एक गायक था, जो जिंदगी भर सिर्फ दर्द
भरे गाने ही गाता था। टूटा दिल, बेवफाई, उदासी और रातों की तन्हाई-ये उसके गानों के हमेशा के टॉपिक थे।
उसकी शादी की 25वीं सालगिरह
थी। सुबह से ही पत्नी ने साफ-साफ चेतावनी दे रखी थी, “आज
खुशी का दिन है। कोई नकारात्मक या उदास गाना मत गाना। वरना देख लेना!”
शाम को पार्टी का माहौल बहुत खूबसूरत था। दोस्त-रिश्तेदार आए हुए थे।
रंग-बिरंगी लाइट्स, हंसी-ठिठोली,
स्वादिष्ट पकवानों की खुशबू और मस्ती छाई हुई थी।
रिश्तेदारों ने गायक से गाने की फरमाइश कर दी। उसने खुशनुमा गाने शुरू कर दिए।
लोग तालियाँ बजाने लगे और बोले, “वाह!
इस उम्र में भी आवाज में वैसा ही जादू है!”
तभी किसी ने मशहूर धुरंधर वाला गाना गाने को कहा: “ना तो कारवां की तलाश है, ना हमसफर
की तलाश है…”
पत्नी की चेतावनी याद आते ही गायक ने तुरंत बोल बदल दिए। “ना” की जगह “हाँ”
डालकर उसने जोर-जोर से गा दिया:
“हाँ आज कारवां की तलाश है… हाँ आज नए हमसफर की तलाश है…”
सुनते ही पूरा हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठा। एक रिश्तेदार जोर से
चिल्लाया, “अरे वाह! इस उम्र में भी नया हमसफर
चाहिए! कमाल है भाई!”
यह बात पत्नी के कानों तक पहुँचते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

अगले दिन गायक अस्पताल के बेड पर लेटा हुआ था। चेहरे पर पट्टियाँ, हाथ-पैर में दर्द। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ
क्या।
उसने तो पत्नी की सलाह मानी थी, फिर भी भाइयों के साथ मिलकर पत्नी ने उसकी इतनी बुरी कुटाई क्यों कर दी?
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