इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्तिं दक्षस्य सुभगत्वमस्मे।
पोषं रयीणामरिष्टिं तनूनां स्वाद्मानं वाचः सुदिनत्वमह्नाम्॥
(ऋग्वेद 2/21/6)
स्वामी दयानन्द सरस्वती का भावार्थ
हे (इन्द्र) सभों के अधिपति के समान वर्तमान प्रभो! (अस्मे) हम लोगों के लिये (दक्षस्य) बल की (चित्तिम्) उस प्रकृति को, जिससे विद्या को इकट्ठा करते हैं, और (सुभगत्वम्) अत्युत्तम ऐश्वर्य, (पोषम्) पुष्टि तथा (रयीणाम्) धन और (तनूनाम्) शरीरों की (अरिष्टिम्) रक्षा, (वाचः) वाणी का बोध, (स्वाद्मानम्) स्वादिष्ट भोग, (अह्नाम्) दिनों का (सुदिनत्वम्) सुदिनपन, और (श्रेष्ठानि) धर्मयुक्त (द्रविणानि) धनों को (धेहि) धारण कीजिये॥६॥
१. इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि- श्रेष्ठ धन की प्रार्थना
ऋषि इन्द्र (परमैश्वर्यवान प्रभु) से प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमें श्रेष्ठ धन प्रदान कीजिये। श्रेष्ठ धन का अर्थ है, पवित्र और धर्मपूर्वक अर्जित किया हुआ धन, न कि छल-कपट या शोषण से कमाया गया धन।
आधुनिक उदाहरण: आज के समय में भी वही व्यवसाय या आय दीर्घकाल में टिकती है, जो ईमानदारी और पारदर्शिता पर आधारित हो। जो कम्पनियाँ मिलावट, कर-चोरी या धोखाधड़ी से धन कमाती हैं, वे कुछ समय बाद कानून, बाज़ार या समाज के हाथों दण्डित होकर डूब जाती हैं। जबकि ईमानदार व्यवसाय पीढ़ियों तक फलते-फूलते हैं। जैसे टाटा इत्यादि।
२. चित्तिं दक्षस्य- बल के साथ विवेक
ऋषि प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमें धन के साथ दक्षता, बल और उसका सदुपयोग करने का ज्ञान भी दीजिये। धन की रक्षा के लिए बल आवश्यक है, परन्तु बल का उपयोग कैसे करना है, यह विवेक भी उतना ही आवश्यक है।
आधुनिक उदाहरण: जिन देशों को तेल जैसे प्राकृतिक संसाधनों से अपार धन प्राप्त हुआ है, यदि वे इस धन का उपयोग केवल शस्त्रों की होड़ और युद्ध में करते हैं, तो यह विनाश का कारण बनता है। परन्तु वही धन जब शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसंरचना के निर्माण में लगाया जाता है, तो राष्ट्र और समाज दोनों समृद्ध होते हैं। शक्ति के साथ विवेक न हो, तो शक्ति विनाशकारी बन जाती है।
३. सुभगत्वम् अस्मे: सौभाग्यकारी धन
ऋषि प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमें प्राप्त धन सौभाग्य प्रदान करने वाला और सबके लिए मंगलकारी हो, केवल हमारे स्वार्थ तक सीमित न रहे।
आधुनिक उदाहरण: आज कई उद्योगपति और संस्थाएँ अपने लाभ का एक भाग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा में लगाते हैं। ऐसा धन ही वास्तव में सौभाग्यकारी कहलाता है, क्योंकि वह देने वाले और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। इसके विपरीत जो धन केवल संचय और दिखावे के लिए रखा जाता है, वह न व्यक्ति को सुख देता है, न समाज को।
४. पोषं रयीणाम्: धन की स्थायी वृद्धि
ऋषि प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमारे जीवन में समृद्धि, स्थिरता और धन की निरंतर, क्रमिक वृद्धि हो।
आधुनिक उदाहरण: जो व्यक्ति अनुशासन के साथ नियमित बचत और निवेश करता है (जैसे मासिक SIP या दीर्घकालिक निवेश), उसकी सम्पत्ति धीरे-धीरे किन्तु स्थायी रूप से बढ़ती है। इसके विपरीत सट्टेबाज़ी या क्षणिक लाभ की होड़ में (जैसे अनियंत्रित शेयर या क्रिप्टो सट्टा) कमाया गया धन उतनी ही तेज़ी से नष्ट भी हो जाता है। वेद यहाँ स्थायी और क्रमिक पुष्टि की कामना करता है, आकस्मिक और अस्थिर लाभ की नहीं।
५. अरिष्टिं तनूनाम्: शरीर की सुरक्षा
