर के छोटे बायोगैस संयंत्र, स्लरी से "सुधन" ब्रांड खाद — 79,000+ प्लांट) और उत्तर प्रदेश का वाराणसी मॉडल (रोज़ाना 100 टन गोबर से 4,000 घन मीटर बायोगैस, डेयरी प्लांट को ऊर्जा) इसके सफल उदाहरण हैं।

3. गोशाला मॉडल: बूढ़ी व अनुपयोगी गायों वाली गोशालाएँ CBG व गोमूत्र-प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर दान-निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकती हैं।

एक छोटे किसान को कितना लाभ?

एक गाय से प्रतिदिन 10 किलो गोबर (₹2/किग्रा पर ₹20/दिन) और 5-6 लीटर गोमूत्र (₹5-6/लीटर पर ₹25-30/दिन) से किसान को कुल मिलाकर प्रतिदिन ₹45-50, यानी सालभर में लगभग ₹16,000-18,000 की अतिरिक्त आय हो सकती है — जो अकेले गोबर बेचने से लगभग दोगुनी है। स्लरी-खाद के उपयोग से दूध उत्पादन भी 1-2 लीटर बढ़ने की संभावना है, जिससे कुल दैनिक आय ₹80-100 तक पहुँच सकती है — यानी वार्षिक आय में 15-20% या अधिक की वृद्धि।

राष्ट्रीय स्तर पर संभावना

यदि 20 करोड़ पशुओं का गोबर CBG संयंत्रों तक पहुँचे, तो प्रतिदिन 35,000-45,000 टन CBG बन सकती है। भारत की कुल संभावित CBG क्षमता लगभग 62 मिलियन टन प्रतिवर्ष आँकी गई है — जो घरेलू रसोई गैस के साथ-साथ उद्योगों व परिवहन की माँग भी पूरी कर सकती है, जिससे आयातित LPG-LNG पर निर्भरता व विदेशी मुद्रा का खर्च दोनों घटेंगे। इसके साथ ही गोबर-गोमूत्र संग्रह, परिवहन, संयंत्र संचालन, गोनायल-अगरबत्ती निर्माण, खाद पैकेजिंग व विपणन जैसे क्षेत्रों में लाखों नए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार बन सकते हैं, और किसान दूध के साथ-साथ गोबर, गोमूत्र व खाद बेचकर बहु-आयामी आय अर्जित कर सकेगा।

सरकार को क्या करना चाहिए?

  • हर 8-10 गाँवों के समूह में एकीकृत CBG + गोमूत्र-प्रोसेसिंग संयंत्र
  • गोबर के साथ गोमूत्र का भी न्यूनतम खरीद मूल्य घोषित हो
  • सहकारी CBG मॉडल (कोपरगाँव) व राज्य-स्तरीय नीतियों (छत्तीसगढ़ की तरह) को बढ़ावा
  • डेयरी सहकारी समितियों को दूध-गोबर-गोमूत्र तीनों की खरीद से जोड़ा जाए

निष्कर्ष

जिस गोबर-गोमूत्र को आज अधिकांश लोग अपशिष्ट समझते हैं, वही आने वाले भारत की ऊर्जा, जैविक खेती और ग्रामीण समृद्धि का सबसे बड़ा आधार बन सकता है। श्वेत क्रांति ने भारत को दुग्ध उत्पादन में विश्व अग्रणी बनाया था — अब समय है कि गोबर-गोमूत्र आधारित CBG क्रांति भारत को स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी विश्व-नेतृत्व दे। तब किसान केवल "अन्नदाता" नहीं, "ऊर्जादाता" भी कहलाएगा।


स्रोत: SATAT योजना, GOBAR-DHAN योजना, छत्तीसगढ़ CG-CBG नीति 2026, कोपरगाँव CBG संयंत्र, आंचल डेयरी, पतंजलि/खादी ग्रामोद्योग, KVIC खादी प्राकृतिक पेंट, NDDB ज़करियापुर/वाराणसी मॉडल।

सोमवार, 6 जुलाई 2026

शस्त्र और शास्त्र : राष्ट्रवैभव का द्विसूत्र



 
शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते।
राष्ट्रे शास्त्रविहीने तु शस्त्रं नश्यति न संशयः॥ (महाभारत)
 
