भारत दुनिया के सबसे युवा लोकतांत्रिक राष्ट्रों में से एक है। हमारे देश का भविष्य विद्यार्थियों और युवाओं के हाथ में है। आज सोशल मीडिया के युग में अनेक संगठन, नेता और आंदोलन युवाओं को अपने विचारों से जोड़ने का प्रयास करते हैं। ऐसे समय में प्रत्येक विद्यार्थी को भावनाओं के बजाय विवेक, अध्ययन और दूरदृष्टि के आधार पर निर्णय लेना आवश्यक है।
दिल्ली में आंदोलन करने की जगह जंतर-मंतर पर करोड़ों अनुयायियों वाली "कोक्रोच" संगठन का आंदोलन हुआ। भारतीय और वैश्विक मीडिया का ध्यान उस आंदोलन पर था। लेकिन वह आंदोलन पूरी तरह असफल रहा। युवा पीढ़ी आंदोलन से दूर ही रही। इसका कारण क्या था? सबसे पहले यह समझना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति केवल नारों, आंदोलनों या सोशल मीडिया प्रचार से नहीं होती। राष्ट्रनिर्माण के लिए शिक्षा, चरित्र, कौशल, संगठन शक्ति और समाजसेवा की आवश्यकता होती है। इतिहास गवाह है कि समाज में स्थायी परिवर्तन लाने वाले व्यक्तियों और संगठनों ने वर्षों तक अध्ययन, तपस्या और जनसेवा की थी।
भारतीय लोकतंत्र पर युवाओं का विश्वास हमेशा दृढ़ रहा है। इसका उदाहरण है कि विभिन्न समयों में शिक्षित युवाओं ने लोकतांत्रिक मार्ग से सत्ता परिवर्तन किया है। असम के छात्र आंदोलनों से नेतृत्व उभरा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से सत्ता प्राप्त हुई। अरविंद केजरीवाल ने नया राजनीतिक दल स्थापित कर लोकतांत्रिक मार्ग से सत्ता हासिल की। दक्षिण भारत में अभिनेता विजय ने भी राजनीति में प्रवेश कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर विश्वास व्यक्त किया। इससे स्पष्ट होता है कि भारत के युवा परिवर्तन के लिए मतपेटी और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही सबसे प्रभावी साधन मानते हैं।
युवाओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक जनाधार दो अलग बातें हैं। लाखों फॉलोअर्स होना और हजारों समर्पित कार्यकर्ता होना—इनमें बड़ा अंतर है। किसी संगठन की असली ताकत उसकी सेवा गतिविधियों, संगठन शक्ति और समाज से जीवंत संबंधों में होती है। जो संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामविकास, आपदा निवारण और समाजसेवा के लिए निरंतर कार्य करता है, उसी को स्थायी जनसमर्थन प्राप्त होता है। सोशल मीडिया से अनुयायी मिलते हैं, लेकिन वास्तविक जनसमर्थन नहीं मिलता—यह हमने हाल ही में अनुभव किया है। इससे एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है: केवल प्रचार पर्याप्त नहीं होता। समाज का विश्वास जीतने के लिए निरंतर सेवा, संपर्क और संगठन निर्माण आवश्यक है। उदाहरण के लिए, सौ वर्ष का सफर पूरा करने के बाद भी आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) एक सामाजिक संगठन के रूप में जनता में लोकप्रिय और प्रभावी है।
विद्यार्थियों और युवाओं को आंदोलनों में भाग लेते समय विवेकपूर्ण निर्णय लेना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण और कानूनी आंदोलन नागरिकों का अधिकार है। लेकिन यदि किसी आंदोलन में अराजक तत्व घुस जाएं और हिंसा या तोड़फोड़ हो, तो उसके परिणाम निर्दोष युवाओं को भी भुगतने पड़ सकते हैं। न्यायिक प्रक्रिया वर्षों तक चल सकती है। ऐसे विवादों से विद्यार्थियों की शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार अवसरों पर असर पड़ सकता है। आज के प्रतिस्पर्धी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी हर क्रिया के दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए।
इसका अर्थ यह नहीं कि युवाओं को समाज और राष्ट्र के प्रश्नों से दूर रहना चाहिए। बल्कि उन्हें पहले स्वयं को सक्षम बनाना चाहिए। ज्ञान, कौशल, चरित्र और आर्थिक स्वावलंबन प्राप्त करने के बाद समाज के लिए किया गया कार्य अधिक प्रभावी होता है। इतिहास के अनेक महान नेताओं ने पहले शिक्षा पूरी की, स्वयं को गढ़ा और उसके बाद समाजकार्य में प्रवेश किया। महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। उसके बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। उन्होंने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की व्यापक दृष्टि भी दी।
सामाजिक सुधार के क्षेत्र में स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन अत्यंत प्रेरणादायी है। उन्होंने अपने गुरु विरजानंद से वेद, उपनिषद और धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उसके बाद पूरे भारत का भ्रमण कर समाज की समस्याओं को समझा। अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र, जादूटोना, खर्चीले कर्मकांड और विभिन्न सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने जागृति की। उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। आगे चलकर शिक्षा के प्रसार के लिए डी.ए.वी. संस्थाओं जैसी शैक्षणिक परंपराओं को प्रेरणा मिली। यह उदाहरण बताता है कि स्थायी सामाजिक परिवर्तन के लिए गहन अध्ययन, चिंतन और संगठन निर्माण आवश्यक है।
आज का विद्यार्थी यदि वास्तव में समाज परिवर्तन लाना चाहता है, तो उसे तीन बातें करनी चाहिए। प्रथम-अपने शिक्षा और कौशल विकास पर पूरा ध्यान केंद्रित करना। द्वितीय- किसी वास्तविक समाजसेवा कार्य से जुड़ना, जैसे जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाना, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान या कौशल प्रशिक्षण। तृतीय- लोकतांत्रिक प्रक्रिया का ज्ञान लेकर सजग और जिम्मेदार नागरिक बनना।
लोकतंत्र में सरकार बदलने का सबसे प्रभावी और स्थायी साधन है चुनाव। यदि किसी व्यक्ति या समूह को लगता है कि सरकार की नीतियों में त्रुटियाँ हैं, तो उन्हें लोगों को अपने विचारों से जोड़ना चाहिए, संगठन खड़ा करना चाहिए और लोकतांत्रिक मार्ग से जनसमर्थन प्राप्त करना चाहिए। यही मार्ग संविधानसम्मत है और दीर्घकालीन सफलता दिलाने वाला है।
अंत में विद्यार्थियों को एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि क्षणिक भावनाओं की तुलना में दीर्घकालीन निर्माण अधिक महत्वपूर्ण होता है। नारे लगाने से अधिक ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि से अधिक चरित्र निर्माण महत्वपूर्ण है। और केवल विरोध करने से अधिक समाज और राष्ट्र को आगे ले जाने वाला सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करना आवश्यक है।"