ऋषि प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमारे शरीर रोगों से सुरक्षित रहें, हम दीर्घायु और स्वस्थ बने रहें। जब हम धर्मपूर्वक अर्जित धन का उपयोग स्वयं और समाज के कल्याण के लिए करते हैं, तो इसके लिए स्वस्थ, निरोगी शरीर होना भी आवश्यक है। वेदों में भी कहा गया है कि हमारा शरीर वज्र के समान दृढ़ हो। संस्कृत की प्रसिद्ध उक्ति भी है- "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" अर्थात् शरीर ही धर्म-साधन का पहला आधार है। बिना निरोगी शरीर के मनुष्य कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता।
आधुनिक उदाहरण: आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में तनाव, अनियमित दिनचर्या और शारीरिक श्रम की कमी से मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोग बढ़ रहे हैं। नियमित व्यायाम, योग और संतुलित आहार अपनाकर ही व्यक्ति उस स्वास्थ्य को बनाए रख सकता है, जो धन और सफलता का सच्चा उपभोग करने के लिए आवश्यक है क्योंकि रुग्ण शरीर के साथ अपार धन भी निरर्थक है।
६. स्वाद्मानं वाचः मधुर वाणी
ऋषि कहते हैं, हे प्रभो! हमारी वाणी शीतल और मधुर हो। शीतल वाणी के अभाव में धन और बल भी स्थायी नहीं रहते। शस्त्र से लगे घाव भर जाते हैं, परन्तु कठोर वाणी से लगा घाव कभी नहीं भरता। महाभारत में द्रौपदी के एक कटु वचन ने ही सम्पूर्ण कौरव वंश के विनाश की नींव रख दी थी। यह इतिहास इस बात का प्रमाण है कि वाणी की एक चूक कितना बड़ा विध्वंस कर सकती है।
आधुनिक उदाहरण: आज सोशल मीडिया पर कटु और आवेशपूर्ण भाषा, ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियाँ परिवारों, मित्रताओं और यहाँ तक कि समाजों में भी गहरी दरार डाल देती हैं। एक असावधानीपूर्वक बोला गया या लिखा गया शब्द रिश्तों को हमेशा के लिए तोड़ सकता है, जबकि मधुर और संयत वाणी बड़े-बड़े विवादों को भी शांत कर देती है।
७. सुदिनत्वमह्नाम्: शुभ और सार्थक दिन
ऋषि अन्त में प्रार्थना करते हैं, हे प्रभो! हमारे सभी दिन शुभ, सार्थक और सुखमय हों। यह प्रार्थना पिछली सभी कामनाओं का सार है। धर्मयुक्त धन, विवेकपूर्ण बल, सौभाग्य, स्थायी समृद्धि, स्वस्थ शरीर और मधुर वाणी, जब ये सब एक साथ प्राप्त होते हैं, तभी मनुष्य के दिन वास्तव में "सुदिन" (शुभ दिन) कहलाते हैं।
आधुनिक उदाहरण: आज व्यक्ति भौतिक सफलता तो पा लेता है, पर मानसिक शांति और सार्थकता के अभाव में उसके दिन खाली-खाली लगते हैं। जीवन में सन्तुलन- काम, स्वास्थ्य, परिवार और आत्मिक शांति का सामंजस्य ही किसी दिन को वास्तव में शुभ बनाता है।
यह ऋचा वस्तुतः एक सन्तुलित, सार्थक जीवन का सम्पूर्ण खाका प्रस्तुत करती है। ऋषि केवल धन नहीं माँगता, वह माँगता है धर्मपूर्वक अर्जित धन, उसे सम्भालने और सदुपयोग करने का विवेक, ऐसा धन जो सबके लिए मंगलकारी हो, उसकी स्थायी और क्रमिक वृद्धि, उसे भोगने के लिए स्वस्थ शरीर, सम्बन्धों को सहेजने वाली मधुर वाणी, और अन्ततः इन सबके परिणामस्वरूप सार्थक, शुभ दिन।
आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ लोग तेज़ी से अमीर बनने, सत्ता पाने और सफलता दिखाने की होड़ में लगे हैं, यह मन्त्र एक सजग चेतावनी और मार्गदर्शन दोनों है कि केवल धन-संग्रह पर्याप्त नहीं है। धन के साथ विवेक न हो तो वह विनाशकारी बनता है (जैसे संसाधन-सम्पन्न पर संघर्षग्रस्त देश), धन में सामाजिक भागीदारी न हो तो वह सौभाग्य नहीं बनता, स्वास्थ्य न हो तो धन निरर्थक है, और वाणी में मिठास न हो तो बना-बनाया सम्बन्ध और साम्राज्य भी क्षण भर में बिखर सकता है। यही इस वैदिक ऋचा की शाश्वत और आज भी उतनी ही प्रासंगिक शिक्षा है।


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