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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

धुरंधर का गाना और पत्नी का डंडा

 


एक गायक था
, जो जिंदगी भर सिर्फ दर्द भरे गाने ही गाता था। टूटा दिल, बेवफाई, उदासी और रातों की तन्हाई-ये उसके गानों के हमेशा के टॉपिक थे।

उसकी शादी की 25वीं सालगिरह थी। सुबह से ही पत्नी ने साफ-साफ चेतावनी दे रखी थी, “आज खुशी का दिन है। कोई नकारात्मक या उदास गाना मत गाना। वरना देख लेना!”

शाम को पार्टी का माहौल बहुत खूबसूरत था। दोस्त-रिश्तेदार आए हुए थे। रंग-बिरंगी लाइट्स, हंसी-ठिठोली, स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू और मस्ती छाई हुई थी।

रिश्तेदारों ने गायक से गाने की फरमाइश कर दी। उसने खुशनुमा गाने शुरू कर दिए। लोग तालियाँ बजाने लगे और बोले, “वाह! इस उम्र में भी आवाज में वैसा ही जादू है!”

तभी किसी ने मशहूर धुरंधर वाला गाना गाने को कहा:ना तो कारवां की तलाश है, ना हमसफर की तलाश है…

पत्नी की चेतावनी याद आते ही गायक ने तुरंत बोल बदल दिए। “ना” की जगह “हाँ” डालकर उसने जोर-जोर से गा दिया:

हाँ आज कारवां की तलाश है… हाँ आज नए हमसफर की तलाश है…”
सुनते ही पूरा हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठा। एक रिश्तेदार जोर से चिल्लाया, “अरे वाह! इस उम्र में भी नया हमसफर चाहिए! कमाल है भाई!”

यह बात पत्नी के कानों तक पहुँचते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया।


अगले दिन गायक अस्पताल के बेड पर लेटा हुआ था। चेहरे पर पट्टियाँ, हाथ-पैर में दर्द। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या।
उसने तो पत्नी की सलाह मानी थी
, फिर भी भाइयों के साथ मिलकर पत्नी ने उसकी इतनी बुरी कुटाई क्यों कर दी?

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

चिन्या की दिवाली और फटाकों का आनंद

 
सड़क के एक तरफ बड़े-बड़े बंगले थे और दूसरी तरफ झुग्गी बस्ती। यह किसी भी बड़े शहर का आम दृश्य था। दस साल का चिन्या ऐसी ही एक झुग्गी में रहता था। बाकी बच्चों की तरह उसे भी दिवाली पर अनार, चरखी, रॉकेट जैसे फटाके चलाने की इच्छा थी।

उसके पापा ने उसे एक छोटा सा पिस्तौल दिलाया था। दिनभर टिकली चलाकर वह ऊब गया था। शाम को जब उसने आसमान में उड़ते रॉकेट देखे, तो उसे महसूस हुआ कि उसके पापा अनार जैसे फटाके नहीं ला सकते। "हम गरीब हैं," यह सोच उसे दुखी करने लगी।
 
"चिन्या, अंदर क्यों बैठा है? बाहर ! सामने वाला कोठी वाला बड़ा अनार चलाने वाला है!" पापा की आवाज सुनकर चिन्या बाहर आया। सामने एक आदमी ने अनार चलाया। रंग-बिरंगा फव्वारा आसमान में चमका।
 
"क्या मजा आया ना!" पापा ने पूछा।
 
"कैसा मजा? मैंने थोड़ी अनार चलाया है," चिन्या बोला।
 
"देख सामने के बच्चे कैसे ताली बजा रहे हैं, कूद रहे हैं। उन्होंने भी अनार नहीं चलाया," पापा ने समझाया।
 
"नहीं चलाया, लेकिन उनके नौकर ने तो चलाया!" चिन्या बोला।
 
"अगर ऐसा होता तो सिर्फ नौकर को खुशी मिलती, बच्चों को नहीं," पापा ने कहा।
चिन्या चुप रहा।
 
"देख चिन्या, बड़े लोग, राजा-महाराजा, सेठखुद कुछ नहीं करते। उनके नौकर उनके लिए काम करते हैं। सोचो कि ये नौकर तुम्हारे लिए अनार चला रहा है। देखो कितना मजा आएगा!" पापा ने कहा।
 
"मतलब वो हमारा नौकर है, ऐसा मानू?" चिन्या ने पूछा।
 
 बस तभी चिन्या ने देखा, “पापा! वो नौकर फिर से एक अनार फोड़ने वाला है!” वह उत्साह से चिल्लाया। नौकर की ओर देखते हुए चिन्या बोला, “अरे भैया! हमारे लिए भी एक अनार फोड़ दो!”
 
