हमारे सनातन धर्म में मंदिर केवल देवदर्शन और पूजा-पाठ तक सीमित स्थान नहीं है, बल्कि वह पूरे समाज को एक सूत्र में बांधने वाला और स्थानीय
अर्थव्यवस्था को गतिमान करने वाला मुख्य केंद्र है। मंदिरों में आयोजित होने वाले
देवताओं के बहुदिवसीय उत्सव, मेले, भागवत
सप्ताह, प्रवचन और कीर्तनों के माध्यम से न केवल आध्यात्मिक
चेतना जाग्रत होती है, बल्कि लोककला और व्यापार का एक विशाल
मंच भी तैयार होता है। इन मेलों में समाज के प्रत्येक वर्ग और कलाकार को अपना
अधिकारिक स्थान मिलता है। नट, बहुरूपिया, जादूगर, दशावतारी व गोंधली कलाकार और लोकनृत्य
प्रस्तुत करने वाली नर्तकियां अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं; जिससे हमारी पारंपरिक लोक कलाओं का संरक्षण होता है।
इसके साथ ही, बच्चों के
खिलौने बेचने वाले, सुगंधित द्रव्य, घरेलू
उपयोग की वस्तुएं और विभिन्न सामग्रियों के स्टॉल लगाने वाले छोटे व्यापारियों,
साथ ही ज्ञान का प्रसार करने वाले पुस्तक विक्रेताओं को इस अवसर पर
एक बड़ा बाजार मिलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मंदिर परिसर में लगने वाले
इन मेलों के कारण उस क्षेत्र के किसानों, कुम्हारों, बुनकरों और हस्तशिल्प कारीगरों के उत्पादों को सीधे ग्राहक मिल जाते हैं,
जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy) को
बहुत बड़ा संबल मिलता है। उत्सव के समय दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की सेवा
के लिए आयोजित किए जाने वाले निःशुल्क चिकित्सा (मेडिकल) शिविर और अन्नक्षेत्र
(भंडारे) मंदिर की सामाजिक जिम्मेदारी के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। संक्षेप में कहें
तो, हमारे मंदिर केवल उपासना के स्थल नहीं हैं, बल्कि वे कला, संस्कृति, व्यापार,
स्वास्थ्य और समाज कल्याण का समन्वय करने वाली एक आदर्श, आत्मनिर्भर व्यवस्था हैं।
संत समर्थ रामदास स्वामी केवल पारमार्थिक संत नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी समाज-संगठक और कुशल प्रबंधक भी थे।
उन्होंने शिवकाल में महाराष्ट्र में जिन मंदिरों की स्थापना की, वे केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं थे, बल्कि संकट
के समय समाज को अनाज, आश्रय और संबल देने वाले प्रमुख केंद्र
थे। समर्थ ने महाराष्ट्र के कोने-कोने में 1100 से अधिक मठों
और मारुति (हनुमान) मंदिरों की स्थापना की। एक केंद्रीय मुख्य पीठ (चाफल) से इन
सभी मठों के नेटवर्क और वहां काम करने वाले सैकड़ों युवा 'रामदासी'
कार्यकर्ताओं को संभालना, उत्कृष्ट नेटवर्क
मैनेजमेंट (Network Management) और नेतृत्व का एक बेहतरीन
उदाहरण है। ऐसा करते समय मठ और मंदिर का निर्माण कैसे होना चाहिए, वहां की व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, इसका विस्तृत
वर्णन श्री सार्थ दासबोध के 'अर्चन भक्ति' और अन्य समासों (अध्यायों) में किया गया है।
१. मंदिर का परिसर वैभवपूर्ण हो
समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं कि पुराने हो चुके देवालयों और मंदिरों का
जीर्णोद्धार करना चाहिए और उसके लिए आवश्यक कार्य तत्परता से पूरा करना चाहिए।
हाथी, रथ, घोड़े, सिंहासन, चौरंग, पालकियां,
सुखदायक वाहन, मंचक (पलंग), विमान आदि सभी साधनों का नवीनीकरण करके उन्हें सुसज्जित रखना चाहिए।
मेघडंबरी (छतरीनुमा ढांचा), छत्र, चामर,
अब्दागिरियां (शाही छतरियां), निशान (ध्वज)
जैसी वस्तुओं को सावधानीपूर्वक संभालना चाहिए। भगवान के विभिन्न प्रकार के वाहनों,
बैठने के उत्तम स्थानों और अनेक प्रकार के सुवर्ण आसनों आदि को
यत्नपूर्वक सुरक्षित रखना चाहिए। भवन, कक्ष, पेटियां, पिटारे, रांझण
(मिट्टी के बड़े बर्तन), हौद, गागर
जैसी मूल्यवान और उपयोगी वस्तुओं को अत्यंत प्रयास से संचित करना चाहिए।
संकट के समय काम आने वाले अनेक तहखानों, गुप्त सुरंगों और उन्हें जोड़ने वाले गुप्त रास्तों, विभिन्न स्थानों को जोड़ने वाले गुप्त द्वारों और अत्यंत बहुमूल्य वस्तुओं
के भंडारों (खजाने) का योजनाबद्ध तरीके से निर्माण और संरक्षण करना चाहिए। उत्तम
स्थान का चयन कर भव्य मंदिर का निर्माण करना चाहिए। वहां अनेक देवकुल (छोटे मंदिर),
शिखर, बड़े प्रांगण, मंडप,
धर्मशालाएं, कुएं, सरोवर,
मठ आदि का निर्माण कराया जाना चाहिए। मंदिर के परिसर में सुंदर उपवन
और सुगंधित फूलों के बगीचे (पुष्पवाटिका) होने चाहिए; जहां
ऋषि-मुनि और तपस्वी शांत वातावरण में तपस्या कर सकें। तोता, मैना,
मोर और कोयल जैसे पक्षी अपनी मधुर आवाज से उस परिसर को जीवंत
रखेंगे। इस नैसर्गिक और पवित्र परिसर में ईश्वर की सेवा और वैभव के लिए गाय,
भैंस, घोड़े, हाथी,
साथ ही तालाब में तैरने वाले बत्तख जैसे पशु-पक्षी मंदिर को अर्पित
किए जाने चाहिए।
२. भक्तों की व्यवस्था
तडाग कूप आणि सरोवर। निर्मळोदके भरले दिसावे।
धर्मशाळा आणि अन्नछत्र। जेथे विसावे साधूपात्र॥
मंदिर में होने वाले उत्सवों और मेलों में भाग लेने के लिए दूर-दूर से आने
वाले श्रद्धालुओं और साधु-संतों की सुविधा का ध्यान रखना मंदिर का प्रमुख कर्तव्य
है। उस काल में लोग पैदल चलकर देवदर्शन के लिए आते थे। कई बार उनके पास पर्याप्त
धन या खाने-पीने की सामग्री नहीं होती थी। समर्थ ने इसके लिए निर्देश दिया है कि
मंदिर का निर्माण करते समय परिसर में स्वच्छ पानी, आवास और भोजन की सुदृढ़ व्यवस्था होनी चाहिए। भक्तों के स्नान और पीने के
पानी के लिए मंदिर परिसर में तालाब (तडाग), कुआं (कूप) या
सरोवर होना चाहिए, जो हमेशा निर्मल जल से भरा रहे। साथ ही
यात्रियों के ठहरने के लिए 'धर्मशाला' और
भूखों के लिए निरंतर 'अन्नक्षेत्र' (भंडारा)
चलाया जाना चाहिए, ताकि वहां आने वाले साधु-संतों और
निर्धनों को सम्मानजनक आश्रय मिल सके।
३. अन्नभंडार (धान्यकोठी) और सामग्री प्रबंधन
मंदिर के गोदामों में हमेशा प्रचुर मात्रा में अनाज भरा होना चाहिए और सभी
प्रकार की सामग्री पहले से ही तैयार रखनी चाहिए। आवश्यकता के समय, उत्सव के अवसरों पर या अकाल जैसी आपातकालीन स्थितियों में उस
