महाभारत के कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही स्वजनों के विरुद्ध युद्ध करने से विमुख हो गया, तब उसका द्वंद्व केवल पारिवारिक मोह का नहीं था, बल्कि उस गहरे मानवीय प्रश्न का था, सत्य क्या है, और सही मार्ग कौन-सा है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दुविधा को शांत करने के लिए अपना विराट स्वरूप दिखाया। गीता के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित यह विश्वरूप दर्शन कोई साधारण चमत्कार नहीं था, अपितु यह दर्शाने का माध्यम था कि समस्त सृष्टि, समस्त जीव, समस्त लोक एक ही परमात्मा के भीतर समाहित हैं। इसी अध्याय में कृष्ण कहते हैं कि जो योद्धा युद्धभूमि में खड़े हैं, वे सब पहले से ही उस विराट रूप में विद्यमान हैं। निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्- यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, अपितु समस्त मनुष्यता के लिए था कि प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक रूप उसी एक अविनाशी सत्ता की अभिव्यक्ति है।
बुधवार, 2 सितंबर 2026
"गीता का सर्वधर्म समभाव: एक ही ईश्वर, अनेक मार्ग"
महाभारत के कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने ही स्वजनों के विरुद्ध युद्ध करने से विमुख हो गया, तब उसका द्वंद्व केवल पारिवारिक मोह का नहीं था, बल्कि उस गहरे मानवीय प्रश्न का था, सत्य क्या है, और सही मार्ग कौन-सा है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दुविधा को शांत करने के लिए अपना विराट स्वरूप दिखाया। गीता के ग्यारहवें अध्याय में वर्णित यह विश्वरूप दर्शन कोई साधारण चमत्कार नहीं था, अपितु यह दर्शाने का माध्यम था कि समस्त सृष्टि, समस्त जीव, समस्त लोक एक ही परमात्मा के भीतर समाहित हैं। इसी अध्याय में कृष्ण कहते हैं कि जो योद्धा युद्धभूमि में खड़े हैं, वे सब पहले से ही उस विराट रूप में विद्यमान हैं। निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्- यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, अपितु समस्त मनुष्यता के लिए था कि प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक रूप उसी एक अविनाशी सत्ता की अभिव्यक्ति है।
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