नौकर ने सड़क के पार झोपड़ी के सामने खड़े छोटे चिन्या को देखा। उसे अपने गांव में छोड़े बेटे की याद गईवही उत्सुक चेहरा, वही चमकती आँखें। नौकर ने एक बड़ा, मोटा अनार उठाया, चिन्या को दिखाया और उसे जलाया। और लो! लाल, नीले और सुनहरे रंग की चिंगारियाँ आसमान में नाच उठीं। लाल, नीले और सफेद रंग की चमकती चिंगारियाँ आसमान को रोशन कर गईं।

चिन्या ने तालियाँ बजाईं और खुशी से उछल पड़ा। सड़क पार से नौकर को एक हँसता हुआ चेहरा मिला। नौकर ने भी मुस्कराहट लौटाईएक मजबूर पिता की उदास मुस्कान।

उस मुस्कान को देखकर चिन्या के पिता की आँखें भर आईं। बेबस पिताओं के आँसू।

नौकर की तरफ देखकर चिन्या चिल्लाया, " नौकर! हमारे लिए अनार चलाओ!"

लाल, नीले, सफेद रंग की सप्तरंगी रोशनी आसमान में फैल गई। चिन्या ने ताली बजाई, कूदने लगा। उसके चेहरे पर मुस्कान थी।
 
वह मुस्कान देखकर पापा की आंखों में आंसू
गए।

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

सर्पदंश: दो कथाएँ और परिणाम

 

पहली कथा: कठोर निर्णय


एक ज़हरीला साँप राज्य में कई लोगों की जान ले चुका है। सैनिक उसे पकड़कर दरबार में लाते हैं। सैनिक बोले: “महाराज, यह साँप कई नागरिकों की मृत्यु का कारण है। कृपया आदेश दें, इसका क्या किया जाए?”

राजा ने आदेश दिया इसमें “सोचने की क्या ज़रूरत?  कुचल दो इस जहरीले साँप को।” सैनिकों ने तुरंत साँप को मार डाला।


दूसरी कथा: विचारों का संघर्ष

फिर वही साँप, वही अपराध। लेकिन इस बार राजा तुरंत निर्णय नहीं लेते। वे मंत्रियों से सलाह लेते हैं। 


पहला मंत्री:

“महाराज, यह साँप ज़हरीला है। इसे जीवित रखना खतरे को न्योता देना है। इसे मार देना ही उचित है।”

दूसरा मंत्री:

“महाराज, साँप का स्वभाव ही ज़हरीला है। वह काटता है, यह उसकी प्रकृति है। हम सभ्य लोग हैं। बिना सोच-विचार किसी की जान लेना अन्याय है।” राजा सोच में पड़ जाते हैं और नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों की समिति से सलाह लेते हैं। समिति में बुद्धिमान, कला-प्रेमी और प्रगतिशील लोग होते हैं।

समिति का सुझाव:

“राजा, साँप दोषी नहीं है। उसने अपने स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार किया। उसे सज़ा देना उसके अस्तित्व को नकारना है। उसे सोने के पिंजरे में रखा जाए और हर नागपंचमी पर दूध का प्रसाद दिया जाए।” राजा समिति की बात मान लेते हैं। साँप को सोने के पिंजरे में रखा जाता है। हर साल नागपंचमी पर उसे दूध का प्रसाद चढ़ाया जाने लगा।  

एक दिन, नागपंचमी के अवसर पर साँप राजा को काट लेता है। राजा की मृत्यु हो जाती है।

अब प्रश्न उठता है—राजा की मृत्यु का ज़िम्मेदार कौन? 

साँप? या वह समिति जिसने उसे आश्रय देने की सलाह दी? 

सने वाले शत्रु को राज्य में आश्रय देने का परिणाम राजा सहित समस्त प्रजा को भुगतना पड़ता है।

 

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

धर्मराज का न्याय: चोरी सोने के सिक्के की

 

भोर की पहली किरण जब शरीर पर पड़ती है, तो मन प्रसन्न हो जाता है। सुबह की कोमल धूप मन को भाती है। जैसे सोने का रंग प्रिय होता है, वैसे ही सोना भी इंसान को प्रिय होता है। सोने की कृपा से भौतिक इच्छाएँ पूरी होती हैं—कपड़े, टीवी, गाड़ी, बंगला। और अगर अधिक सोना हो, तो उस बंगले में पत्नी के रूप में विश्व सुंदरी भी मिल सकती है।

एक बार एक अज्ञानी व्यक्ति को रास्ते में सोने का सिक्का पड़ा मिला। उसने बिना सोचे-समझे उसे उठाकर जेब में रख लिया। कुछ देर बाद दूसरे व्यक्ति को भी वही सिक्का दिखा। उसने इधर-उधर देखा, कोई नहीं था, तो उसने भी सिक्का उठाकर जेब में रख लिया। फिर एक शिक्षित विचारक आया। उसने सिक्का देखा और सोचने लगा- यह किसका हो सकता है? क्या इसे उठाना उचित होगा? मन में द्वंद्व चला- क्या यह चोरी होगी या ईश्वर की कृपा?  बहुत विचार करने के बाद, विचारवंत व्यक्ति ने निर्णय लिया—ईश्वर की कृपा हुई है, भगवान का कृपाप्रसाद मानकर यह सिक्का उठाना बिल्कुल उचित है। उसने सिक्का उठाकर अपनी जेब में रख लिया 