इस श्लोक में 'शस्त्र' (सुरक्षा, सेना, सामर्थ्य) और 'शास्त्र' (ज्ञान, विज्ञान, कला, संस्कृति तथा विवेक) के महत्व तथा उनके परस्पर पूरक संबंध का अत्यंत सटीक वर्णन किया गया है। जब कोई राष्ट्र सुदृढ़ सैन्य शक्ति, आंतरिक व्यवस्था और बाह्य सुरक्षा के कारण सुरक्षित होता है, तभी वहाँ ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य और चिंतन का विकास संभव होता है। यदि राष्ट्र सुरक्षित न हो, तो लोगों का पूरा ध्यान केवल अपने अस्तित्व की रक्षा में लगा रहता है और ज्ञान-विज्ञान की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है।
 
इसके विपरीत, जिस राष्ट्र के पास केवल शस्त्रों का बल हो, किंतु 'शास्त्र' अर्थात् विवेक, नैतिकता, ज्ञान और मर्यादा का अभाव हो, वहाँ वही शक्ति अंततः उसके स्वयं के विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए "शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते" यह श्लोक राष्ट्रनिर्माण और राष्ट्र के स्थायी अस्तित्व का मूल सिद्धांत प्रस्तुत करता है। किसी भी देश की उन्नति के लिए सुरक्षा (शस्त्र) और विवेकपूर्ण ज्ञान (शास्त्र)इन दोनों का संतुलन समान रूप से आवश्यक है।
 
इतिहास साक्षी है कि जब-जब कोई राष्ट्र सामर्थ्यवान बना, तभी वहाँ ज्ञान और विज्ञान का भी उत्कर्ष हुआ। भारत का गुप्तकाल इसका स्वर्णिम उदाहरण माना जाता है। सम्राट चंद्रगुप्त और समुद्रगुप्त ने पहले शस्त्रबल के आधार पर विशाल, सुरक्षित और स्थिर साम्राज्य की स्थापना की। उसी सुरक्षित वातावरण में आर्यभट्ट, वराहमिहिर और कालिदास जैसे महान विद्वानों ने विज्ञान, साहित्य और संस्कृति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
आज का अमेरिका और चीन भी इसी मार्ग पर आगे बढ़े। उन्होंने पहले अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया, और उसके बाद आर्थिक, तकनीकी तथा वैज्ञानिक महाशक्ति के रूप में विश्व में प्रतिष्ठित हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की बढ़ती सामरिक क्षमता का प्रभाव विश्व ने और अधिक स्पष्ट रूप से देखा।

किन्तु इतिहास यह भी सिखाता है कि विवेक के बिना प्रयुक्त शस्त्र अंततः विनाश का कारण बनता है। आर्थिक और सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली जर्मनी ने विवेक खोकर अहंकारवश पूरे विश्व को जीतने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ, लाखों निर्दोष लोगों की मृत्यु हुई और स्वयं जर्मनी भी भारी विनाश का शिकार बना। नेपोलियन की पराजय भी उसकी असीम महत्वाकांक्षा और अविवेकपूर्ण सैन्य नीति का ही परिणाम थी।
 
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में गाज़ा पट्टी का संघर्ष इसका एक जीवंत उदाहरण है। अतिवादी विचारधारा से प्रेरित होकर परिणामों की परवाह किए बिना अपने से कई गुना अधिक शक्तिशाली राष्ट्र पर आत्मघाती हमला किया गया। यदि उचित शिक्षा, नैतिकता और दूरदर्शिता होती, तो ऐसा निर्णय नहीं लिया जाता। इस अविवेकपूर्ण हिंसा का परिणाम यह हुआ कि आज गाज़ा का बड़ा भाग विनाश का शिकार हो चुका है और हजारों निर्दोष नागरिकों को अपने प्राण गंवाने पड़े हैं। ये सभी घटनाएँ स्पष्ट रूप से सिद्ध करती हैं कि 'शास्त्र' (विवेक) के मार्गदर्शन के बिना 'शस्त्र' (शक्ति) अंततः स्वयं अपने विनाश का कारण बन जाता है।
 
इसी सिद्धांत की पुनर्पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम श्लोक में भी मिलती है:
 
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥

यहाँ श्रीकृष्ण ज्ञान, नीति, विवेक और शास्त्र के प्रतीक हैं, जबकि धनुर्धारी अर्जुन शौर्य, सामर्थ्य और शस्त्र के प्रतीक हैं। जहाँ इन दोनों का समन्वय होता है, वहीं विजय, समृद्धि, सुशासन और शाश्वत विकास का वास होता है।
 
संक्षेप में, शस्त्र राष्ट्र की रक्षा करते हैं और शास्त्र राष्ट्र को समृद्ध बनाते हैं। इन दोनों का संतुलित समन्वय ही राष्ट्रवैभव और राष्ट्रोत्कर्ष का सनातन मंत्र है।

