एक बार जंगल में रहने वाले गिरगिट सोचा शहर जाकर लोगों को अपना रंग बदलने का हुनर दिखाकर वाहवाही बटोरूंगा. गिरगिट शहर आया. एक बंगले में एक आदमी सफेद टोपी लगाए कुर्सी पर बैठा हुआ था. गिरगिट उस आदमी के पास जाकर बोला, मैं जंगल में रहने वाला गिरगिट हूं. मैं जिस जगह पर बैठता हूं, उसी के रंग में रंग जाता हूं. आपको में अपनी कला दिखाता हूं. गिरगिट हरे पौधे पर बैठा, हरे रंग का हो गया.लाल फूल पर बैठा, लाल रंग का हो गया. इस तरह गिरगिट ने कई रंग बदल कर उस आदमी को दिखाए. फिर गिरगिट उस आदमी को बोला, क्या आप ऐसा कर सकते हो. वह आदमी बोला इसमें कौनसी बड़ी बात है. मैं इसी कुर्सी पर बैठा- बैठा रंग बदल सकता हूं. बस तुम मेरी टोपी की तरफ देखो. गिरगिट ने देखा उस आदमी की टोपी का रंग क्षणभर में हरे से लाल, लाल से नीला, नीले से भगवा और फिर सफेद ही गया. उस आदमी की रंग बदलने की कला देख गिरगिट आश्चर्य चकित हो गया. गिरगिट ने उस आदमी से पूछा आप आखिर हो कौन? मैने इंसानों को रंग बदलते आजतक नहीं देखा है.वह आदमी बोला, गिरगिट मैं मामूली इंसान नही हूं. मैं सदा कुर्सी पर विराजमान रहने वाला नेता हूं. चाहे टोपी के कितने ही रंग बदलने पड़े. गिरगिट ने उस आदमी के चरण छुए और बोला गुरुदेव क्या अपनी कला मुझे सिखाएंगे क्या?
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