नदी का जल यदि यूँ ही बह जाए तो वह व्यर्थ चला जाता है; किंतु उसी जल को बाँधों में रोककर, नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाए और उसका विवेकपूर्ण प्रबंधन किया जाए, तो वही जल धरती को स्वर्ण के समान मूल्यवान उपज प्रदान करता है।
जल और परिश्रम के समुचित संगम से खेतों में आम, अंजीर, गन्ना, अंगूर, केले तथा अनेक प्रकार की फसलें लहलहाती हैं। प्रकृति का सम्मान, जल का संरक्षण और खेती में विविधता-यही किसान की समृद्धि का आधार है।
एक टीवी चैनल पर एक छोटे किसान की कहानी दिखाई गई थी। अपने छोटे-से खेत में उसने अनेक प्रकार की फसलें, सब्जियाँ और फल उगाकर अच्छी आय का स्रोत बनाया था। वह कार्यक्रम देखते समय मुझे समर्थ रामदास जी की उपर्युक्त पंक्तियाँ याद आ गईं।
पुराणों में एक प्रसिद्ध उक्ति है- "जो कृषि करता है, वही ऋषि है।" हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं करते थे, बल्कि खेती भी करते थे। वैदिक काल में उनके आश्रम कृषि अनुसंधान के भी केंद्र थे। संभवतः इसी कारण भारत की कृषि परंपरा में इतनी विविधता विकसित हुई। समर्थ रामदास भी एक महान ऋषि थे।
समर्थ रामदास ने बारह वर्षों तक पूरे देश का भ्रमण किया। इस यात्रा के दौरान उन्होंने किसानों के जीवन और उनकी समस्याओं को निकट से देखा-समझा। उन्होंने अनुभव किया कि जल का उचित प्रबंधन और फसलों की सही योजना बनाए बिना किसान समृद्ध नहीं हो सकता। इसलिए उन्होंने किसानों की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी बताए।
समर्थ कहते हैं कि नदियों का जो पानी व्यर्थ बह जाता है, उसे बाँधों के माध्यम से रोकना चाहिए। नहरें बनाकर पानी खेतों तक पहुँचाना चाहिए और उपलब्ध जल का योजनाबद्ध उपयोग करना चाहिए। जितना पानी उपलब्ध हो, उसी के अनुसार फसलों का चयन करना चाहिए तथा प्रत्येक फसल को उसकी आवश्यकता के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए।
वे यह भी कहते हैं कि खेत में एक ही प्रकार की फसल लेने के बजाय अनेक प्रकार की फसलें उगानी चाहिए। अक्सर किसान अधिक लाभ की आशा में पूरे खेत में केवल एक ही फसल बो देते हैं। लेकिन यदि तूफान, तेज हवा, कम या अधिक वर्षा अथवा कीटों का प्रकोप हो जाए, तो पूरी फसल नष्ट हो जाती है और किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
कई बार किसी नकदी फसल के अधिक लाभ के लालच में किसी क्षेत्र के अधिकांश किसान वही एक फसल उगाने लगते हैं। परिणामस्वरूप जब वह फसल एक साथ बाजार में आती है, तो उसकी कीमतें गिर जाती हैं और किसानों को भारी आर्थिक हानि होती है। टमाटर, प्याज जैसी फसलों के दामों में अचानक आने वाली गिरावट का यह भी एक प्रमुख कारण है।
लगातार नुकसान होने से किसान कर्ज के बोझ तले दब जाता है। प्रायः आत्महत्या करने वाले अधिकांश किसान वे होते हैं, जिन्होंने केवल एक ही फसल पर निर्भरता रखी होती है। यदि खेत में अनेक प्रकार की फसलें उगाई जाएँ, तो किसी एक फसल के नष्ट होने पर भी अन्य फसलें किसान को सहारा दे सकती हैं और उसकी आर्थिक स्थिति इतनी विकट नहीं बनती।
समर्थ आगे कहते हैं कि खेत की उपयुक्त जगहों पर विभिन्न प्रकार के फलदार वृक्ष भी अवश्य लगाने चाहिए। ये वृक्ष एक ओर तेज हवाओं से फसलों की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर अपने फलों से किसान की आय का अतिरिक्त स्रोत भी बनते हैं।
यदि आज भी किसान समर्थ रामदास द्वारा बताए गए इन सिद्धांतों—जल संरक्षण, जल का विवेकपूर्ण उपयोग, फसलों की विविधता तथा फलदार वृक्षों के रोपण—को अपनाएँ, तो वे अपनी खेती को सचमुच "सुवर्ण फसल" देने वाली बना सकते हैं।


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