संयोगवश तीनों की मृत्यु एक ही दिन हुई। यमदूत उन्हें धर्मराज के सामने ले गए। पहले को एक वर्ष नरकवास मिला क्योंकि उसने मेहनत के बिना धन पाया था।  दूसरे को पाँच वर्ष की सजा मिली क्योंकि उसने चोरी की नियत से सिक्का उठाया।  

धर्मराज ने विचारवंत को सौ वर्ष नरकवास की सजा सुनाई। वह बोला, "मैंने तो उसे भगवान का कृपाप्रसाद समझकर लिया था। मैं निर्दोष हूँ। आप मनमानी सजा दे रहे हैं। मैं शिकायत करूँगा, उपवास पर बैठूँगा।"

धर्मराज क्रोधित हुए, "यह भारत देश नहीं है जहाँ कोई भी उपवास पर बैठ जाता है। यह धर्मराज का न्यायालय है। तुम शिक्षित हो, तुम्हें उचित-अनुचित का ज्ञान है। फिर भी तुमने चोरी की, और उस चोरी में भगवान को भी घसीट लिया। तुम्हारा अपराध बड़ा है। तुम्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। तुम्हारे अपराध के देखकर ही  तुम्हें सजा भी कठोर दी है।   

 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

गिरगिट और नेता: टोपी बदलने की कला


कभी जंगल में रहने वाले एक गिरगिट ने शहर जाकर लोगों को अपना रंग बदलने का कौशल दिखाकर वाहवाही पाने का विचार किया। वह पास के शहर गया। वहाँ उसने एक सरकारी बंगले में एक आदमी को देखा, जो सिर पर सफेद टोपी लगाए कुर्सी पर बैठा था।

गिरगिट उस आदमी के पास गया और बोला, “मैं जंगल में रहने वाला गिरगिट हूँ। मुझे रंग बदलने की कला आती है। मैं जिस पेड़ या फूल पर बैठता हूँ, उसी रंग में घुल-मिल जाता हूँ।”

गिरगिट ने आगे कहा, “मैं आपको अपनी कला दिखाता हूँ।”
वह हरे पत्तों पर बैठा—वह हरा हो गया।
वह लाल फूल पर बैठा—वह लाल हो गया।
इस तरह गिरगिट ने अलग-अलग रंग बदलकर अपनी कला उस आदमी को दिखाई।

गिरगिट ने पूछा, “क्या तुम मेरी तरह रंग बदल सकते हो?”
वह आदमी हँसते हुए बोला, “इसमें क्या खास है? मैं तो इसी कुर्सी पर बैठे-बैठे रंग बदल सकता हूँ। तुम बस मेरी टोपी की ओर देखो।”

गिरगिट ने उस आदमी की टोपी की ओर देखा।
क्षण भर में टोपी का रंग हरा हुआ, फिर लाल, फिर नीला और फिर भगवा। अंत में वह फिर से सफेद हो गया।

वह आदमी इतनी सहजता से रंग बदल रहा था कि गिरगिट चकित रह गया।
गिरगिट बोला, “आज तक मैंने किसी इंसान को रंग बदलते नहीं देखा। आप वास्तव में कौन हैं?”

वह आदमी शांत स्वर में बोला, “मैं हमेशा सत्ता की कुर्सी पर विराजमान रहता हूँ। इसलिए मैंने टोपी का रंग बदलने की कला आत्मसात कर ली है।”

उस आदमी के चरणों में प्रणाम करते हुए गिरगिट बोला, “गुरुदेव, क्या आप मुझे यह कला सिखाएंगे?

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

क्या गलती हुई?

 

रात को पुलिस ने वहाँ छापा मारा। प्रतिष्ठित स्कूलों में पढ़ने वाले, शिक्षित परिवारों के 15 से 18 वर्ष के किशोर नशे की हालत में पकड़े गए। उन्हें समझा-बुझाकर छोड़ दिया गया। उनमें सोनल भी थी।

घर पहुंचते ही सोनल की माँ  का स्वर गूंजा "ऐसे ही चलती रही तो समाज में मुँह दिखाने की जगह नहीं रहेगी!"

सोनल चीख पड़ी, "बस! तुम्हारे प्रवचन सुन-सुनकर कान पक गए हैं! मैंने किया क्या? थोड़ी व्हिस्की पी, दोस्तों के साथ मस्ती की—बस इतना ही!

घर में तो कॉकटेल पार्टी होती है, और तुम्हारे डांस के तौर-तरीके? उस दिन बैकलेस स्लीवलेस पहनकर, सबके सामने बास के गले में बाहें डालकर नाच रही थी... और उसका हाथ—"

चटाक! सोनल चीख उठी।

सोनल के पिता, स्तब्ध, माँ-बेटी को फूट-फूटकर रोते देख रहे थे।
सोचते रहे—क्या गलती हुई?

