गुरुवार, 22 जनवरी 2026

सर्पदंश: दो कथाएँ और परिणाम

 

पहली कथा: कठोर निर्णय


एक ज़हरीला साँप राज्य में कई लोगों की जान ले चुका है। सैनिक उसे पकड़कर दरबार में लाते हैं। सैनिक बोले: “महाराज, यह साँप कई नागरिकों की मृत्यु का कारण है। कृपया आदेश दें, इसका क्या किया जाए?”

राजा ने आदेश दिया इसमें “सोचने की क्या ज़रूरत?  कुचल दो इस जहरीले साँप को।” सैनिकों ने तुरंत साँप को मार डाला।


दूसरी कथा: विचारों का संघर्ष

फिर वही साँप, वही अपराध। लेकिन इस बार राजा तुरंत निर्णय नहीं लेते। वे मंत्रियों से सलाह लेते हैं। 


पहला मंत्री:

“महाराज, यह साँप ज़हरीला है। इसे जीवित रखना खतरे को न्योता देना है। इसे मार देना ही उचित है।”

दूसरा मंत्री:

“महाराज, साँप का स्वभाव ही ज़हरीला है। वह काटता है, यह उसकी प्रकृति है। हम सभ्य लोग हैं। बिना सोच-विचार किसी की जान लेना अन्याय है।” राजा सोच में पड़ जाते हैं और नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों की समिति से सलाह लेते हैं। समिति में बुद्धिमान, कला-प्रेमी और प्रगतिशील लोग होते हैं।

समिति का सुझाव:

“राजा, साँप दोषी नहीं है। उसने अपने स्वभाव के अनुसार ही व्यवहार किया। उसे सज़ा देना उसके अस्तित्व को नकारना है। उसे सोने के पिंजरे में रखा जाए और हर नागपंचमी पर दूध का प्रसाद दिया जाए।” राजा समिति की बात मान लेते हैं। साँप को सोने के पिंजरे में रखा जाता है। हर साल नागपंचमी पर उसे दूध का प्रसाद चढ़ाया जाने लगा।  

एक दिन, नागपंचमी के अवसर पर साँप राजा को काट लेता है। राजा की मृत्यु हो जाती है।

अब प्रश्न उठता है—राजा की मृत्यु का ज़िम्मेदार कौन? 

साँप? या वह समिति जिसने उसे आश्रय देने की सलाह दी? 

सने वाले शत्रु को राज्य में आश्रय देने का परिणाम राजा सहित समस्त प्रजा को भुगतना पड़ता है।

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें