शनिवार, 5 सितंबर 2026

वेद वाणी: विश्वेभिः सखिभिः सह”:- परस्पर सहयोग का यज्ञ



वेद और गीता का संदेश अत्यंत व्यापक और उदात्त है, सम्पूर्ण विश्व हमारा मित्र और हमारा परिवार है। अथर्ववेद के ऋषि कहते हैं, विश्वेभिः सखिभिः सह”, अर्थात् सबके साथ मैत्रीभाव और सहयोग की भावना से जीवन जीना चाहिए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह केवल अपने लिए नहीं जीता; बल्कि दूसरों की सहायता करता है, आवश्यकता पड़ने पर दूसरों से सहायता लेता है और परस्पर सहयोग की भावना से अपने जीवन को अधिक समृद्ध, सार्थक और सुखमय बनाता है। यही भाव भगवद्गीता में भी व्यक्त हुआ है:

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥   

 

अर्थात्  यज्ञ द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो, और वे देवता भी तुम्हें सुख-समृद्धि प्रदान करेंगे। इस प्रकार परस्पर सहयोग करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।

 

यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल हवन-कुण्ड में आहुति देना नहीं है, बल्कि मनुष्य द्वारा जीवन-यापन के लिए किया गया प्रत्येक कर्म है। यह सहयोग केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश जैसे पंच तत्त्वों के साथ संतुलन बनाए रखते हुए कर्म करना ही सच्चा धर्म है। जब मनुष्य प्रकृति से लेता है, तो उसे उतना ही लौटाना भी चाहिए। यही संतुलन यज्ञ की मूल भावना है।

 

जल इसका उत्तम उदाहरण है। हम पीने और खेती के लिए भूजल का उपयोग करते हैं। ट्यूबवेल से जब हम धरती से जल खींचते हैं, तो हमारा कर्तव्य है कि उतना ही जल पुनः धरती को लौटाएँ। इसके लिए गाँवों में तालाब, बावड़ी या आधुनिक भाषा में ‘रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम’ बनाना आवश्यक है। यही नियम शहरों पर भी लागू होता है, हर घर और सोसाइटी में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था होनी चाहिए। तभी प्रकृति का संतुलन बना रहेगा और हमें पीने व खेती के लिए पर्याप्त जल मिलता रहेगा। यही मनुष्य का प्रकृति के साथ सच्चा यज्ञ है।

 

जिस प्रकार जल के साथ संतुलन आवश्यक है, उसी प्रकार वायु, अग्नि और भूमि के साथ भी संतुलन बनाए रखना मनुष्य का कर्तव्य है। वृक्षारोपण द्वारा वायु शुद्ध रखना, ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग करना, तथा भूमि की उर्वरता बनाए रखना,  सभी प्रप्राणियों की रक्षा करना, ये सभी यज्ञ के ही रूप हैं। मनुष्य जितना प्रकृति से लेता है, उतना ही उसे लौटाना चाहिए। यही परस्पर सहयोग का व्यावहारिक स्वरूप है।

 

सार: वेद और गीता दोनों सिखाते हैं कि मनुष्य अकेला नहीं जी सकता, न समाज में, न प्रकृति के साथ। यज्ञ अर्थात कर्म का सच्चा अर्थ है हम जो कुछ प्रकृति और समाज से लेते हैं, उसे उतनी ही निष्ठा से लौटाना। इसी संतुलित कर्म-यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं, प्रकृति सुरक्षित रहती है, और मनुष्य स्वस्थ दीर्घ जीवन जीते हुए अंततः मोक्ष   को प्राप्त करता है। इसलिए वेद जड़ चेतन और प्रकृति समस्त विश्व को सखा बनाने का उपदेश देते हैं। 

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