सामग्री का उपयोग अत्यंत आदर, सुनियोजित पद्धति और चतुराई से
लोगों की सेवा के लिए किया जाना चाहिए।
४. संकटकालीन प्रबंधन (Crisis Management) एवं सुरक्षा
शिवकाल में विदेशी आक्रमणों और अकाल, दोनों ही संकटों का लगातार सामना करना पड़ता था। ऐसे समय में मंदिरों में
तहखाने और अन्न भंडार तैयार रखना समर्थ का एक ऐसा विचार था जिसे आज के समय में 'Risk
& Crisis Management' कहा जाता है।
भुयेरीं तळघरें आणी विवरें । नाना स्थळें गुप्त द्वारें ।
अनर्घ्ये वस्तूंचीं भांडारें । येत्नें करीत जावीं ॥
समर्थ कहते हैं कि मंदिर में गुप्त सुरंगें, तहखाने, विवर (गुफाएं) जैसे कई गुप्त स्थान और
उन्हें जोड़ने वाले गुप्त रास्ते बनाने चाहिए। साथ ही अमूल्य वस्तुओं को सुरक्षित
रखने के लिए गुप्त भंडार (तिजोरियां) यत्नपूर्वक बनाने चाहिए। भारत के इतिहास में
मंदिरों पर बार-बार विदेशी आक्रमण हुए। लुटेरे शासकों ने मंदिरों का सोना, मूर्तियां और बहुमूल्य संपत्ति लूटने का प्रयास किया। ऐसे संकट के समय
गुप्त सुरंगों और तहखानों के कारण भगवान की मूर्ति और खजाना शत्रुओं की नजरों से
सुरक्षित रहता था। गुप्त द्वारों की वजह से पुजारी और श्रद्धालु संकट के समय
सुरक्षित बाहर निकल सकते थे। इन भंडारों में संचित धन आगे चलकर मंदिर के
पुनर्निर्माण, धर्मकार्य और जरूरतमंद भक्तों की सहायता के
लिए उपयोगी साबित होता था। संक्षेप में, संकट के समय मंदिर
का अस्तित्व, देवता की प्रतिष्ठा और सदियों से एकत्रित
संपत्ति की रक्षा इस गुप्त व्यवस्था के कारण ही संभव हो पाती थी। समर्थ ने यह बात
केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक दृष्टिकोण से
कही है।
५. आदर्श मंदिर प्रबंधक: समर्थ के 'महंत लक्षण' में प्रबंधकीय दृष्टि
समर्थ रामदास स्वामी के अनुसार, मंदिर की विशाल व्यवस्था संभालने वाला 'महंत'
या प्रबंधक (Manager) अत्यंत कार्यक्षम,
चतुर और उत्तम जनसंपर्क वाला होना चाहिए। समर्थ ने 'महंत लक्षण' बताते हुए स्पष्ट किया है कि प्रबंधक को
केवल एकांत में नहीं बैठना चाहिए, बल्कि उसे 'लोगों में घुलना-मिलना' चाहिए (लोकसंग्रह करना
चाहिए), परंतु अपने अंतःकरण को ईश्वर से जोड़कर रखना चाहिए।
एक आदर्श प्रबंधक में असीम सहनशीलता और 'सावधानता' होनी चाहिए, ताकि
मंदिर के गोदाम के अनाज, हिसाब-किताब और सुरक्षा में कोई कमी
न रहे। 'पहले किया, फिर बताया'
(आधी केले मग सांगितले) की उक्ति के अनुसार महंत को स्वयं परिश्रम
करके दूसरों के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। उसे किसी का भी मन दुखाए बिना,
सबको साथ लेकर मंदिर के उत्सव, अन्नक्षेत्र और
सामाजिक कार्यों को सफलतापूर्वक संपन्न कराना चाहिए। प्रबंधक के पास 'राजकारण' (अर्थात व्यावहारिक चतुराई और कूटनीति)
होना चाहिए, जिससे वह बाहरी संकटों से मंदिर की रक्षा कर सके
और आंतरिक व्यवस्था में अनुशासन बनाए रख सके। संक्षेप में, समर्थ
का महंत आज के समय के एक सक्षम 'CEO' की तरह है, जिसके पास आध्यात्मिक नैतिकता का आधार और व्यावहारिक प्रशासन (Administration)
