भोर की पहली किरण जब शरीर पर पड़ती है, तो मन प्रसन्न हो जाता है। सुबह की कोमल धूप मन को भाती है। जैसे सोने का रंग प्रिय होता है, वैसे ही सोना भी इंसान को प्रिय होता है। सोने की कृपा से भौतिक इच्छाएँ पूरी होती हैं—कपड़े, टीवी, गाड़ी, बंगला। और अगर अधिक सोना हो, तो उस बंगले में पत्नी के रूप में विश्व सुंदरी भी मिल सकती है।
एक बार एक अज्ञानी व्यक्ति को रास्ते में सोने का सिक्का पड़ा मिला। उसने बिना सोचे-समझे उसे उठाकर जेब में रख लिया। कुछ देर बाद दूसरे व्यक्ति को भी वही सिक्का दिखा। उसने इधर-उधर देखा, कोई नहीं था, तो उसने भी सिक्का उठाकर जेब में रख लिया। फिर एक शिक्षित विचारक आया। उसने सिक्का देखा और सोचने लगा- यह किसका हो सकता है? क्या इसे उठाना उचित होगा? मन में द्वंद्व चला- क्या यह चोरी होगी या ईश्वर की कृपा? बहुत विचार करने के बाद, विचारवंत व्यक्ति ने निर्णय लिया—ईश्वर की कृपा हुई है, भगवान का कृपाप्रसाद मानकर यह सिक्का उठाना बिल्कुल उचित है। उसने सिक्का उठाकर अपनी जेब में रख लिया
संयोगवश तीनों की मृत्यु एक ही दिन हुई। यमदूत उन्हें धर्मराज के सामने ले गए। पहले को एक वर्ष नरकवास मिला क्योंकि उसने मेहनत के बिना धन पाया था। दूसरे को पाँच वर्ष की सजा मिली क्योंकि उसने चोरी की नियत से सिक्का उठाया।
धर्मराज ने विचारवंत को सौ वर्ष नरकवास की सजा सुनाई। वह बोला, "मैंने तो उसे भगवान का कृपाप्रसाद समझकर लिया था। मैं निर्दोष हूँ। आप मनमानी सजा दे रहे हैं। मैं शिकायत करूँगा, उपवास पर बैठूँगा।"
धर्मराज क्रोधित हुए, "यह भारत देश नहीं है जहाँ कोई भी उपवास पर बैठ जाता है। यह धर्मराज का न्यायालय है। तुम शिक्षित हो, तुम्हें उचित-अनुचित का ज्ञान है। फिर भी तुमने चोरी की, और उस चोरी में भगवान को भी घसीट लिया। तुम्हारा अपराध बड़ा है। तुम्हें क्षमा नहीं किया जा सकता। तुम्हारे अपराध के देखकर ही तुम्हें सजा भी कठोर दी है।


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