सोनल के माता-पिता ने जो आदर्श सिखाए, उन्हें खुद जी नहीं पाए। उनके निजी व्यवहार और सामाजिक नैतिकता में विरोधाभास था, जिससे बेटी भ्रमित हुई। जब आदर्श केवल शब्दों में रह जाते हैं, तो उनका मार्गदर्शन खो जाता है।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

हड़ताल और विश्वासघात

 

शर्माजी पिछले बीस वर्षों से एक औद्योगिक नगरी की एक फैक्टरी में सुपरवाइज़र के रूप में काम कर रहे थे। वे सीधे-सादे, ईमानदारी से काम करने वाले व्यक्ति थे। उनके बेटे ने हाल ही में इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की थी और नौकरी की तलाश में था।

एक दिन स्थानीय श्रमिक संघ के प्रभावशाली नेताजी फैक्टरी में आए। उन्होंने शर्माजी से कहा, “शर्माजी, कल हड़ताल है। आप हमारे साथ खड़े रहिए। मैं आपके बेटे को इसी फैक्टरी में नौकरी दिलवा दूंगा।” शर्माजी को मन में संदेह था, लेकिन बेटे के भविष्य के लिए उन्होंने साथ दे दिया।

अगले दिन फैक्टरी के गेट पर नारेबाज़ी शुरू हुई- “नेताजी ज़िंदाबाद! मालिक मुर्दाबाद!” पुलिस ने भीड़ पर धावा बोला। शर्माजी समेत कई मजदूरों को बस में भरकर दूर ले जाया गया। कुछ घंटों बाद सभी को छोड़ दिया गया।

लेकिन सुबह फैक्टरी के गेट पर गार्ड ने शर्माजी को एक लिफाफा दिया। उसमें लिखा था:

“शर्माजी, आपको फैक्टरी में तोड़फोड़ और दंगे के आरोप में नौकरी से बर्खास्त किया जाता है।”

शर्माजी स्तब्ध रह गए। वे नेताजी से मिलने गए, लेकिन नेताजी मिले नहीं। उल्टा नेताजी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि तोड़फोड़ करने वाले उनकी यूनियन के लोग नहीं थे। शर्माजी की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। अब न वेतन था, न पेंशन। कोर्ट-कचहरी, पुलिस स्टेशन, वकीलों के खर्च। बेटे की नौकरी तो दूर, अब घर चलाना भी मुश्किल हो गया। दूसरी ओर, कहीं और नौकरी मिलना भी कठिन हो गया था।

कुछ ही हफ्तों में फैक्टरी में ४० नए ठेकेदार मजदूर कम वेतन पर नियुक्त हो गए। नेताजी ने नई मर्सिडीज खरीद ली। लेकिन शर्माजी का जीवन बर्बाद हो गया।

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है। अकेले मुंबई में ही श्रमिक नेताओं की चालों में फँसकर हजारों शर्माजी बेरोजगार हो गए।

 

सोमवार, 8 दिसंबर 2025

मंदिर के मौन साक्षी

 

एक निर्जन जंगल में एक मंदिर था। वहाँ पूजा चल रही थी। मंदिर के गर्भगृह में एक पुजारी और दो व्यक्ति उपस्थित थे। पूजा के बाद पुजारी ने कहा, “यह जागृत देवता है। जो भी सच्चे मन से अपने अपराधों की क्षमा माँगता है, उसे देवता क्षमा करते हैं।”

पहले व्यक्ति ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, “भगवान, आप जानते हैं कि मैं अपना काम पूरी निष्ठा से करता हूँ। लेकिन जिस अस्पताल में मैं काम करता हूँ, वहाँ इस साल महामारी के दौरान मृत लोगों को कुछ दिन जीवनरक्षक प्रणाली पर रखकर पैसे कमाए गए। मैं इसका गवाह हूँ। सब कुछ अपनी आँखों से देखा, फिर भी चुप रहा। पेट पालना कठिन होता है। मैं मजबूर था। कृपया मुझे क्षमा करें।”

दूसरे व्यक्ति ने प्रार्थना की, “मेरे पिता महामारी से लड़ते हुए अस्पताल में मरे। वे सज्जन व्यक्ति थे। अगर उनसे अनजाने में कोई अपराध हुआ हो, तो उन्हें क्षमा करें। उन्हें अपने चरणों में स्थान दें।”

पुजारी ने कहा, “तथास्तु।” दोनों मंदिर से बाहर निकले।

पहला व्यक्ति दूसरे से पूछता है, “साहब, आपके पिता किस अस्पताल में स्वर्गवासी हुए?”

दूसरे ने अस्पताल का नाम बताया।

पहला व्यक्ति उसके चरणों में गिरकर बोला, “साहब, मैं उसी अस्पताल में नौकरी करता हूँ। आपसे क्षमा माँगता हूँ।”

दूसरे व्यक्ति के मन में क्रोध, द्वेष, घृणा—सब भावनाएँ उमड़ पड़ीं। उसने आँखें बंद कीं और खुद को सँभालने की कोशिश की। कुछ ही क्षणों में उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

पहले व्यक्ति ने पूछा, “साहब, आपकी आँखों में आँसू क्यों हैं?”

