पहली कथा: कठोर निर्णय
एक ज़हरीला साँप राज्य में कई लोगों की जान ले चुका है। सैनिक उसे पकड़कर दरबार में लाते हैं। सैनिक बोले: “महाराज, यह साँप कई नागरिकों की मृत्यु का कारण है। कृपया आदेश दें, इसका क्या किया जाए?”
दूसरी कथा: विचारों का संघर्ष
फिर वही साँप, वही अपराध। लेकिन इस बार राजा तुरंत निर्णय नहीं लेते। वे मंत्रियों से सलाह लेते हैं।
“महाराज, साँप का स्वभाव ही ज़हरीला है। वह काटता है, यह उसकी प्रकृति है। हम सभ्य लोग हैं। बिना सोच-विचार किसी की जान लेना अन्याय है।” राजा सोच में पड़ जाते हैं और नगर के प्रतिष्ठित नागरिकों की समिति से सलाह लेते हैं। समिति में बुद्धिमान, कला-प्रेमी और प्रगतिशील लोग होते हैं।
एक दिन, नागपंचमी के अवसर पर साँप राजा को काट लेता है। राजा की मृत्यु हो जाती है।
अब प्रश्न उठता है—राजा की मृत्यु का ज़िम्मेदार कौन?
साँप? या वह समिति जिसने उसे आश्रय देने की सलाह दी?
डसने वाले शत्रु को राज्य में आश्रय देने का परिणाम राजा सहित समस्त प्रजा को भुगतना पड़ता है।

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