का बेजोड़ कौशल है। समर्थ कहते हैं:
महंतें महंत करावें। युक्तीबुद्धीनें भरावें।
कळावंत करूनि सोडावें। बहुतां janaं॥
महंत को केवल स्वयं ही काम नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने अधीन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भी अपने जैसा ही कार्यकुशल
और कलावंत (दक्ष) बनाना चाहिए, ताकि मंदिर की व्यवस्था
निरंतर और सुचारू रूप से चलती रहे। इसी को आज की कॉर्पोरेट भाषा में 'Succession
Planning' (उत्तराधिकार नियोजन) या 'Team Empowerment' (टीम सशक्तिकरण) कहा जाता है।
६. भगवान की पूजा-अर्चना
पंचामृतें गंधाक्षतें | पुष्पें
परिमळद्रव्यें बहुतें |
धूपदीप असंख्यातें | नीरांजनें
कर्पुराचीं ||
समर्थ कहते हैं कि अनेक प्रकार की उत्तम सामग्रियों से परमेश्वर की पूजा करनी
चाहिए। पंचामृत, गंध-अक्षत, पुष्प, प्रचुर सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, कई प्रकार की आरतियां, कपूर और नीरांजन; साथ ही स्वादिष्ट नैवेद्य, विभिन्न प्रकार के फल, तांबूल (पान), दक्षिणा, अनेक आभूषण, उत्तम
वस्त्र, वनमाला, पालकियां, छत्र, आरामदायक सुखासन, मेघडंबरी,
अब्दागिरियां, दिंडियां, पताका, ध्वज और ताल-मृदंग की गूंज से भगवान का वैभव
बढ़ाना चाहिए।
परंतु, यदि परिस्थितियां प्रतिकूल
हों और बाहरी संसाधनों की कमी हो, तो समर्थ ने इसका भी मार्ग
सुझाया है। अनुकूल परिस्थिति न होने पर अपने अंतर्मन में, मानसिक
रूप से षोडशोपचार पद्धति से भगवान की पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार की जाने वाली
पूजा को 'मानसपूजा' कहा जाता है। जो-जो
भव्य-दिव्य आभूषण और वैभव हम प्रत्यक्ष रूप से अर्पित नहीं कर सकते, उन्हें कल्पना के माध्यम से निर्मित कर मन में स्थित परमात्मा को अत्यंत
श्रद्धापूर्वक अर्पित करना चाहिए।
सारांश
समर्थ रामदास स्वामी ने दासबोध के माध्यम से जो मंदिर और मठ व्यवस्था प्रस्तुत
की है, वह केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं
है, बल्कि वह एक अत्यंत उन्नत, व्यावहारिक
और आदर्श सामाजिक-प्रशासनिक मॉडल (Administrative Model) है।
समर्थ के काल में मंदिरों को केवल भक्ति का केंद्र न रखकर, समाज
सुधार, आपातकालीन सहायता और लोककल्याण का मुख्य मंच बनाया
गया।
यदि आज की 21वी सदी के आधुनिक प्रबंधन शास्त्र (Modern Management) के परिप्रेक्ष्य मेन देखा जाए तो समर्थ के ये विचार विस्मित करनेवाले हैं। उन्होने 'अर्चन भक्ति' के माध्यम से जो पाठ पढ़ाए हैं, वे वास्तव में infrastructure Management (मंदिर परिसर और वास्तुकला विकास) Hospitality & Supply Chain (भक्तों की सुविधाएं,धर्मशाला और अन्न क्षेत्रों का नियोजन) Crisis Management ( संकट के समय सुरंगों और खजाने की सुरक्षा) और Human Resource & Leadership Development (महंत के लक्षण और कार्यकर्ताओं का सशक्तिकरण) का उत्कृष्ट मार्गदर्शन करते हैं।
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