दूसरे व्यक्ति ने कहा, “मैं भी तुम्हारी तरह एक मौन साक्षी हूँ। मुझे भी सब पता था। मेरे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके प्रति प्रेम के कारण मैं भी मजबूर था।”

 

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

यक्षप्रिया का दारुण अंत

 

अलकानगरी कुबेर की समृद्ध राजधानी थी—सोने की सड़कें, रत्नों से जड़ी इमारतें। यहाँ सुंदरता ही मूल्य थी, और वैभव ही धर्म। लेकिन इस चमक के पीछे एक जहरीला सच छिपा था।

आषाढ़ का मेघ, वरुणराज के आदेश से, अलकानगरी की ओर बढ़ रहा था। उसके भीतर अमृत जैसा जल था, लेकिन प्रदूषण से वह अब ज़हर बन चुका था।

यक्षप्रिया, जो एक महल में रहती थी, अपने प्रेमी का संदेश पाने के लिए छत पर दौड़ी। उसे उसकी बातें याद आईं— “तू अंधेरे में भी बिजली जैसी चमकती है। तू तो साक्षात रंभा है। दीपक की क्या ज़रूरत?”

बारिश शुरू हुई, और वह पहली बार आषाढ़ की बारिश में भीगने लगी। लेकिन अचानक उसकी त्वचा जलने लगी। वह कमरे में भागी और दर्पण में देखा—तेजाबी पानी ने उसके चेहरे और शरीर को घायल कर दिया था। वह चीख उठी। क्या उसका प्रेमी अब भी उससे प्रेम करेगा? यक्षों के राज्य में सुंदरता ही स्त्री का गहना थी।

बारिश थमी, लेकिन ज़मीन पर पेड़ जल चुके थे, पक्षी मर चुके थे। मेघ ने नीचे देखा—एक स्त्री रक्त में लथपथ पड़ी थी। लोग कह रहे थे, “पति विदेश में है और इसे बारिश में भीगने का शौक था। क्या इसे चेतावनी नहीं मिली?” एक बोला, “अब जब सुंदरता नहीं रही, तो जीएगी कैसे?” दूसरा बोला, “हम सब इस ज़हरीले वातावरण में धीरे-धीरे मर रहे हैं। किसी को चिंता नहीं। राजा को इस त्रासदी का दोषी ठहराते हुए, भीड़ ने राजा कुबेर के खिलाफ नारेबाज़ी शुरू कर दी. 

मेघ को यक्ष की याद आई। वह रामगिरी पर संदेश की प्रतीक्षा कर रहा था। अब उसे क्या बताए? कुछ पल के लिए मेघ रुक गया। सोचा—पानी को समुद्र में खाली कर दूँ। लेकिन वरुणराज का आदेश याद आया—जो तय किया गया है, वही करना है। मेघ ने दो आँसू बहाए और आगे बढ़ गया।

 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

भारतीय युद्ध: गांधार की विजयी गर्जना

 

(मध्यरात्री का समय  शकुनि अपने शिविर के एक कोने में चतुरंग की पट पर नजर गड़ाए विचारों में डूबा था।तभी एक आवाज ने सन्नाटा तोड़ा और उसके विचारों की श्रृंखला टूट गई)।

शकुनि (चौंककर): "दीदी? तुम यहाँ? इस रात के समय? तुम्हारी आँखों में आँसू... कहीं वो अंधे राजा के पुत्रों के लिए तो नहीं?"

गांधारी (शांत लेकिन दृढ़ स्वर में): "शकुनि, गांधार छोड़ते समय जो व्रत हमने लिया था, वो आज भी मुझे याद है। कौरव भले ही मेरे गर्भ से जन्मे हों, पर वे साँप के बच्चे हैं। गांधार के शत्रु के पुत्र। मैं उनके लिए आँसू नहीं बहाऊंगी। आज रणभूमि में शल्य मारा गया। युद्ध का अंत निकट है। (सिसकते हुए) तुमसे अंतिम बार मिलने आई हूँ... शायद कल रणभूमि में..."

शकुनि (उसका वाक्य बीच में काटते हुए, कटु हँसी के साथ): "हा! हा! हा!
मतलब मैं कल मरने वाला हूँ, बस यही ना? युद्ध के पहले दिन से ही यह सत्य हम दोनों को पता था। अब रोने का क्या मतलब? भारतीय युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना नष्ट हो गई। तीन पीढ़ियाँ समाप्त हो गईं। हमारे गांधार का क्या नुकसान हुआ? गिनती के कुछ सैनिक, जिनमें हम भी शामिल हैं। इतिहास में कभी ऐसा हुआ है क्या?

अब कोई भीष्म की सेना गांधार में प्रवेश नहीं करेगी। कोई गांधारी अपने जीवन का बलिदान नहीं देगी। गांधार को अब भारत से डर नहीं है। मूर्ख भारतीय राजा सत्ता के लिए विदेशी ताल पर नाचते हैं—अब दुनिया को यह पता चल गया है। हस्तिनापुर में मूर्ख बुद्धिजीवियों की भरमार थी—इसलिए हमारा कार्य सफल हुआ। गांधारी, आँसू पोंछो। अब भविष्य की ओर देखो।

सप्तसिंधु क्षेत्र के मूर्ख हिंदू और बौद्ध राजा स्वार्थवश सिंधु नरेश दाहीर की मदद नहीं करेंगे। देखो, गांधार की अश्वसेना सप्तसिंधु को नष्ट करने के लिए तैयार है..."