बुधवार, 1 जुलाई 2026

समर्थ रामदास का कृषि-दर्शन (जल प्रबंधन, बहुफसली खेती और किसान समृद्धि का कालजयी संदेश)

 



समर्थ रामदास कहते हैं :  

दी का जल यदि यूँ ही बह जाए तो वह व्यर्थ चला जाता है; किंतु उसी जल को बाँधों में रोककर, नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाए और उसका विवेकपूर्ण प्रबंधन किया जाए, तो वही जल धरती को स्वर्ण के समान मूल्यवान उपज प्रदान करता है।

जल और परिश्रम के समुचित संगम से खेतों में आम, अंजीर, गन्ना, अंगूर, केले तथा अनेक प्रकार की फसलें लहलहाती हैं। प्रकृति का सम्मान, जल का संरक्षण और खेती में विविधता-यही किसान की समृद्धि का आधार है। 

एक टीवी चैनल पर एक छोटे किसान की कहानी दिखाई गई थी। अपने छोटे-से खेत में उसने अनेक प्रकार की फसलें, सब्जियाँ और फल उगाकर अच्छी आय का स्रोत बनाया था। वह कार्यक्रम देखते समय मुझे समर्थ रामदास जी की उपर्युक्त पंक्तियाँ याद आ गईं।

पुराणों में एक प्रसिद्ध उक्ति है- "जो कृषि करता है, वही ऋषि है।" हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं करते थे, बल्कि खेती भी करते थे। वैदिक काल में उनके आश्रम कृषि अनुसंधान के भी केंद्र थे। संभवतः इसी कारण भारत की कृषि परंपरा में इतनी विविधता विकसित हुई। समर्थ रामदास भी एक महान ऋषि थे।

समर्थ रामदास ने बारह वर्षों तक पूरे देश का भ्रमण किया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने किसानों के जीवन और उनकी समस्याओं को निकट से देखा-समझा। उन्होंने अनुभव किया कि जल का उचित प्रबंधन और फसलों की सही योजना बनाए बिना किसान समृद्ध नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने किसानों की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी बताए।

समर्थ कहते हैं कि नदियों का जो पानी व्यर्थ बह जाता है, उसे बाँधों के माध्यम से रोकना चाहिए। नहरें बनाकर पानी खेतों तक पहुँचाना चाहिए और उपलब्ध जल का योजनाबद्ध उपयोग करना चाहिए। जितना पानी उपलब्ध हो, उसी के अनुसार फसलों का चयन करना चाहिए तथा प्रत्येक फसल को उसकी आवश्यकता के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।

वे यह भी कहते हैं कि खेत में एक ही प्रकार की फसल लेने के बजाय अनेक प्रकार की फसलें उगानी चाहिए। अक्सर किसान अधिक लाभ की आशा में पूरे खेत में केवल एक ही फसल बो देते हैं। लेकिन यदि तूफान, तेज हवा, कम या अधिक वर्षा अथवा कीटों का प्रकोप हो जाए, तो पूरी फसल नष्ट हो जाती है और किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।

कई बार किसी नकदी फसल के अधिक लाभ के लालच में किसी क्षेत्र के अधिकांश किसान वही एक फसल उगाने लगते हैं। परिणामस्वरूप जब वह फसल एक साथ बाजार में आती है, तो उसकी कीमतें गिर जाती हैं और किसानों को भारी आर्थिक हानि होती है। टमाटर, प्याज जैसी फसलों के दामों में अचानक आने वाली गिरावट का यह भी एक प्रमुख कारण है।

लगातार नुकसान होने से किसान कर्ज के बोझ तले दब जाता है। प्रायः आत्महत्या करने वाले अधिकांश किसान वे होते हैं, जिन्होंने केवल एक ही फसल पर निर्भरता रखी होती है। यदि खेत में अनेक प्रकार की फसलें उगाई जाएँ, तो किसी एक फसल के नष्ट होने पर भी अन्य फसलें किसान को सहारा दे सकती हैं और उसकी आर्थिक स्थिति इतनी विकट नहीं बनती।

समर्थ आगे कहते हैं कि खेत की उपयुक्त जगहों पर विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष भी अवश्य लगाने चाहिए। ये वृक्ष एक ओर तेज हवाओं से फसलों की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर अपने फलों से किसान की आय का अतिरिक्त स्रोत भी बनते हैं।

यदि आज भी किसान समर्थ रामदास द्वारा बताए गए इन सिद्धांतों—जल संरक्षण, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, फसलों की विविधता तथा फलदार वृक्षों के रोपण—को अपनाएँ, तो वे अपनी खेती को सचमुच "सुवर्ण फसल" देने वाली बना सकते हैं।

