दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, यदि शांति के कुछ वर्षों को छोड़ दें, तो अमेरिका किसी न किसी देश पर हमला करता ही रहा है। इन युद्धों में अमेरिका खरबों डॉलर खर्च करता है, फिर भी वह दिवालिया होने के बजाय उसकी अर्थव्यवस्था और अधिक मज़बूत हो जाती है। वर्तमान युद्ध भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए ही छेड़ा गया प्रतीत होता है।
इस दौरान अमेरिका ने अपने तेल के कुएँ पूरी क्षमता से खोल दिए और हर दिन लगभग 50 लाख बैरल तेल निर्यात किया। 25 फ़रवरी की कीमतों के मुकाबले, अमेरिका ने इस लहर पर सवार होकर लगभग $24.5 बिलियन (करीब ₹2.05 लाख करोड़) की कमाई की। यदि कीमतें युद्ध से पहले के स्तर पर रहतीं, तो यह कमाई $7.4 बिलियन कम होती। यानी इस अस्थिरता ने अमेरिकी तेल कंपनियों को भारी 'विंडफॉल प्रॉफिट' दिलाया।
सबसे ज्यादा फायदा अमेरिकी रक्षा उद्योग को होता है। हमें पता है कि हर हथियार की एक 'एक्सपायरी डेट' होती है। मिसाइलें, बम और रासायनिक गोले किसी दवा की तरह होते हैं जिनकी एक 'शेल्फ लाइफ' होती है। एक समय के बाद उनके विस्फोटक (Propellants) और सेंसर्स खराब होने लगते हैं। एक पुरानी मिसाइल को सुरक्षित रूप से निष्क्रिय (Dismantle) करने में उसके निर्माण मूल्य का 30% से 50% तक खर्च हो सकता है। ऐसे में उन्हें युद्ध में इस्तेमाल कर लेना आर्थिक रूप से कहीं अधिक किफायती होता है।
जब युद्ध में अमेरिकी हथियारों की श्रेष्ठता सिद्ध होती है, तो लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन जैसी कंपनियों को अरबों डॉलर के नए ऑर्डर मिलते हैं। भारत जैसे बड़े खरीदारों का भरोसा भी उन पर बढ़ता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका से MQ-9B प्रेडिटर ड्रोन, MH-60R सीहॉक, अपाचे, चिनूक, P-8I निगरानी विमान और GE-F414 जेट इंजन जैसे घातक हथियारों के सौदे किए हैं। भारत अब तक अमेरिका को लगभग 1.85 लाख करोड़ रुपये ($22 बिलियन) से अधिक के रक्षा ऑर्डर दे चुका है। यह निवेश न केवल भारतीय सेना को आधुनिक बनाता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी हथियारों की 'ब्रांड वैल्यू' पर मुहर भी लगाता है।
(नोट: इस लेख के शोध और
आंकड़ों के विश्लेषण में AI की सहायता ली गई
है।)


