शनिवार, 22 अगस्त 2026

विक्रमादित्य आणि सिंहासन चार पुतळी: सत्तेसाठी आत्मा गिरवी

 




विक्रमादित्य सत्ता का उपयोग करके प्रजा का दुःख, दरिद्रता और अन्याय दूर करना चाहता था। उसे लगता था कि शासन जनता के लिए होना चाहिए। उसने सोचा कि राज्यलक्ष्मी की आराधना करके, उसे प्रसन्न करके, प्राप्त सत्ता का उपयोग वह प्रजा की भलाई के लिए करेगा। गरुड़ जैसी तीक्ष्ण दृष्टि रखकर, प्रजा को कष्ट देने वाले भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों को दंडित करके, वह गरीबों और किसानों के हितों की रक्षा करेगा। उसने राज्यलक्ष्मी की आराधना की। अंततः राज्यलक्ष्मी प्रसन्न हुई।

एक शुभ मुहूर्त पर विक्रमादित्य सिंहासन पर विराजमान होने के लिए सिंहासन की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। पहली सीढ़ी पर आँखों पर पट्टी बाँधी हुई एक पुतली थी। वह राजा से कहती है, "राजा को बुरा नहीं देखना चाहिए।" चारों ओर भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण करने वाले अधिकारी और मंत्री दिखाई दें, तो भी उन्हें अनदेखा करना होगा। इसके बिना अगली सीढ़ी नहीं चढ़ी जा सकती। राजा यह शर्त मान लेता है।

दूसरी सीढ़ी पर कान ढके हुए एक पुतली राजा से कहती है, राजा को बुरा नहीं सुनना चाहिए, जनता की वेदनाएँ, किसानों की आत्महत्याओं और गरीबी की चीत्कार भरी कहानियाँ नहीं सुननी चाहिए। विक्रम अपने कान ढक लेता है। राजा यह शर्त भी स्वीकार करता है।

तीसरी सीढ़ी पर होठों पर उँगली रखे एक पुतली कहती है, "राजा को बुरा नहीं बोलना चाहिए।" मंत्री, अधिकारी चाहे कितने भी भ्रष्ट क्यों न हों, उन पर आलोचना किए बिना मौन धारण करना होगा। विक्रम मौन भी स्वीकार कर लेता है।

अंत में चौथी पुतली प्रकट होती है। वह कहती है, "यह सब ढक लेने पर भी आत्मा अस्वस्थ हो जाती है। आत्मा अस्वस्थ हुई, तो राजा सत्ता खो देता है। अपनी आत्मा मुझे अर्पित कर दो।" विक्रम पुतली को अपनी आत्मा अर्पित कर देता है और सिंहासन पर बैठ जाता है।

सिंहासन पर बैठते ही विक्रमादित्य के मानस-नेत्रों के सामने एक दिव्य दृश्य उभरता है, हरियाली में नहाई-धुली खेती, मेहनती किसानों के चेहरों पर संतोष और गर्व की चमक, सड़कों पर खेलते खुशहाल बच्चे, बाज़ार में उत्साह से खरीदारी करती प्रजा, और चारों ओर एक शांत, समृद्ध, सुसंस्कृत समाज। राज्य में कहीं भी दुःख, दरिद्रता या अन्याय का लेशमात्र भी नहीं। हर घर में हँसी, हर मन में आशा, और हर कदम में आनंद भरा हुआ है। विक्रमादित्य को लगता है, यही तो राज्यलक्ष्मी की कृपा है, जिसके आशीर्वाद से उसका राज्य स्वर्ग समान बन गया है।

आज भी जो लोग सत्ता मिलने से पहले जनता के दुःख दूर करने और ईमानदारी की बातें करते हैं, सत्ता मिलते ही बदल जाते हैं। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें जनता का दुःख दिखना बंद हो जाता है। इसी विचार से सूझी यह कथा।

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