दलितों को शिक्षा से किसने रोका था? ब्रिटिश आने से पहले हमारे देश में महिलाओं और शूद्रों को पढ़ने का हक नहीं था—यह बात ब्रिटिशों ने फैलाई, और आजादी के बाद भी ब्रिटिश-पक्षीय सरकार ने यही प्रचार किया। इसका मकसद समाज में फूट डालकर राज करना था। लेकिन सच्चाई छिप नहीं सकती। आज AI के जमाने में पुराने किताबों से सच निकाला जा सकता है। इसी से यह लेख बनाया गया है। वैदिक समय से शुरू करते हैं। क्या वैदिक काल में शूद्र पढ़ सकते थे?
शूद्रोऽपि विद्वान् भवति यद्यपि शूद्रजातः ।
विद्या हि सर्वं विश्वस्य संनादति ॥ (अथर्ववेद १९.६२.१)
शूद्र जन्म वाला भी विद्वान बन सकता है, क्योंकि विद्या पूरे दुनिया में सबके लिए उपलब्ध है।
वैदिक समय में शूद्र और गैर-आर्य को पूरा पढ़ने का हक था। इसका प्रमाण वेदों में है—ऋग्वेद ९.११२.३ में "ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च" कहकर बताया कि वेद शूद्र और गैर-आर्य के लिए भी हैं; ऋग्वेद १०.५३.४ में "यद् विश्वा अश्विना... शूद्राय वा ददथुरार्याय वा" कहकर शूद्र और आर्य को ज्ञान समान दिया; अथर्ववेद १९.६२.१ में "शूद्रोऽपि विद्वान् भवति... विद्या हि सर्वं विश्वं संनादति" कहकर बताया कि शूद्र भी विद्वान बन सकता है; यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) २६.२ में "शूद्राय च परं ब्रह्म दत्तं भवति" कहकर शूद्र को भी ईश्वर का ज्ञान मिलता है। साफ है, वेद काल में वर्ण जन्म से नहीं, पढ़ाई और काम से तय होता था। शूद्र-गैर-आर्य को वेद पढ़ना, यज्ञ, युद्ध, डॉक्टरी और नेतृत्व में बराबर हिस्सा था।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्वत्त्वात् सागरादयः ॥
(महाभारत अनुशासनपर्व १४३.४९-५०):
शूद्र ब्राह्मण बन सकता है, ब्राह्मण शूद्र बन सकता है। क्षत्रिय जन्म वाला भी पढ़कर ब्राह्मण बन सकता है। महाभारत बनाने वाले व्यास (जन्म से नीची जाति) से धृतराष्ट्र और पांडू पैदा हुए। उनके बेटे शुकदेव ने वैदिक पढ़ाई से ब्राह्मण बनकर आत्मा का ज्ञान पाया।
वैदिक समय में शूद्र और गैर-आर्य को पूरा पढ़ने का हक था। इसका प्रमाण वेदों में है—ऋग्वेद ९.११२.३ में "ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च" कहकर बताया कि वेद शूद्र और गैर-आर्य के लिए भी हैं; ऋग्वेद १०.५३.४ में "यद् विश्वा अश्विना... शूद्राय वा ददथुरार्याय वा" कहकर शूद्र और आर्य को ज्ञान समान दिया; अथर्ववेद १९.६२.१ में "शूद्रोऽपि विद्वान् भवति... विद्या हि सर्वं विश्वं संनादति" कहकर बताया कि शूद्र भी विद्वान बन सकता है; यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) २६.२ में "शूद्राय च परं ब्रह्म दत्तं भवति" कहकर शूद्र को भी ईश्वर का ज्ञान मिलता है। साफ है, वेद काल में वर्ण जन्म से नहीं, पढ़ाई और काम से तय होता था। शूद्र-गैर-आर्य को वेद पढ़ना, यज्ञ, युद्ध, डॉक्टरी और नेतृत्व में बराबर हिस्सा था।
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्वत्त्वात् सागरादयः ॥
(महाभारत अनुशासनपर्व १४३.४९-५०):
शूद्र ब्राह्मण बन सकता है, ब्राह्मण शूद्र बन सकता है। क्षत्रिय जन्म वाला भी पढ़कर ब्राह्मण बन सकता है। महाभारत बनाने वाले व्यास (जन्म से नीची जाति) से धृतराष्ट्र और पांडू पैदा हुए। उनके बेटे शुकदेव ने वैदिक पढ़ाई से ब्राह्मण बनकर आत्मा का ज्ञान पाया।
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते ।
वेदपठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः ॥ (मनुस्मृती १०.४ )
जन्म से सब शूद्र होते हैं, यानी कोई जन्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य नहीं। सब सामान्य इंसान बनकर जन्म लेते हैं। संस्कार से द्विज बनता है। उपनयन जैसे संस्कार से दूसरा जन्म मिलता है। वेद पढ़ने से विद्वान बनता है। ईश्वर का ज्ञान पाकर ब्राह्मण बनता है। स्वामी दयानंद कहते हैं कि मनुस्मृति में मिलावट हुई है, इसलिए कुछ गलत श्लोक हैं। मिलावट पुरानी किताबों से चेक की जा सकती है। मिसाल: वाल्मीकि (शूद्र जन्म, रामायण लिखा और ब्राह्मण बना) और विश्वामित्र। और उदाहरण: गदिवान ऋषि (मत्स्य पुराण १४५)—शूद्र जन्म, वेद पढ़ा, यज्ञ से ब्राह्मण बना। जाबाली ऋषि (रामायण अयोध्या कांड १००-१०८)—शूद्र/म्लेच्छ जन्म, राम को नास्तिक विचार सिखाया। महाभारत (शांति पर्व १८०) में सत्यकाम (शूद्र माँ का बेटा) गौतम ऋषि का शिष्य बना, उपनयन से ब्राह्मण बना। व्यास (मत्स्य पुराण १४५, महाभारत आदि पर्व ६३)—शूद्र/मिश्र जन्म, वेद बाँटे, ब्राह्मण बने। उस समय काम से वर्ण बदलता था।
शूद्र राजा भी बने—उदाहरण: चंद्रगुप्त मौर्य (ई.पू. ३२१-२९७), दासी का बेटा, तक्षशिला में चाणक्य से पढ़ा, मौर्य साम्राज्य बनाया। मतलब तक्षशिला में शूद्र पढ़ सकते थे। अजातशत्रु (ई.पू. ४९२-४६०), दासी का बेटा, मगध राजा बना, कोसल-वैशाली जीता। महापद्म नंद (ई.पू. ३८२-३२९), दासी बेटा, काशी-कोसल-कलिंग जीता, नंद साम्राज्य बढ़ाया। पुष्यमित्र शुंग (ई.पू. १८५-१४९), नीची जाति, शुंग वंश बनाया, यज्ञ-शिक्षा को बढ़ावा दिया। दिव्या (ई.पू. ५वीं सदी), मछुआरा राजा, अवंती बढ़ाया, बौद्ध किताबों में पढ़ाई का जिक्र। ये दिखाते हैं कि पुराने भारत में जन्म नहीं, पढ़ाई-काम से राज मिलता था।
वैदिक समय से मुगल आने तक (ई.स. १५२६) भारत में पढ़ाई की अच्छी परंपरा थी। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे ३२ बड़े विश्वविद्यालय और लाखों छोटे गुरुकुल थे। वेद, बौद्ध-जैन, गणित, तारे, डॉक्टरी, कला सबके लिए खुले थे—सब जाति-लिंग के लिए। १८वीं सदी में ६ लाख+ गुरुकुल थे। ज्यादातर शूद्र-दलित (७५-८०%) थे। गुरुकुल में ७२ हुनर सिखाते—लोहार, बुनाई, बढ़ई, कुम्हार, रंगाई, चित्र, घर बनाना, धातु काम, हाथी दांत, रत्न, संगीत यंत्र, खेती के औजार, जहाज बनाना। इससे गाँव स्वावलंबी थे।
वेदपठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः ॥ (मनुस्मृती १०.४ )
जन्म से सब शूद्र होते हैं, यानी कोई जन्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य नहीं। सब सामान्य इंसान बनकर जन्म लेते हैं। संस्कार से द्विज बनता है। उपनयन जैसे संस्कार से दूसरा जन्म मिलता है। वेद पढ़ने से विद्वान बनता है। ईश्वर का ज्ञान पाकर ब्राह्मण बनता है। स्वामी दयानंद कहते हैं कि मनुस्मृति में मिलावट हुई है, इसलिए कुछ गलत श्लोक हैं। मिलावट पुरानी किताबों से चेक की जा सकती है। मिसाल: वाल्मीकि (शूद्र जन्म, रामायण लिखा और ब्राह्मण बना) और विश्वामित्र। और उदाहरण: गदिवान ऋषि (मत्स्य पुराण १४५)—शूद्र जन्म, वेद पढ़ा, यज्ञ से ब्राह्मण बना। जाबाली ऋषि (रामायण अयोध्या कांड १००-१०८)—शूद्र/म्लेच्छ जन्म, राम को नास्तिक विचार सिखाया। महाभारत (शांति पर्व १८०) में सत्यकाम (शूद्र माँ का बेटा) गौतम ऋषि का शिष्य बना, उपनयन से ब्राह्मण बना। व्यास (मत्स्य पुराण १४५, महाभारत आदि पर्व ६३)—शूद्र/मिश्र जन्म, वेद बाँटे, ब्राह्मण बने। उस समय काम से वर्ण बदलता था।
