कॉंस्टेबल बलवान सिंह जोर से चिल्लाया, “साहब! हमारे जवानों पर हमला करने वाली, जवानों को मारने वाली नक्सली कमांडर यहीं गिरी पड़ी है। क्या करना है इसके साथ?”
कमांडेंट उसके पास गया। देखा—वह दर्द से तड़पती, खून से लथपथ ज़मीन पर पड़ी थी। उसने सोचा—इस घने जंगल में मदद आने में कई घंटे लगेंगे। तब तक इसका जीवित रहना संभव नहीं। इसे मृत्यु की पीड़ा से मुक्त करना ही उचित होगा।
उसने अपनी बंदूक उसकी छाती की ओर तानी।
कमांडेंट ने आँखें बंद कीं और ट्रिगर दबा दिया।
उस दिन की मुठभेड़ में बंदूक से निकली गोलियों ने कई परिवारों की ज़िंदगी उजाड़ दी। कई सपने टूट गए।
युद्ध की कहानियाँ कभी सुंदर नहीं होतीं। वे बेहद पीड़ादायक होती हैं।

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