शुक्रवार, 13 मार्च 2026

“सांडों की लड़ाई और महाशक्तियों का संघर्ष"

 


हम सभी ने सांडों की लड़ाई कभी न कभी तो देखी होगी ही। कुछ साल पूर्व ऐसा ही अनुभव मुझे भी हुआ था। दिल्ली का सीताराम  बाजार हमेशा की तरह उस दिन भी जीवन से भरा हुआ था। शाम ढलने लगी थी, लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। दुकानों के सामने सजे रंग-बिरंगे ठेले, मसालों और पकवानों की मिली-जुली खुशबू, ग्राहकों की मोल भाव करती आवाज़ें, सब मिलकर एक जीवंत दृश्य बना रहे थे। पानी-पुरी वाला अपनी पुकार लगाता जा रहा था, “आइए भैया, मसालेदार पानी-पुरी!” पास ही आलू टिक्की वाले के तवे पर घी छनछना रहा था। सब्जी और फल के ठेलों पर मोल भाव चल रहा था।

 

लोग अपने-अपने काम में मग्न थे कि अचानक बाजार में हलचल मच गई। न जाने कहाँ से दो विशाल सांड सड़क के बीचोबीच आ गए। पहले वे कुछ पल तक एक-दूसरे को घूरते रहे, जैसे कोई मौन चुनौती दे रहे हों। फिर अचानक उनके सींग आपस में भिड़ गए। टक्कर इतनी जोरदार थी कि आवाज़ पूरे बाजार में गूंज उठी।

 

कुछ ही क्षणों में उनकी लड़ाई उग्र हो गई। दोनों सांड एक-दूसरे को धक्का देते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे। बाजार की संकरी सड़क उनके लिए किसी अखाड़े में बदल गई। जो कुछ सामने आया, वह उनकी टक्कर की चपेट में आने लगा। पानी-पुरी वाले का ठेला पलट गया और उसका मसालेदार पानी सड़क पर बह निकला। आलू टिक्की वाले का तवा उलट पड़ा और गरम टिक्कियाँ धूल में जा गिरीं।  सब्ज़ी वाले की टोकरियाँ दूर तक बिखर गईं—टमाटर, बैंगन, आलू सड़क पर लुढ़कते चले गए। फल वाले के सेब और केले लोगों के पैरों तले आकर कुचलने लगे।

घबराकर लोग भागने लगे। कोई अपने बच्चों को खींचकर सुरक्षित जगह ले जा रहा था, कोई पास की दुकानों में छिप रहा था। भगदड़ में कुछ लोग गिर पड़े और घायल हो गए। साइकिलें और मोटरसाइकिलें भी धक्के से गिरकर सड़क पर बिखर गईं। कुछ दुकानदार बेबस खड़े अपना उजड़ता सामान देख रहे थे।

 

मैं भी उसी समय बाजार में मौजूद था। अचानक हुए इस हंगामे से घबराकर मैंने भी एक छोटी-सी किराने की दुकान में जाकर शरण ले ली। दुकान के भीतर खड़े-खड़े हम सब लोग बाहर का दृश्य देख रहे थे। बाहर सांडों की टक्कर जारी थी। सींगों की भिड़ंत, जमीन पर पड़ती खुरों की आवाज़, और बीच-बीच में लोगों की घबराई हुई पुकारें।

 

यह संघर्ष करीब 15-20 मिनट चला होगा। आखिरकार दोनों सांड थककर अलग-अलग दिशाओं में चले गए। लेकिन उनके जाने के बाद जो दृश्य बचा, वह किसी छोटे तूफान के बाद की तबाही जैसा था। उलटे ठेले, बिखरी सब्जियाँ, गिरे हुए बर्तन, और डरे-सहमे लोग, जो धीरे-धीरे अपनी जगहों से बाहर निकल रहे थे।

 

आज अमेरिका ईरान के युद्ध का समाचार सुनते हुए मुझे वही पुराना दृश्य आंखो के सामने आया।  दो शक्तिशाली “सांड” आमने- सामने खड़े हैं। उनके बीच बढ़ती तना तनी का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. इस लड़ाई में कोई भी सांड जीते। उसका नतीजा तो दुनिया भर के आम आदमी को ही भुगतना पड़ेगा।  जिसका इन बड़े देशों की टक्कर से कोई सीधा संबंध नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे बाजार में सांडों की लड़ाई के बाद सबसे ज्यादा नुकसान पानी-पुरी वाले, सब्ज़ी वाले और राह चलते लोगों का हुआ था।

सारांश, बड़ी शक्तियों की टक्कर अक्सर अखाड़े में नहीं, बल्कि दुनिया के बाजारों और आम लोगों की जिंदगी में अपना असली असर दिखाती है। महँगाई और बेरोजगारी का नतीजा आम आदमी ही भुगतता है। तब समझ में आता है कि ताकतवरों की लड़ाई का सबसे भारी बोझ हमेशा कमजोरों को ही उठाना पड़ता है।

 

 


  

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