लेकिन हम दिल्लीवालों का अंदाज़ ही कुछ अलग है। यहाँ गर्मियों की छुट्टियाँ और बरसात का मौसम ही पतंगबाज़ी का असली मौसम माना जाता है। इस दौरान अधिकतर समय आसमान बादलों से घिरा रहता है। कभी अचानक बारिश शुरू हो जाती है और पतंग के साथ-साथ मांझा भी खराब हो जाता है। तो कभी तेज़ हवाएँ चलने लगती हैं। ऐसे समय बड़े-बड़े उस्ताद पतंगबाज़ों की विशाल पतंगें भी आसमान में टिक नहीं पातीं और बेजान होकर ज़मीन पर आ गिरती हैं।
कभी-कभी मौसम बिल्कुल शांत होता है, हवा का नामोनिशान तक नहीं होता। तब छोटी हो या बड़ी, कोई भी पतंग उड़ाना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे बरसाती मौसम में केवल असली उस्ताद पतंगबाज़ ही टिक पाते हैं। यहाँ पतंगें केवल उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि पेच लड़ाने के लिए उड़ाई जाती हैं। दिल्ली के पतंगबाज़ों का D-Day होता है 15 अगस्त। उस दिन सुबह से ही पूरे शहर में "आई बो काटा!" की विजयी पुकार गूँजती रहती है।
मेरा बचपन पुरानी दिल्ली में बीता। 1980 से पहले हम जिस हवेली में किराए पर रहते थे, वह पूर्वमुखी थी। बीच में बड़ा-सा आँगन, तीनों ओर कमरे और ऊपर विशाल छत। बरसात में हवाएँ भी पूर्व दिशा से चलती थीं, इसलिए हमें ढेर सारी कटी हुई पतंगें लूटने को मिल जाती थीं। इस कारण पतंग खरीदने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। हमारी छत के पीछे काबुली गेट का सरकारी स्कूल था। उसकी छत पर आने वाली पतंगें भी अक्सर हमारे हिस्से में आ जाती थीं।
काबुली गेट का ज़िक्र आया है तो एक बात याद आती है। पहले स्कूल की जगह एक बड़ा मैदान हुआ करता था और उसके आगे काबुली दरवाज़ा खड़ा था। लेकिन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ों की तोपों की मार से वह पूरी तरह ध्वस्त हो गया। इस क्षेत्र में भीषण युद्ध हुआ था, जिसमें दोनों पक्षों के हज़ारों सैनिक और अधिकारी मारे गए थे। कुछ लोगों का मानना है कि आज भी अमावस्या की घनी अँधेरी रातों में वहाँ घोड़ों की टापों की आवाज़ें और सैनिकों की कराह सुनाई देती हैं।
हमारे कमरे की खिड़की उसी स्कूल की ओर खुलती थी। लेकिन हमें कभी ऐसा कुछ सुनाई नहीं दिया। सर्दियों की रातों में स्कूल की इमारत बंदरों का अड्डा बन जाती थी। उनकी उछल-कूद, तोड़फोड़ और शोर-शराबे के कारण लोगों को शायद ऐसे भ्रम होते होंगे।
बड़े पतंगबाज़ अक्सर शर्त लगाकर पेच लड़ाते हैं। सामान्यतः जब पतंग 70–80 गज़ की ऊँचाई पर पहुँचती है, तभी पेच लगता है। ऐसी कटी हुई पतंग हाथ लग जाए तो कम से कम सौ गज़ मांझा मुफ्त मिल जाता था। हमारे जैसे बच्चों के लिए वही पूरे मौसम के लिए काफी होता था। वह मांझा इतना मज़बूत होता था कि उँगलियाँ कट जाना आम बात थी। फिर भी हर शाम हम आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहते कि कहीं कोई कटी हुई पतंग हमारी ओर तैरती हुई आती दिखाई दे जाए।
दिल्ली में पतंग उड़ाना सचमुच जिगर का काम है। सबसे पहले पतंग के कन्ने (ब्रिडल) बाँधने पड़ते हैं। फिर कन्ने में मांझा बाँधते समय एक गाँठ लगाई जाती है और वही पतंग की सबसे कमजोर कड़ी होती है। दिल्ली में मकान बहुत पास-पास होने के कारण एक साथ आसमान में सैकड़ों पतंगें उड़ती दिखाई देती हैं।
पतंगबाज़ों की नज़र बाज़ जैसी तेज़ होती है। आसमान में उड़ती हुई कोई पतंग अचानक नीचे गोता लगाकर अभी-अभी उड़ाई गई पतंग का कन्ना काट देगी, यह लगभग तय होता है। इसलिए सही मौका देखकर, चारों ओर नज़र रखते हुए, मात्र पाँच-दस सेकंड में अपनी पतंग को 40–50 गज़ ऊपर पहुँचा देना ज़रूरी होता है। एक बार पतंग 50–60 गज़ की ऊँचाई पर पहुँच जाए, तो फिर चिंता काफी कम हो जाती है।
पेच लड़ाते समय मैं हमेशा एक ही नियम अपनाता था, सामने वाले को पेच का लालच दो, लेकिन खुद उसके जाल में मत फँसो। पेच लगने के समय हवा जिस दिशा में बह रही हो, उसी दिशा के मध्य भाग में अपनी पतंग रखो। इससे अपना मांझा थोड़ा कमजोर होने पर भी लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सामने वाले की पतंग काटने में सफलता मिल जाती थी।
इसके विपरीत, यदि पतंग हवा की सही दिशा में न हो तो उसके कटने की संभावना लगभग 90 प्रतिशत रहती है। हाँ, हर बार यह गणित सही बैठे, ऐसा भी नहीं है। यदि सामने वाले का मांझा अधिक मजबूत हो या उसकी पतंग बड़ी हो, तो बाज़ी उसी के हाथ रहती है।
दिल्ली के पतंगबाज़ पूरे देश में मशहूर हैं। लेकिन गुजरात के पतंगबाज़ भी किसी से कम नहीं हैं। उनमें दिल्ली वालों को बराबरी की टक्कर देने का दम है। मकर संक्रांति के दिन वहाँ भी दिल्ली की तरह रोमांचक पेच लड़े जाते हैं।
हाँ, मुंबई के पतंगबाज़ इस मामले में कुछ पीछे ही माने जाते हैं। गज्जूभाई तो उनकी पतंगें बड़ी आसानी से काट देते हैं।
एक बार एक नया पतंगबाज़ गुजरात के एक उस्ताद से पतंगबाज़ी सीखकर मुंबई पहुँचा। उसने वहाँ के बड़े-बड़े पतंगबाज़ों की पतंगें भी आसानी से काट डालीं। अब तो मुंबई के आसमान में मानो उसी की पतंग का एकछत्र राज चलता है।
खैर... पतंगबाज़ी केवल एक खेल नहीं, बल्कि बचपन की वे अमूल्य यादें हैं, जो जीवन भर मन के आकाश में रंग-बिरंगी पतंगों की तरह उड़ती रहती हैं। राजनीति भी पतंगबाजी की तरह ही है।


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