रविवार, 18 जनवरी 2026

गो मय वसते लक्ष्मी

यदि गाय की सेवा अच्छे से की जाए, तो वह अपने सेवक को अन्न, वस्त्र और निवास प्रदान करती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवता निवास करते हैं। एक कथा है कि जब माता लक्ष्मी ने गायों से पूछा कि मैं तुम्हारे शरीर में कहाँ निवास करूँ, तब गायों ने कहा, “माता लक्ष्मी, आप हमारे पवित्र गोबर और गोमूत्र में निवास करें।” हमारे देश में एक समय गौ आधारित अर्थव्यवस्था थी और गौदान की परंपरा रही है।

ऑपरेशन फ्लड के दौरान लाखों किसानों को सरकार ने गायें प्रदान कीं ताकि दूध का उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाई जा सके। आज भी कई राज्यों में गाय पालने पर सरकार अनुदान देती है। इससे किसानों की जीवनशैली में सुधार हुआ, दूध आयात घटा, और अब हम दुग्ध उत्पादों का निर्यात भी करते हैं।

भारत में 19 करोड़ गायें हैं, जिनमें से 13 करोड़ दूध देती हैं। दूध उत्पादन 2014-15 में 146.3 मिलियन टन था जो 2023-24 में बढ़कर 239.2 मिलियन टन हो गया। दुग्ध उत्पादों का निर्यात भी 141.39 मिलियन डॉलर से बढ़कर 272.64 मिलियन डॉलर हो गया। अमूल, मदर डेयरी और नंदिनी जैसे बड़े ब्रांड बने और करोड़ों किसानों को इसका लाभ मिला।

गाय का गोबर खेतों में खाद के रूप में उपयोग होता है, जिससे भूमि में लक्ष्मी उत्पन्न होती है। गोवर्धन पूजा की परंपरा भी इसी से जुड़ी है। आज भी यज्ञ, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों में गोबर के उपलों का उपयोग होता है। गावों में घरों की दीवारें गोबर से लीपी जाती हैं और इससे कई प्रकार की पूजा सामग्रियाँ तैयार होती हैं—जैसे धूप, हवन कप, दीये, आदि।

गोबर और मिट्टी से बने घर ठंडे और पर्यावरण अनुकूल होते हैं। गोबर से बनी ईंटें, टाइल्स, वैदिक प्लास्टर और पेंट घर का तापमान 8–10 डिग्री तक कम कर सकते हैं। साथ ही गोबर गैस, खाद और अन्य उत्पाद भी तैयार होते हैं, जो किसान के लिए लाभदायक हैं।

रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उपजाऊ शक्ति घटती है और किसान को भारी खर्च उठाना पड़ता है। इसके अलावा रासायनिक अन्न से जनस्वास्थ्य पर भी बुरा असर होता है—पंजाब की "कैंसर ट्रेन" इसका उदाहरण है।

गोमय के उपयोग से न केवल  भूमि की उर्वर शक्ति बढ़ेगी बल्कि किसान को खेती के अलावा आय के अन्य विकल्प भी उपलब्ध कराएगी। 

भूमि संवर्धक खाद

गोबर में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम और सूक्ष्मजीव मिट्टी को उर्वर बनाते हैं।

कीटनाशक

गौ मूत्र में पाए जाने वाले तांबा, लोहा आदि खनिज प्राकृतिक कीट नियंत्रण में सहायक।जैविक खेती के लाभ भी किसान को मिलेंगे जैसे: 

रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाकर लागत में 30–40% तक बचत।

भूमि की जलधारण क्षमता बढ़कर सूखे मौसम में भी खेती संभव।

मिट्टी की उपजाऊ शक्ति दीर्घकाल तक बनी रहती है।

निर्माण सामग्री

गोबर टाइल्स, ईंटें, वैदिक प्लास्टर और पेंट से घर ठंडे और सस्ती होते हैं।

उर्जा स्रोत

गोबर गैस प्लांट से खाना पकाने और बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भरता।

आयुर्वेद में पंचगव्य का उपयोग रोगों के उपचार में होता है। गौ मूत्र से कैंसर, मधुमेह जैसे रोगों में लाभ मिलता है। गोनायल (गौ मूत्र आधारित फिनाइल) जैसे उत्पाद हजारों गोशालाओं में बन रहे हैं और उनका व्यापार करोड़ों में पहुंच चुका है। पतंजलि जैसी कंपनियाँ रोज लाख लीटर से ज्यादा गोनयल और गो अर्क बना रही है। 

यदि कोई गोपालक आर्थिक दृष्टि से गोबर और गौ मूत्र का उपयोग करे, तो दूध से भी अधिक कमाई कर सकता है।  उसकी आय 20 -25%  निश्चित बढ़ सकती है। एक गाय से एक हेक्टेयर भूमि में प्राकृतिक खेती की जा सकती है, जिससे लागत घटेगी, पैदावार बढ़ेगी, और भूमि की उर्वरता भी सुधरेगी।

 इसीलिए हमारे ऋषियों ने कहा था—"गोमय वसते लक्ष्मी"।

 

  

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