सोमवार, 29 जून 2026

युवाओं का मार्ग: शिक्षा, सेवा और लोकतंत्र से राष्ट्रनिर्माण"

 

भारत दुनिया के सबसे युवा लोकतांत्रिक राष्ट्रों में से एक है। हमारे देश का भविष्य विद्यार्थियों और युवाओं के हाथ में है। आज सोशल मीडिया के युग में अनेक संगठन, नेता और आंदोलन युवाओं को अपने विचारों से जोड़ने का प्रयास करते हैं। ऐसे समय में प्रत्येक विद्यार्थी को भावनाओं के बजाय विवेक, अध्ययन और दूरदृष्टि के आधार पर निर्णय लेना आवश्यक है।

दिल्ली में आंदोलन करने की जगह जंतर-मंतर पर करोड़ों अनुयायियों वाली "कोक्रोच" संगठन का आंदोलन हुआ। भारतीय और वैश्विक मीडिया का ध्यान उस आंदोलन पर था। लेकिन वह आंदोलन पूरी तरह असफल रहा। युवा पीढ़ी आंदोलन से दूर ही रही। इसका कारण क्या था? सबसे पहले यह समझना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति केवल नारों, आंदोलनों या सोशल मीडिया प्रचार से नहीं होती। राष्ट्रनिर्माण के लिए शिक्षा, चरित्र, कौशल, संगठन शक्ति और समाजसेवा की आवश्यकता होती है। इतिहास गवाह है कि समाज में स्थायी परिवर्तन लाने वाले व्यक्तियों और संगठनों ने वर्षों तक अध्ययन, तपस्या और जनसेवा की थी।

भारतीय लोकतंत्र पर युवाओं का विश्वास हमेशा दृढ़ रहा है। इसका उदाहरण है कि विभिन्न समयों में शिक्षित युवाओं ने लोकतांत्रिक मार्ग से सत्ता परिवर्तन किया है। असम के छात्र आंदोलनों से नेतृत्व उभरा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से सत्ता प्राप्त हुई। अरविंद केजरीवाल ने नया राजनीतिक दल स्थापित कर लोकतांत्रिक मार्ग से सत्ता हासिल की। दक्षिण भारत में अभिनेता विजय ने भी राजनीति में प्रवेश कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास व्यक्त किया। इससे स्पष्ट होता है कि भारत के युवा परिवर्तन के लिए मतपेटी और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही सबसे प्रभावी साधन मानते हैं।

युवाओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक जनाधार दो अलग बातें हैं। लाखों फॉलोअर्स होना और हजारों समर्पित कार्यकर्ता होना—इनमें बड़ा अंतर है। किसी संगठन की असली ताकत उसकी सेवा गतिविधियों, संगठन शक्ति और समाज से जीवंत संबंधों में होती है। जो संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामविकास, आपदा निवारण और समाजसेवा के लिए निरंतर कार्य करता है, उसी को स्थायी जनसमर्थन प्राप्त होता है। सोशल मीडिया से अनुयायी मिलते हैं, लेकिन वास्तविक जनसमर्थन नहीं मिलता—यह हमने हाल ही में अनुभव किया है। इससे एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है: केवल प्रचार पर्याप्त नहीं होता। समाज का विश्वास जीतने के लिए निरंतर सेवा, संपर्क और संगठन निर्माण आवश्यक है। उदाहरण के लिए, सौ वर्ष का सफर पूरा करने के बाद भी आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) एक सामाजिक संगठन के रूप में जनता में लोकप्रिय और प्रभावी है।

विद्यार्थियों और युवाओं को आंदोलनों में भाग लेते समय विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण और कानूनी आंदोलन नागरिकों का अधिकार है। लेकिन यदि किसी आंदोलन में अराजक तत्व घुस जाएं और हिंसा या तोड़फोड़ हो, तो उसके परिणाम निर्दोष युवाओं को भी भुगतने पड़ सकते हैं। न्यायिक प्रक्रिया वर्षों तक चल सकती है। ऐसे विवादों से विद्यार्थियों की शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार अवसरों पर असर पड़ सकता है। आज के प्रतिस्पर्धी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी हर क्रिया के दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं कि युवाओं को समाज और राष्ट्र के प्रश्नों से दूर रहना चाहिए। बल्कि उन्हें पहले स्वयं को सक्षम बनाना चाहिए। ज्ञान, कौशल, चरित्र और आर्थिक स्वावलंबन प्राप्त करने के बाद समाज के लिए किया गया कार्य अधिक प्रभावी होता है। इतिहास के अनेक महान नेताओं ने पहले शिक्षा पूरी की, स्वयं को गढ़ा और उसके बाद समाजकार्य में प्रवेश किया। महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। उन्होंने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की व्यापक दृष्टि भी दी।

