बुधवार, 2 सितंबर 2026

"गीता का सर्वधर्म समभाव: एक ही ईश्वर, अनेक मार्ग"



महाभारत के कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही स्वजनों के विरुद्ध युद्ध करने से विमुख हो गया
, तब उसका द्वंद्व केवल पारिवारिक मोह का नहीं था, बल्कि उस गहरे मानवीय प्रश्न का था, सत्य क्या है, और सही मार्ग कौन-सा है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दुविधा को शांत करने के लिए अपना विराट स्वरूप दिखाया। गीता के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित यह विश्वरूप दर्शन कोई साधारण चमत्कार नहीं था, अपितु यह दर्शाने का माध्यम था कि समस्त सृष्टि, समस्त जीव, समस्त लोक एक ही परमात्मा के भीतर समाहित हैं। इसी अध्याय में कृष्ण कहते हैं कि जो योद्धा युद्धभूमि में खड़े हैं, वे सब पहले से ही उस विराट रूप में विद्यमान हैं।  निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्- यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, अपितु समस्त मनुष्यता के लिए था कि प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक रूप उसी एक अविनाशी सत्ता की अभिव्यक्ति है।

प्राचीन सभ्यताओं में यह भाव भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होता रहा है। वैदिक काल में सूर्य, अग्नि, वरुण, इंद्र, पृथ्वी और नदियों को देवत्व माना गया। वृक्ष, नाग, गौ, पर्वत इत्यादि सभी में दिव्यता देखी गई। यह कोई अंधविश्वास नहीं था, बल्कि यह भाव था कि प्रकृति का प्रत्येक अंश उसी परम चेतना का विस्तार है। भारत से परे भी अन्य प्राचीन सभ्यताओं में यही प्रवृत्ति देखी जाती है। प्राचीन मिस्र (इजिप्त) की सभ्यता में सूर्य देवता रा, सृष्टि और पुनर्जन्म के देवता ओसाइरिस, मातृत्व और जादू की देवी आइसिस, तथा आकाश देवता होरस जैसे अनेक देवी-देवताओं की पूजा होती थी, और वहाँ भी पशुओं, जैसे बिल्ली, सांड और श्येन पक्षी को पवित्र माना जाता था। मध्य अमेरिका की माया सभ्यता में वर्षा के देवता चाक, सृष्टिकर्ता कुकुल्कान (पंख वाला सर्प) की उपासना प्रचलित थी, तथा मक्का के देवता की उपासना प्रचलित थी,। दक्षिण अमेरिका की इंका सभ्यता में सूर्य देवता इंति सर्वोच्च देवता माने जाते थे, साथ ही गर्जन के देवता इल्यापा और पृथ्वी माता पचामामा की भी पूजा होती थी। इन सभी सभ्यताओं में एक समान भाव दिखाई देता है, प्रकृति की शक्तियों और जीवनदायी तत्वों में परमात्मा को देखने की प्रवृत्ति, चाहे वह भारत हो, मिस्र हो या अमेरिका महाद्वीप। ऋग्वेद का यह कथन इसी भावना का सार है, एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति, अर्थात सत्य एक ही है, विद्वान उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं। ईशावास्य उपनिषद भी कहता है कि ईशावास्यमिदं सर्वम्- इस संसार का कण-कण ईश्वर से व्याप्त है। यही विचार आगे चलकर गीता में और अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ।
 
भगवान कृष्ण के समय भी भारत में विभिन्न जनपदों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की उपासना प्रचलित थी। स्वाभाविक है कि जब मनुष्य अपनी आस्था को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगता है, तो वहीं से संघर्ष जन्म लेता है। अपनी ही उपासना पद्धति को श्रेष्ठ मानकर उसे दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति सदैव विवाद, वैमनस्य और अंततः युद्ध को जन्म देती रही है। इतिहास साक्षी है कि इसी प्रवृत्ति के कारण भूतकाल में लाखों निर्दोष लोग मारे गए।  कभी धर्म-युद्धों (क्रूसेड) के नाम पर, कभी धार्मिक अभियानों और साम्राज्यवादी विस्तार के नाम पर, तो कभी अपने मत को एकमात्र सत्य मानकर दूसरों के विश्वास को मिटाने के प्रयास में। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों का नरसंहार (होलोकॉस्ट) इसका एक अत्यंत दर्दनाक उदाहरण है, जहाँ नस्लीय और वैचारिक श्रेष्ठता के दुराग्रह ने लाखों निर्दोष लोगों के जीवन का अंत कर दिया। यह दर्शाता है कि जब कोई समुदाय अपनी पहचान, आस्था या विचारधारा को दूसरों से श्रेष्ठ मानकर उसे बलपूर्वक स्थापित करने का प्रयास करता है, तो उसका परिणाम विध्वंस और नरसंहार के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। अर्जुन का द्वंद्व दरअसल उसी मानवीय प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने विश्वास और कर्तव्य के बीच उलझा रहता है। इसी संदर्भ में गीता का यह श्लोक अत्यंत मार्मिक है,  ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मनुष्य जिस भी रूप में मेरी उपासना करता है, मैं उसी रूप में उसे स्वीकार करता हूँ, क्योंकि सभी मार्ग अंततः मुझ तक ही पहुँचते हैं। इससे भी सरल संदेश गीता के नौवें अध्याय में मिलता है,  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। भगवान को भव्य कर्मकांड नहीं, बल्कि निष्कपट भाव से अर्पित एक पत्ता, एक फूल भी स्वीकार्य है। इसका अर्थ स्पष्ट है कि बाह्य आडंबर आवश्यक नहीं, आंतरिक भाव और सदाचरण ही सच्ची पूजा है। सनातन परंपरा में वर्णित धर्म,  सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्तव्य का पालन ही पर्याप्त है, चाहे उपासना पद्धति कोई भी हो।
 
आज जब धर्म के नाम पर विश्व के अनेक भागों में वैमनस्य, हिंसा और जेहाद जैसी प्रवृत्तियाँ देखी जा रही हैं, तब गीता का यह उपदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। मनुष्य आज भी उसी दुविधा में है जिसमें अर्जुन था।  अपनी आस्था को श्रेष्ठ और दूसरों की आस्था को हीन मानने की प्रवृत्ति आज भी संघर्ष का मूल कारण बनी हुई है। गीता हमें सिखाती है कि यदि प्रत्येक जीव में, प्रत्येक उपासना पद्धति के मूल में वही एक परमात्मा विराजमान है, तो फिर मतभेद और द्वेष का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यह दर्शन धर्मों के बीच सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और आपसी सम्मान की नींव रखता है। सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि की भावना यदि आज का मनुष्य आत्मसात कर ले, तो धार्मिक कट्टरता और हिंसा का बहुत बड़ा भाग स्वतः समाप्त हो सकता है। गीता का विश्वरूप दर्शन इसलिए केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि आज के खंडित और अशांत विश्व के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक सिद्धांत है।
 

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