(दोनों एक साथ गर्जना करते हैं) "गांधार की विजय हो!"

यह कथा भले ही पुरानी हो, पर भारत की गुलामी का सच्चा इतिहास इसमें छिपा  है। 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

चित्रगुप्त का न्याय: सेल्फी लेने वाला बंदर बन गया

 
उसकी मृत्यु हो गई। उसकी आत्मा एक प्रकाशमार्ग से होती हुई चित्रगुप्त के दरबार में पहुँची। उसके सामने एक विशाल न्यायासन था, जिस पर चित्रगुप्त विराजमान थे। वे श्वेत वस्त्रों में, तेजस्वी और शांत दिखाई दे रहे थे। उनके सामने असंख्य ग्रंथ रखे थे—जिनमें पृथ्वी पर मौजूद हर मनुष्य के पाप और पुण्य का लेखा-जोखा दर्ज था।

चित्रगुप्त ने पूछा, “तुम कहाँ जाना चाहते हो?”

आत्मा ने उत्तर दिया, “मेरे जीवन में कई गलतियाँ हुईं, लेकिन अंत में मैं भगवान के दर्शन के लिए गया। मैंने उनके चरणों में क्षमा माँगी। मेरे पाप मिट गए। मुझे स्वर्ग मिलना चाहिए।”

आत्मा चौंक गया। “ऐसा कैसे हो सकता है? मैं मंदिर गया था। मैंने फोटो लिए, सेल्फी ली, रील बनाई। सबूत है!”

चित्रगुप्त मुस्कराए। “हाँ, सबूत है। तुमने मंदिर के सिंहद्वार के सामने सेल्फी ली थी। परिसर की मूर्तियों के साथ फोटो हैं। धार्मिक विधियों के वीडियो भी हैं। यहाँ तक कि देवता के दर्शन करते हुए क्षमा माँगने की रील भी है। लेकिन…”

चित्रगुप्त थोड़ी देर रुके। “तुम्हारा ध्यान केवल कैमरे पर था। क्षमा माँगते समय तुम्हारा अंतःकरण मौन था। तुम्हारी आँखों में भक्ति नहीं थी, केवल फ्रेम था। तुम्हारे मन में पश्चाताप नहीं था, केवल पोस्ट करने की जल्दी थी। इसलिए तुम्हारे पाप मिटे नहीं।”

आत्मा चुप हो गया। उदास हो गया।

चित्रगुप्त बोले, “मैं तुम्हें नरक नहीं भेजूंगा। मैं तुम्हें पृथ्वी पर वापस भेजता हूँ—दिल्ली के चिड़ियाघर में, एक बंदर के रूप में।”

“बंदर?” आत्मा चौंक गया।

“हाँ! वहाँ तुम बंदरों जैसी शरारतें करोगे। लोग तुम्हारे साथ सेल्फी लेंगे, फोटो खींचेंगे, रील बनाएंगे। जैसे तुमने देवता के सामने किया था। लेकिन अब तुम उनकी फ्रेम में रहोगे। लोग तुम्हारे रूप में हास्य, करुणा और विडंबना देखेंगे। तुम्हें अपना पूर्व जन्म याद आएगा— ‘मैंने भी ऐसा किया था, और अब उसका परिणाम भुगत रहा हूँ।’ तब यदि तुम सच्चे अंतःकरण से अपने पापों की क्षमा माँगोगे, तो अगले जन्म में तुम्हें स्वर्ग मिलेगा।”

अब आत्मा शांत था। 

उसे समझ आ गया था—सबूत फोटो नहीं होते, भावनाएँ होती हैं।
 

 

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

"धूम्राक्ष: इच्छाओं का अदृश्य भस्मासुर"

 

मनुष्य ऋषि ने पत्थर रगड़कर अग्नि प्रज्वलित की। अग्नि को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना की “हे अग्नि, हमें सुख-समृद्धि दो, शत्रुओं पर विजय दिलाओ।” उसने उच्चारण किया: “अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये इदं न मम।”

तभी हवनकुंड से एक धुएँ जैसी, शरीरहीन आकृति प्रकट हुई। वह हाथ जोड़कर खड़ी थी। उसने कहा, “मैं धूम्राक्ष हूँ, अग्निपुत्र। धुआँ ही मेरा भोजन है। मनुष्य की इच्छाओं को पूरा करना ही मेरा धर्म है।”

ऋषि ने मधुमक्खियों के छत्ते का मध माँगा। धूम्राक्ष ने धुआँ फैलाया, मधुमक्खियाँ उड़ गईं। ऋषि को खाँसी आई, लेकिन मीठा मध मिल गया। धूम्राक्ष फिर आदेश की प्रतीक्षा में खड़ा रहा।