सामाजिक सुधार के क्षेत्र में स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन अत्यंत प्रेरणादायी है। उन्होंने अपने गुरु विरजानंद से वेद, उपनिषद और धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उसके बाद पूरे भारत का भ्रमण कर समाज की समस्याओं को समझा। अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, जादूटोना, खर्चीले कर्मकांड और विभिन्न सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने जागृति की। उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। आगे चलकर शिक्षा के प्रसार के लिए डी.ए.वी. संस्थाओं जैसी शैक्षणिक परंपराओं को प्रेरणा मिली। यह उदाहरण बताता है कि स्थायी सामाजिक परिवर्तन के लिए गहन अध्ययन, चिंतन और संगठन निर्माण आवश्यक है।

आज का विद्यार्थी यदि वास्तव में समाज परिवर्तन लाना चाहता है, तो उसे तीन बातें करनी चाहिए। प्रथम-अपने शिक्षा और कौशल विकास पर पूरा ध्यान केंद्रित करना। द्वितीय- किसी वास्तविक समाजसेवा कार्य से जुड़ना, जैसे जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाना, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान या कौशल प्रशिक्षण। तृतीय- लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ज्ञान लेकर सजग और जिम्मेदार नागरिक बनना।

लोकतंत्र में सरकार बदलने का सबसे प्रभावी और स्थायी साधन है चुनाव। यदि किसी व्यक्ति या समूह को लगता है कि सरकार की नीतियों में त्रुटियाँ हैं, तो उन्हें लोगों को अपने विचारों से जोड़ना चाहिए, संगठन खड़ा करना चाहिए और लोकतांत्रिक मार्ग से जनसमर्थन प्राप्त करना चाहिए। यही मार्ग संविधानसम्मत है और दीर्घकालीन सफलता दिलाने वाला है।

अंत में विद्यार्थियों को एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि क्षणिक भावनाओं की तुलना में दीर्घकालीन निर्माण अधिक महत्वपूर्ण होता है। नारे लगाने से अधिक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि से अधिक चरित्र निर्माण महत्वपूर्ण है। और केवल विरोध करने से अधिक समाज और राष्ट्र को आगे ले जाने वाला सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करना आवश्यक है।"

सोमवार, 1 जून 2026

सनातन धर्म में मंदिर व्यवस्था: सामाजिक-आर्थिक केंद्र और समर्थ रामदास स्वामी का प्रबंधन दर्शन

 
हमारे सनातन धर्म में मंदिर केवल देवदर्शन और पूजा-पाठ तक सीमित स्थान नहीं है, बल्कि वह पूरे समाज को एक सूत्र में बांधने वाला और स्थानीय अर्थव्यवस्था को गतिमान करने वाला मुख्य केंद्र है। मंदिरों में आयोजित होने वाले देवताओं के बहुदिवसीय उत्सव, मेले, भागवत सप्ताह, प्रवचन और कीर्तनों के माध्यम से न केवल आध्यात्मिक चेतना जाग्रत होती है, बल्कि लोककला और व्यापार का एक विशाल मंच भी तैयार होता है। इन मेलों में समाज के प्रत्येक वर्ग और कलाकार को अपना अधिकारिक स्थान मिलता है। नट, बहुरूपिया, जादूगर, दशावतारी व गोंधली कलाकार और लोकनृत्य प्रस्तुत करने वाली नर्तकियां अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं; जिससे हमारी पारंपरिक लोक कलाओं का संरक्षण होता है।
 
इसके साथ ही, बच्चों के खिलौने बेचने वाले, सुगंधित द्रव्य, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और विभिन्न सामग्रियों के स्टॉल लगाने वाले छोटे व्यापारियों, साथ ही ज्ञान का प्रसार करने वाले पुस्तक विक्रेताओं को इस अवसर पर एक बड़ा बाजार मिलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर परिसर में लगने वाले इन मेलों के कारण उस क्षेत्र के किसानों, कुम्हारों, बुनकरों और हस्तशिल्प कारीगरों के उत्पादों को सीधे ग्राहक मिल जाते हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) को बहुत बड़ा संबल मिलता है। उत्सव के समय दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा के लिए आयोजित किए जाने वाले निःशुल्क चिकित्सा (मेडिकल) शिविर और अन्नक्षेत्र (भंडारे) मंदिर की सामाजिक जिम्मेदारी के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। संक्षेप में कहें तो, हमारे मंदिर केवल उपासना के स्थल नहीं हैं, बल्कि वे कला, संस्कृति, व्यापार, स्वास्थ्य और समाज कल्याण का समन्वय करने वाली एक आदर्श, आत्मनिर्भर व्यवस्था हैं।

