समर्थ रामदास स्वामी ने दासबोध के माध्यम से
संसार में सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर सांसारिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग
लोगों को बताया है। सभी को लगता है कि वह समझदार है। हम अक्सर मूर्खों की तरह
व्यवहार करते हैं, लेकिन हमें इसका पता नहीं चलता। मूर्खता छोड़ने के बिना हम
सांसारिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में सफल नहीं हो सकते।
मूर्ख के लक्षण समझाते हुए समर्थ ने मूर्खों के
विभिन्न लक्षणों का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन किया है। इसका सार निम्नलिखित है:
1.घरेलू व्यवहार में मूर्खता प्रकट होती है, जब कोई व्यक्ति माता-पिता से विरोध करके केवल
पत्नी को ही साथी मानता है।
2.पत्नी और बच्चों के सामने माता-पिता को
गालियां देता है। परिणामस्वरूप भविष्य में उसे वही भोगना पड़ेगा। घर की लक्ष्मी के
बजाय पराई स्त्री पर प्रेम करता है। भविष्य में उसकी दशा “धोबी का कुत्ता, घर का न घाट का” जैसी हो जाएगी।
3. घर में पूर्व पार चली आ रही सनातनी परंपराओं
का विरोध करके देव-पितरों का अपमान करता है, माता-पिता को कम आंकता है। यह सब मूर्खता के
लक्षण हैं।
4. घर में दरिद्रता होने पर भी बाहर
पूर्वजों/पिता की कीर्ति जो बताता है, उसकी समाज में लोग खिल्ली उड़ाते हैं। उसे मूर्ख
कहते हैं।
5. समर्थ कहते हैं, घर के बाहर के व्यवहार में कोई व्यक्ति श्रेष्ठ
के सामने अहंकार दिखाता है, बिना कारण हंसता है, विवेक नहीं रखता या कई लोगों से वैर करता है। स्वकीय
को दूर रखकर परायों से मित्रता करता है, जागरण में जाकर सोता है, दूसरे के घर में अत्यधिक भोजन करता है, व्यसन में डूबा रहता है, आलस्य में संतोष मानता है—ये मूर्ख के लक्षण
हैं।
6. समर्थ आगे कहते हैं, काम वासना से निर्लज्ज होकर मर्यादा छोड़ना, रोग होने पर भी दवा न लेना, साथी के बिना विदेश जाना, मान मिलने वाले स्थान पर बार-बार जाना, श्रीमंत नौकर के अधीन होना या कारण न सोचकर दंड
देना यह भी मूर्ख का व्यवहार है।
7. कोई व्यक्ति घर में विवेक की बातें करता है
लेकिन सभा में बोलते समय शर्माता है या डरता है।
उपरोक्त दोषों में से कई दोष हमारे में भी हो
सकते हैं। लेकिन समर्थ ने केवल मूर्खता के लक्षण ही नहीं बताए, बल्कि उन्हें दूर करने का उपाय भी बताया है।
समर्थ कहते हैं, मूर्खता विवेक के अभाव से आती है। इसलिए हमें हर
क्रिया का विचार करके योग्य-अयोग्य का निर्णय लेकर ही क्रिया करनी चाहिए या बोलना
चाहिए। इसके लिए समर्थ कहते हैं, हमें एकांत में बैठकर मन का परीक्षण करना चाहिए। स्वयं के
दोषों का विचार करके उनका त्याग करने का उपाय ढूंढना चाहिए।
समर्थ ने दासबोध में मन को योग्य दिशा देने के
मार्ग बताए हैं—वासना, अहंकार, लोभ पर नियंत्रण रखना और सात्विक विचार अपनाना।
समर्थ कहते हैं, इंद्रिय जनित मूर्खता का नाश करने के लिए ईश्वर
भक्ति सर्वोत्तम उपाय है। भक्ति से मन शुद्ध होता है और आत्मज्ञान प्राप्त होता
है। समर्थ कहते हैं, दूसरों पर निर्भर न रहकर परिश्रम करके स्वावलंबी बनना
चाहिए। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और मूर्खता दूर होती है। रोजाना कुछ समय निकालकर
अपनी गलत क्रियाओं का विचार करके उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है, इसका मार्ग ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। ये सभी
उपाय करने से धीरे-धीरे ही सही, हम अपने में मूर्खता के दोष दूर कर सकते हैं।
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