समय आगे बढ़ता है। अर्जुन धूम्राक्ष को खांडववन जलाने का आदेश देता है। धूम्राक्ष अग्नि की सहायता से वन के जीव-जंतु और वनस्पतियाँ निगलता है। वनवासी व्याकुल होकर जंगल से बाहर निकलते हैं और अर्जुन की शरण में आते हैं। वे दुनिया के पहले विस्थापित बनते हैं। खांडववन की राख पर इंद्रप्रस्थ बसता है। आज मुंबई, नोएडा जैसे सैकड़ों महानगर भी धूम्राक्ष की मदद से खड़े हुए हैं।

मनुष्य की हर इच्छा को पूरा करते-करते, धूम्राक्ष इतना बड़ा हो गया है कि आज उसकी धुएँ जैसी देह पूरी पृथ्वी को ढक चुकी है।

कल शाम मैं छत पर खड़ा था। धूम्राक्ष दिखाई दिया। मैंने कहा, “तेरे कारण मुझे अस्थमा हो गया है।”

वह शांत स्वर में बोला, “मालिक, मैं तो आपकी इच्छाओं से ही बड़ा हुआ हूँ। बिना धुएँ के गाड़ियाँ, इमारतें, एसी नहीं बन सकते। वातावरण में धुआँ तो फैलेगा, और उसका फल आपको ही भोगना पड़ेगा।”

मैं चुप हो गया। कमरे में गया। एसी चालू किया। लेकिन नींद नहीं आई।

अंत में एक विचार आया—यज्ञ में हम कहते हैं “इदं न मम” यानी “यह मेरा नहीं है”, लेकिन वास्तव में हर चीज़ अपने लिए ही माँगते हैं। इसी से धूम्राक्ष का जन्म होता है।

शायद, मनुष्य की असीम इच्छाओं को पूरा करते-करते, एक दिन धूम्राक्ष मनुष्य को ही निगल जाएगा।

 

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

किसान और शून्य का गणित

 हालाँकि शून्य का आविष्कार हमारे पूर्वजों ने किया था, लेकिन आज हम उसका असली अर्थ भूल चुके हैं। दुनिया का सारा तंत्र शून्य के गणित पर ही आधारित है।

तो शून्य का गणित क्या है?

अगर हम किसी से ₹100 का कर्ज लेते हैं, तो जब तक उसे चुकाते नहीं, हिसाब पूरा नहीं होता। 100 - 100 = 0 — जब तक उत्तर शून्य नहीं आता, तब तक गणित अधूरा रहता है। जिनका शून्य का गणित बिगड़ता है, वे कर्ज में डूब जाते हैं।

आज किसानों की यही हालत है। धरती माँ से लिया गया पानी लौटाने के बजाय वे लाखों रुपये खर्च कर बोरवेल लगाते हैं। फिर भी जल स्तर गिरता ही जाता है। एक दिन ऐसा आएगा जब धरती के खाते में पानी ही नहीं बचेगा। उपजाऊ ज़मीन रेगिस्तान बन जाएगी।

किसान ज़मीन से अन्न लेते हैं, लेकिन पराली, पत्ते, कचरा जला देते हैं। प्राकृतिक खाद के रूप में जमीन को वापस नहीं लौटाते।  जानवरों और इंसानों का मल-मूत्र भी खाद के रूप में धरती को नहीं लौटाते। परिणाम,  धरती से लिया गया कर्ज चुकता नहीं होता। शून्य का गणित बिगड़ जाता है। और जब शून्य बिगड़ता है, तो खेती से लक्ष्मी नहीं आती। किसान कर्ज में डूबता है, गरीब होता है, और कभी-कभी आत्महत्या तक कर लेता है।

अब सवाल है।  धरती को पानी कैसे लौटाएं?

द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने ब्रज में 99 सरोवर बनवाकर धरती का कर्ज चुकाया। सरोवरों का महत्व समझाने के लिए ऋषियों ने उनके किनारे तीर्थ बनाए और धार्मिक मूल्य दिए।

पहले हर गाँव में तालाब होता था। दिल्ली में 1947 से पहले 4 लाख की आबादी के लिए 500 से ज़्यादा तालाब थे। भंडारा ज़िले में गोंड राजाओं ने 10,000 से ज़्यादा तालाब बनवाए थे। पहले पानी का कर्ज चुकाने की पूरी व्यवस्था थी। लोग शून्य का गणित समझते थे।

अब समय है कि सरकार सख्ती करे। पराली और कचरा जलाने वाले किसानों पर कार्रवाई हो। शहरों के कचरे से खाद बनाकर धरती को लौटाया जा सकता है। इसके लिए सब्सिडी दी जा सकती है। रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद को बढ़ावा दिया जाए।

बुलढाणा ज़िले के हिवरे बाज़ार गाँव ने सामूहिक प्रयासों से 40 से ज़्यादा तालाब बनाकर जल संकट को दूर किया। खेती, पशुपालन और जीवन स्तर में सुधार हुआ। उन्हें शून्य का गणित समझ में आया।

अगर बाकी गाँव भी ऐसा करें, तो पहाड़ों में बड़े-बड़े बांधों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
(शांति पाठ)

सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

मेरी कामधेनु

 

मैंने शादी की और एक स्त्री को अधिकार समझकर घर लाया। उसके सामने चारा रखा। उसने बदले में भरपूर दूध दिया। वह अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभा रही थी।मैंने सोचा—इसमें प्यार कहाँ है? यह मेरा संकीर्ण, नीच पुरुषवादी सोच थी।