संत समर्थ रामदास स्वामी केवल पारमार्थिक संत नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी समाज-संगठक और कुशल प्रबंधक भी थे। उन्होंने शिवकाल में महाराष्ट्र में जिन मंदिरों की स्थापना की, वे केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं थे, बल्कि संकट के समय समाज को अनाज, आश्रय और संबल देने वाले प्रमुख केंद्र थे। समर्थ ने महाराष्ट्र के कोने-कोने में 1100 से अधिक मठों और मारुति (हनुमान) मंदिरों की स्थापना की। एक केंद्रीय मुख्य पीठ (चाफल) से इन सभी मठों के नेटवर्क और वहां काम करने वाले सैकड़ों युवा 'रामदासी' कार्यकर्ताओं को संभालना, उत्कृष्ट नेटवर्क मैनेजमेंट (Network Management) और नेतृत्व का एक बेहतरीन उदाहरण है। ऐसा करते समय मठ और मंदिर का निर्माण कैसे होना चाहिए, वहां की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, इसका विस्तृत वर्णन श्री सार्थ दासबोध के 'अर्चन भक्ति' और अन्य समासों (अध्यायों) में किया गया है।
 
१. मंदिर का परिसर वैभवपूर्ण हो

समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं कि पुराने हो चुके देवालयों और मंदिरों का जीर्णोद्धार करना चाहिए और उसके लिए आवश्यक कार्य तत्परता से पूरा करना चाहिए। हाथी, रथ, घोड़े, सिंहासन, चौरंग, पालकियां, सुखदायक वाहन, मंचक (पलंग), विमान आदि सभी साधनों का नवीनीकरण करके उन्हें सुसज्जित रखना चाहिए। मेघडंबरी (छतरीनुमा ढांचा), छत्र, चामर, अब्दागिरियां (शाही छतरियां), निशान (ध्वज) जैसी वस्तुओं को सावधानीपूर्वक संभालना चाहिए। भगवान के विभिन्न प्रकार के वाहनों, बैठने के उत्तम स्थानों और अनेक प्रकार के सुवर्ण आसनों आदि को यत्नपूर्वक सुरक्षित रखना चाहिए। भवन, कक्ष, पेटियां, पिटारे, रांझण (मिट्टी के बड़े बर्तन), हौद, गागर जैसी मूल्यवान और उपयोगी वस्तुओं को अत्यंत प्रयास से संचित करना चाहिए।
 
संकट के समय काम आने वाले अनेक तहखानों, गुप्त सुरंगों और उन्हें जोड़ने वाले गुप्त रास्तों, विभिन्न स्थानों को जोड़ने वाले गुप्त द्वारों और अत्यंत बहुमूल्य वस्तुओं के भंडारों (खजाने) का योजनाबद्ध तरीके से निर्माण और संरक्षण करना चाहिए। उत्तम स्थान का चयन कर भव्य मंदिर का निर्माण करना चाहिए। वहां अनेक देवकुल (छोटे मंदिर), शिखर, बड़े प्रांगण, मंडप, धर्मशालाएं, कुएं, सरोवर, मठ आदि का निर्माण कराया जाना चाहिए। मंदिर के परिसर में सुंदर उपवन और सुगंधित फूलों के बगीचे (पुष्पवाटिका) होने चाहिए; जहां ऋषि-मुनि और तपस्वी शांत वातावरण में तपस्या कर सकें। तोता, मैना, मोर और कोयल जैसे पक्षी अपनी मधुर आवाज से उस परिसर को जीवंत रखेंगे। इस नैसर्गिक और पवित्र परिसर में ईश्वर की सेवा और वैभव के लिए गाय, भैंस, घोड़े, हाथी, साथ ही तालाब में तैरने वाले बत्तख जैसे पशु-पक्षी मंदिर को अर्पित किए जाने चाहिए।

२. भक्तों की व्यवस्था

तडाग कूप आणि सरोवर। निर्मळोदके भरले दिसावे।
धर्मशाळा आणि अन्नछत्र। जेथे विसावे साधूपात्र॥
 
