
शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते।
राष्ट्रे शास्त्रविहीने तु शस्त्रं नश्यति न संशयः॥ (महाभारत)
इस श्लोक में 'शस्त्र' (सुरक्षा, सेना, सामर्थ्य)
और 'शास्त्र' (ज्ञान, विज्ञान, कला, संस्कृति तथा
विवेक) के महत्व तथा उनके परस्पर पूरक संबंध का अत्यंत सटीक वर्णन किया गया है। जब
कोई राष्ट्र सुदृढ़ सैन्य शक्ति, आंतरिक व्यवस्था और बाह्य
सुरक्षा के कारण सुरक्षित होता है, तभी वहाँ ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य और
चिंतन का विकास संभव होता है। यदि राष्ट्र सुरक्षित न हो, तो
लोगों का पूरा ध्यान केवल अपने अस्तित्व की रक्षा में लगा रहता है और
ज्ञान-विज्ञान की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है।
इसके विपरीत, जिस राष्ट्र के
पास केवल शस्त्रों का बल हो, किंतु 'शास्त्र' अर्थात् विवेक, नैतिकता,
ज्ञान और मर्यादा का अभाव हो, वहाँ वही शक्ति
अंततः उसके स्वयं के विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए "शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्रचिन्ता प्रवर्तते" यह श्लोक राष्ट्रनिर्माण और राष्ट्र के स्थायी अस्तित्व का मूल सिद्धांत
प्रस्तुत करता है। किसी भी देश की उन्नति के लिए सुरक्षा (शस्त्र) और विवेकपूर्ण
ज्ञान (शास्त्र)—इन दोनों का संतुलन समान रूप से आवश्यक
है।
इतिहास साक्षी है कि जब-जब कोई राष्ट्र सामर्थ्यवान बना, तभी वहाँ ज्ञान और विज्ञान का भी उत्कर्ष हुआ। भारत का गुप्तकाल
इसका स्वर्णिम उदाहरण माना जाता है। सम्राट चंद्रगुप्त और समुद्रगुप्त ने पहले
शस्त्रबल के आधार पर विशाल, सुरक्षित और स्थिर साम्राज्य की
स्थापना की। उसी सुरक्षित वातावरण में आर्यभट्ट, वराहमिहिर
और कालिदास जैसे महान विद्वानों ने विज्ञान, साहित्य और
संस्कृति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
आज का अमेरिका और चीन भी इसी मार्ग पर आगे बढ़े। उन्होंने पहले अपनी राष्ट्रीय
सुरक्षा और सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया, और उसके बाद आर्थिक, तकनीकी तथा वैज्ञानिक महाशक्ति
के रूप में विश्व में प्रतिष्ठित हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में
भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत की बढ़ती
सामरिक क्षमता का प्रभाव विश्व ने और अधिक स्पष्ट रूप से देखा।
किन्तु इतिहास यह भी सिखाता है कि विवेक के बिना प्रयुक्त शस्त्र अंततः
विनाश का कारण बनता है। आर्थिक और सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली जर्मनी ने विवेक
खोकर अहंकारवश पूरे विश्व को जीतने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप द्वितीय
विश्वयुद्ध हुआ, लाखों निर्दोष लोगों की
मृत्यु हुई और स्वयं जर्मनी भी भारी विनाश का शिकार बना। नेपोलियन की पराजय भी
उसकी असीम महत्वाकांक्षा और अविवेकपूर्ण सैन्य नीति का ही परिणाम थी।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में गाज़ा पट्टी का संघर्ष इसका एक जीवंत उदाहरण
है। अतिवादी विचारधारा से प्रेरित होकर परिणामों की परवाह किए बिना अपने से कई
गुना अधिक शक्तिशाली राष्ट्र पर आत्मघाती हमला किया गया। यदि उचित शिक्षा, नैतिकता और दूरदर्शिता होती, तो ऐसा
निर्णय नहीं लिया जाता। इस अविवेकपूर्ण हिंसा का परिणाम यह हुआ कि आज गाज़ा का
बड़ा भाग विनाश का शिकार हो चुका है और हजारों निर्दोष नागरिकों को अपने प्राण
गंवाने पड़े हैं। ये सभी घटनाएँ स्पष्ट रूप से सिद्ध करती हैं कि 'शास्त्र' (विवेक) के
मार्गदर्शन के बिना 'शस्त्र' (शक्ति) अंततः स्वयं अपने विनाश का कारण बन जाता है।
इसी सिद्धांत की पुनर्पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम श्लोक में भी
मिलती है:
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
यहाँ श्रीकृष्ण ज्ञान, नीति,
विवेक और शास्त्र के प्रतीक हैं, जबकि धनुर्धारी
अर्जुन शौर्य, सामर्थ्य और शस्त्र के प्रतीक हैं। जहाँ
इन दोनों का समन्वय होता है, वहीं विजय, समृद्धि, सुशासन और शाश्वत विकास का वास होता है।
संक्षेप में, शस्त्र राष्ट्र की रक्षा करते हैं और शास्त्र राष्ट्र को समृद्ध बनाते
हैं। इन दोनों का संतुलित समन्वय ही राष्ट्रवैभव और राष्ट्रोत्कर्ष का सनातन मंत्र
है।
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