उस समय मैं अस्पताल के बिस्तर पर मृत्यु से लड़ रहा था। मेरा शरीर काँप रहा था। उसने दोनों हाथों से मुझे थामकर बैठाया। मैंने उसकी आँखों में झाँका। वहाँ केवल निर्मल, निष्कलंक प्रेम था।

मेरे मन में विचार आया—मैं उसके प्रेम को क्यों नहीं पहचान पाया? मुझे खुद पर शर्म आने लगी। मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा और काँपती आवाज़ में कहा, “मुझे डर लग रहा है।”

उसने दृढ़ स्वर में कहा, “आपको कुछ नहीं होगा। मैं हूँ ना!” उस क्षण वह मुझे सावित्री जैसी लगी— जो अपने पति के लिए यमराज से लड़ पड़ी थी। स्त्री  अपने प्रियजनों के लिए अपना सब कुछ समर्पित करती है। बिना किसी आशा के संसार में सुख और खुशी के रंग भरती है। हाँ, मेरी पत्नी ही मेरी कामधेनु है। 

रविवार, 12 अक्टूबर 2025

चिन्या की दिवाली और फटाकों का आनंद

 

सड़क के एक तरफ बड़े-बड़े बंगले थे और दूसरी तरफ झुग्गी बस्ती। यह किसी भी बड़े शहर का आम दृश्य था। दस साल का चिन्या ऐसी ही एक झुग्गी में रहता था। बाकी बच्चों की तरह उसे भी दिवाली पर अनार, चरखी, रॉकेट जैसे फटाके चलाने की इच्छा थी।

उसके पापा ने उसे एक छोटा सा पिस्तौल दिलाया था। दिनभर टिकली चलाकर वह ऊब गया था। शाम को जब उसने आसमान में उड़ते रॉकेट देखे, तो उसे महसूस हुआ कि उसके पापा अनार जैसे फटाके नहीं ला सकते। "हम गरीब हैं," यह सोच उसे दुखी करने लगी।

"चिन्या, अंदर क्यों बैठा है? बाहर आ! सामने वाला कोठी वाला बड़ा अनार चलाने वाला है!" पापा की आवाज सुनकर चिन्या बाहर आया। सामने एक आदमी ने अनार चलाया। रंग-बिरंगा फव्वारा आसमान में चमका।

"क्या मजा आया ना!" पापा ने पूछा।

"कैसा मजा? मैंने थोड़ी अनार चलाया है," चिन्या बोला।

"देख सामने के बच्चे कैसे ताली बजा रहे हैं, कूद रहे हैं। उन्होंने भी अनार नहीं चलाया," पापा ने समझाया।

"नहीं चलाया, लेकिन उनके नौकर ने तो चलाया!" चिन्या बोला।

"अगर ऐसा होता तो सिर्फ नौकर को खुशी मिलती, बच्चों को नहीं," पापा ने कहा।

चिन्या चुप रहा।

"देख चिन्या, बड़े लोग, राजा-महाराजा, सेठ—खुद कुछ नहीं करते। उनके नौकर उनके लिए काम करते हैं। सोचो कि ये नौकर तुम्हारे लिए अनार चला रहा है। देखो कितना मजा आएगा!" पापा ने कहा।

"मतलब वो हमारा नौकर है, ऐसा मानू?" चिन्या ने पूछा।

 बस तभी चिन्या ने देखा, “पापा! वो नौकर फिर से एक अनार फोड़ने वाला है!” वह उत्साह से चिल्लाया। नौकर की ओर देखते हुए चिन्या बोला, “अरे भैया! हमारे लिए भी एक अनार फोड़ दो!”

 

नौकर ने सड़क के पार झोपड़ी के सामने खड़े छोटे चिन्या को देखा। उसे अपने गांव में छोड़े बेटे की याद गईवही उत्सुक चेहरा, वही चमकती आँखें। नौकर ने एक बड़ा, मोटा अनार उठाया, चिन्या को दिखाया और उसे जलाया। और लो! लाल, नीले और सुनहरे रंग की चिंगारियाँ आसमान में नाच उठीं। लाल, नीले और सफेद रंग की चमकती चिंगारियाँ आसमान को रोशन कर गईं।

चिन्या ने तालियाँ बजाईं और खुशी से उछल पड़ा। सड़क पार से नौकर को एक हँसता हुआ चेहरा मिला। नौकर ने भी मुस्कराहट लौटाईएक मजबूर पिता की उदास मुस्कान।

उस मुस्कान को देखकर चिन्या के पिता की आँखें भर आईं। बेबस पिताओं के आँसू।

नौकर की तरफ देखकर चिन्या चिल्लाया, " नौकर! हमारे लिए अनार चलाओ!"

लाल, नीले, सफेद रंग की सप्तरंगी रोशनी आसमान में फैल गई। चिन्या ने ताली बजाई, कूदने लगा। उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

वह मुस्कान देखकर पापा की आंखों में आंसू गए।