मंदिर में होने वाले उत्सवों और मेलों में भाग लेने के लिए दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं और साधु-संतों की सुविधा का ध्यान रखना मंदिर का प्रमुख कर्तव्य है। उस काल में लोग पैदल चलकर देवदर्शन के लिए आते थे। कई बार उनके पास पर्याप्त धन या खाने-पीने की सामग्री नहीं होती थी। समर्थ ने इसके लिए निर्देश दिया है कि मंदिर का निर्माण करते समय परिसर में स्वच्छ पानी, आवास और भोजन की सुदृढ़ व्यवस्था होनी चाहिए। भक्तों के स्नान और पीने के पानी के लिए मंदिर परिसर में तालाब (तडाग), कुआं (कूप) या सरोवर होना चाहिए, जो हमेशा निर्मल जल से भरा रहे। साथ ही यात्रियों के ठहरने के लिए 'धर्मशाला' और भूखों के लिए निरंतर 'अन्नक्षेत्र' (भंडारा) चलाया जाना चाहिए, ताकि वहां आने वाले साधु-संतों और निर्धनों को सम्मानजनक आश्रय मिल सके।
 
३. अन्नभंडार (धान्यकोठी) और सामग्री प्रबंधन
 
मंदिर के गोदामों में हमेशा प्रचुर मात्रा में अनाज भरा होना चाहिए और सभी प्रकार की सामग्री पहले से ही तैयार रखनी चाहिए। आवश्यकता के समय, उत्सव के अवसरों पर या अकाल जैसी आपातकालीन स्थितियों में उस सामग्री का उपयोग अत्यंत आदर, सुनियोजित पद्धति और चतुराई से लोगों की सेवा के लिए किया जाना चाहिए।
 
४. संकटकालीन प्रबंधन (Crisis Management) एवं सुरक्षा

शिवकाल में विदेशी आक्रमणों और अकाल, दोनों ही संकटों का लगातार सामना करना पड़ता था। ऐसे समय में मंदिरों में तहखाने और अन्न भंडार तैयार रखना समर्थ का एक ऐसा विचार था जिसे आज के समय में 'Risk & Crisis Management' कहा जाता है।
 
भुयेरीं तळघरें आणी विवरें । नाना स्थळें गुप्त द्वारें ।
अनर्घ्ये वस्तूंचीं भांडारें । येत्नें करीत जावीं ॥
 
समर्थ कहते हैं कि मंदिर में गुप्त सुरंगें, तहखाने, विवर (गुफाएं) जैसे कई गुप्त स्थान और उन्हें जोड़ने वाले गुप्त रास्ते बनाने चाहिए। साथ ही अमूल्य वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए गुप्त भंडार (तिजोरियां) यत्नपूर्वक बनाने चाहिए। भारत के इतिहास में मंदिरों पर बार-बार विदेशी आक्रमण हुए। लुटेरे शासकों ने मंदिरों का सोना, मूर्तियां और बहुमूल्य संपत्ति लूटने का प्रयास किया। ऐसे संकट के समय गुप्त सुरंगों और तहखानों के कारण भगवान की मूर्ति और खजाना शत्रुओं की नजरों से सुरक्षित रहता था। गुप्त द्वारों की वजह से पुजारी और श्रद्धालु संकट के समय सुरक्षित बाहर निकल सकते थे। इन भंडारों में संचित धन आगे चलकर मंदिर के पुनर्निर्माण, धर्मकार्य और जरूरतमंद भक्तों की सहायता के लिए उपयोगी साबित होता था। संक्षेप में, संकट के समय मंदिर का अस्तित्व, देवता की प्रतिष्ठा और सदियों से एकत्रित संपत्ति की रक्षा इस गुप्त व्यवस्था के कारण ही संभव हो पाती थी। समर्थ ने यह बात केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक दृष्टिकोण से कही है।
 
५. आदर्श मंदिर प्रबंधक: समर्थ के 'महंत लक्षण' में प्रबंधकीय दृष्टि

समर्थ रामदास स्वामी के अनुसार, मंदिर की विशाल व्यवस्था संभालने वाला 'महंत' या प्रबंधक (Manager) अत्यंत कार्यक्षम, चतुर और उत्तम जनसंपर्क वाला होना चाहिए। समर्थ ने 'महंत लक्षण' बताते हुए स्पष्ट किया है कि प्रबंधक को केवल एकांत में नहीं बैठना चाहिए, बल्कि उसे 'लोगों में घुलना-मिलना' चाहिए (लोकसंग्रह करना चाहिए), परंतु अपने अंतःकरण को ईश्वर से जोड़कर रखना चाहिए।
 