शूद्र राजा भी बने—उदाहरण: चंद्रगुप्त मौर्य (ई.पू. ३२१-२९७), दासी का बेटा, तक्षशिला में चाणक्य से पढ़ा, मौर्य साम्राज्य बनाया। मतलब तक्षशिला में शूद्र पढ़ सकते थे। अजातशत्रु (ई.पू. ४९२-४६०), दासी का बेटा, मगध राजा बना, कोसल-वैशाली जीता। महापद्म नंद (ई.पू. ३८२-३२९), दासी बेटा, काशी-कोसल-कलिंग जीता, नंद साम्राज्य बढ़ाया। पुष्यमित्र शुंग (ई.पू. १८५-१४९), नीची जाति, शुंग वंश बनाया, यज्ञ-शिक्षा को बढ़ावा दिया। दिव्या (ई.पू. ५वीं सदी), मछुआरा राजा, अवंती बढ़ाया, बौद्ध किताबों में पढ़ाई का जिक्र। ये दिखाते हैं कि पुराने भारत में जन्म नहीं, पढ़ाई-काम से राज मिलता था।
वैदिक समय से मुगल आने तक (ई.स. १५२६) भारत में पढ़ाई की अच्छी परंपरा थी। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे ३२ बड़े विश्वविद्यालय और लाखों छोटे गुरुकुल थे। वेद, बौद्ध-जैन, गणित, तारे, डॉक्टरी, कला सबके लिए खुले थे—सब जाति-लिंग के लिए। १८वीं सदी में ६ लाख+ गुरुकुल थे। ज्यादातर शूद्र-दलित (७५-८०%) थे। गुरुकुल में ७२ हुनर सिखाते—लोहार, बुनाई, बढ़ई, कुम्हार, रंगाई, चित्र, घर बनाना, धातु काम, हाथी दांत, रत्न, संगीत यंत्र, खेती के औजार, जहाज बनाना। इससे गाँव स्वावलंबी थे।
ब्रिटिश कंपनी के रिपोर्ट (विलियम एडम १८३५-३८ बंगाल-बिहार, जी.डब्ल्यू. लिटनर १८८२ पंजाब) और धर्मपाल की किताब "द ब्यूटीफुल ट्री" (१९८३) से पता चलता है—बंगाल-बिहार में १ लाख गुरुकुल, हर गाँव में एक (१.५ लाख+ गाँवों में)। पंजाब में ५ हजार+, ज्यादातर शूद्र (७०%+)। पुराने समय में हर गाँव में गुरुकुल से सबको बेसिक पढ़ाई मिलती थी। फिर शूद्र पढ़ाई से दूर कैसे हुए?
१८५७ के बाद ब्रिटिश ने भारत पर कब्जा किया। सजा देकर गुरुकुल बंद किए। मैकाले की नई पढ़ाई शुरू हुई, राजा-जमींदारों ने गुरुकुल को मदद बंद की। ब्रिटिश ने गाँवों में स्कूल नहीं खोले, क्योंकि उन्हें सिर्फ क्लर्क चाहिए थे।
१९०१ में मैकाले सिस्टम में ९३ हजार प्राइमरी और ३-४ हजार सेकंडरी स्कूल थे, कुल ९७ हजार+। लेकिन पुराने ६ लाख गुरुकुल खत्म हो गए। १९०१ जनगणना: भारत की आबादी २९४ मिलियन (पुरुष १५० मिलियन, महिलाएँ १४४ मिलियन)। पढ़े-लिखे सिर्फ ५.३% (पुरुष ९.८%, महिलाएँ ०.७%)। पुराने १५-२५% से बहुत कम (ब्रिटिश डेटा, लेकिन ६ लाख गुरुकुल से ८०-९०% पढ़ाई होती होगी)। बंगाल उदाहरण: ब्राह्मण ४६७/१००० पुरुष पढ़े, क्षत्रिय ३००-४००, वैश्य ३६०-८१८, लेकिन शूद्र (चमार, महार, गोंड, कोली) ८-५४/१०००। पुराने ७०-८४% शूद्र छात्र अब १-२%। दलित ८/१०००। मतलब मैकाले ने ५० साल में ज्यादातर लोगों को अनपढ़ बनाया। ब्राह्मण शहरों में भिक्षा या काम करके पढ़ते, इसलिए अंग्रेजी सिस्टम में आसानी से घुसे, ज्यादा पढ़े, सरकारी नौकरी मिली। दलित गाँवों में रहकर अनपढ़ रह गए।
सारांश: मैकाले नीति से ऊँची जातियों को फायदा, शूद्र-दलितों की पढ़ाई ७०-८०% कम हुई, क्योंकि गाँव गुरुकुल बंद, स्कूल शहर-अंग्रेजी बने। ब्रिटिश ने शूद्रों को पढ़ाई से रोका, यही सच है। आज गाँव-गाँव स्कूल हैं, आरक्षण, स्कॉलरशिप से लड़कियाँ और दलित फिर पढ़ रहे हैं।


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