एक आदर्श प्रबंधक में असीम सहनशीलता और 'सावधानता' होनी चाहिए, ताकि मंदिर के गोदाम के अनाज, हिसाब-किताब और सुरक्षा में कोई कमी न रहे। 'पहले किया, फिर बताया' (आधी केले मग सांगितले) की उक्ति के अनुसार महंत को स्वयं परिश्रम करके दूसरों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। उसे किसी का भी मन दुखाए बिना, सबको साथ लेकर मंदिर के उत्सव, अन्नक्षेत्र और सामाजिक कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न कराना चाहिए। प्रबंधक के पास 'राजकारण' (अर्थात व्यावहारिक चतुराई और कूटनीति) होना चाहिए, जिससे वह बाहरी संकटों से मंदिर की रक्षा कर सके और आंतरिक व्यवस्था में अनुशासन बनाए रख सके। संक्षेप में, समर्थ का महंत आज के समय के एक सक्षम 'CEO' की तरह है, जिसके पास आध्यात्मिक नैतिकता का आधार और व्यावहारिक प्रशासन (Administration) का बेजोड़ कौशल है। समर्थ कहते हैं:
 
महंतें महंत करावें। युक्तीबुद्धीनें भरावें।
कळावंत करूनि सोडावें। बहुतां janaं॥
 
महंत को केवल स्वयं ही काम नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने अधीन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भी अपने जैसा ही कार्यकुशल और कलावंत (दक्ष) बनाना चाहिए, ताकि मंदिर की व्यवस्था निरंतर और सुचारू रूप से चलती रहे। इसी को आज की कॉर्पोरेट भाषा में 'Succession Planning' (उत्तराधिकार नियोजन) या 'Team Empowerment' (टीम सशक्तिकरण) कहा जाता है।
 
६. भगवान की पूजा-अर्चना
 
पंचामृतें गंधाक्षतें | पुष्पें परिमळद्रव्यें बहुतें |
धूपदीप असंख्यातें | नीरांजनें कर्पुराचीं ||
 
समर्थ कहते हैं कि अनेक प्रकार की उत्तम सामग्रियों से परमेश्वर की पूजा करनी चाहिए। पंचामृत, गंध-अक्षत, पुष्प, प्रचुर सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, कई प्रकार की आरतियां, कपूर और नीरांजन; साथ ही स्वादिष्ट नैवेद्य, विभिन्न प्रकार के फल, तांबूल (पान), दक्षिणा, अनेक आभूषण, उत्तम वस्त्र, वनमाला, पालकियां, छत्र, आरामदायक सुखासन, मेघडंबरी, अब्दागिरियां, दिंडियां, पताका, ध्वज और ताल-मृदंग की गूंज से भगवान का वैभव बढ़ाना चाहिए।
परंतु, यदि परिस्थितियां प्रतिकूल हों और बाहरी संसाधनों की कमी हो, तो समर्थ ने इसका भी मार्ग सुझाया है। अनुकूल परिस्थिति न होने पर अपने अंतर्मन में, मानसिक रूप से षोडशोपचार पद्धति से भगवान की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार की जाने वाली पूजा को 'मानसपूजा' कहा जाता है। जो-जो भव्य-दिव्य आभूषण और वैभव हम प्रत्यक्ष रूप से अर्पित नहीं कर सकते, उन्हें कल्पना के माध्यम से निर्मित कर मन में स्थित परमात्मा को अत्यंत श्रद्धापूर्वक अर्पित करना चाहिए।
 
सारांश

समर्थ रामदास स्वामी ने दासबोध के माध्यम से जो मंदिर और मठ व्यवस्था प्रस्तुत की है, वह केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक अत्यंत उन्नत, व्यावहारिक और आदर्श सामाजिक-प्रशासनिक मॉडल (Administrative Model) है। समर्थ के काल में मंदिरों को केवल भक्ति का केंद्र न रखकर, समाज सुधार, आपातकालीन सहायता और लोककल्याण का मुख्य मंच बनाया गया।

यदि आज की 21वी सदी के आधुनिक प्रबंधन शास्त्र (Modern Management) के परिप्रेक्ष्य मेन देखा जाए तो समर्थ के ये विचार विस्मित करनेवाले हैं। उन्होने 'अर्चन भक्ति' के माध्यम से जो पाठ पढ़ाए हैं, वे वास्तव  में  infrastructure Management (मंदिर परिसर और वास्तुकला विकास)  Hospitality & Supply Chain (भक्तों की सुविधाएं,धर्मशाला और अन्न क्षेत्रों का नियोजन) Crisis  Management ( संकट के समय सुरंगों और खजाने की सुरक्षा) और Human Resource & Leadership Development (महंत के लक्षण और कार्यकर्ताओं का सशक्तिकरण) का उत्कृष्ट मार्गदर्शन करते हैं।